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गोवंश को रोमांचित करती है घंटी और घुंघरू की मधुर ध्वनि
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कर्मबीर लाठर
करनाल। बैल के गले में बंधा हुआ घुंघरू और बछड़ियों के गले में बंधी घंटियां (टालियां) न केवल पशुओं को अलग-अलग तरह से उल्लासित और रोमांचित करती हैं। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के जलवायु प्रतिरोधी परियोजना केंद्र में देसी गाय की बछड़ियों पर घंटियों की ध्वनि तरंगों पर शोध किया जा रहा है। जिसमें बहुत सी बातें सामने आ रहीं हैं। संवाद
केंद्र के प्रभारी डा. आशुतोष ने बताया कि घंटियों व घुंघरू की मधुर आवाज गोवंश को प्रिय है। अगस्त 2020 से 10 बछड़ियों के गले में घंटियां बांधकर इस पर शोध किया जा रहा है। केंद्र परिसर में संगीत प्रणाली स्थापित कर बांसुरी की धुन गायों को सुनाई जाती है। जब म्यूजिक सिस्टम बंद हो जाता है तो बछड़ियां हरकत में आती हैं और एक-दूसरे की घंटी बजाने के लिए प्रतिक्रिया देती हैं। घंटियों की आवाज सुनकर रोमांचित हो जाती हैं। यह ध्वनि इंसानों को भी बहुत अच्छी लगती है।
कार्यक्षमता भी बढ़ाती है
डॉ आशुतोष ने कहा कि बैलों के गले में घुंघरू बजने की आवाज बैलों और हल चलाने वाले किसान को कार्य करने की तरफ भी अग्रसर करती है। दोनों की कार्यक्षमता बढ़ाती है। घंटियों व घुंघरूओं की मधुर आवाज व्यक्ति को सुकून भरे माहौल का अहसास करवाती है। जैसा कि आज के समय में घंटियों की आवाज पर ध्यान साधना करवाई जा रही है, जिससे व्यक्ति का मन शांत हो सके। प्रचीन काल में पशुधन की चोरी रोकने के लिए भी घंटियां व घुंघरू बांधे जाते थे।
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प्राचीन ग्रंथों में भी वर्णित है इनका महत्व
डा. आशुतोष ने कहा कि कोरोना काल में हमारे पुरातन ज्ञान के आधार पर नागरिकों से अनुरोध किया गया था कि वे एक समय पर कुछ देर के लिए अपने घर पर मिलकर कोई भी वाद्य यंत्र, आवाज पैदा करने वाला शंख, घंटी या अन्य वाद्य यंत्र बजाएंगे। इसके पीछे जो आधार था वो भी हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। शंख की ध्वनि वातावरण को स्वच्छ बनाती है। इसी प्रकार अन्य वाद्य यंत्र अलग-अलग तीव्रता एवं तरंगों के आधार पर विषाणु, जीवाणु एवं छोटे जीव-जंतुओं का नाश करते हैं। जिससे वातावरण स्वच्छ रहता है।
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करनाल। बैल के गले में बंधा हुआ घुंघरू और बछड़ियों के गले में बंधी घंटियां (टालियां) न केवल पशुओं को अलग-अलग तरह से उल्लासित और रोमांचित करती हैं। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के जलवायु प्रतिरोधी परियोजना केंद्र में देसी गाय की बछड़ियों पर घंटियों की ध्वनि तरंगों पर शोध किया जा रहा है। जिसमें बहुत सी बातें सामने आ रहीं हैं। संवाद
केंद्र के प्रभारी डा. आशुतोष ने बताया कि घंटियों व घुंघरू की मधुर आवाज गोवंश को प्रिय है। अगस्त 2020 से 10 बछड़ियों के गले में घंटियां बांधकर इस पर शोध किया जा रहा है। केंद्र परिसर में संगीत प्रणाली स्थापित कर बांसुरी की धुन गायों को सुनाई जाती है। जब म्यूजिक सिस्टम बंद हो जाता है तो बछड़ियां हरकत में आती हैं और एक-दूसरे की घंटी बजाने के लिए प्रतिक्रिया देती हैं। घंटियों की आवाज सुनकर रोमांचित हो जाती हैं। यह ध्वनि इंसानों को भी बहुत अच्छी लगती है।
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कार्यक्षमता भी बढ़ाती है
डॉ आशुतोष ने कहा कि बैलों के गले में घुंघरू बजने की आवाज बैलों और हल चलाने वाले किसान को कार्य करने की तरफ भी अग्रसर करती है। दोनों की कार्यक्षमता बढ़ाती है। घंटियों व घुंघरूओं की मधुर आवाज व्यक्ति को सुकून भरे माहौल का अहसास करवाती है। जैसा कि आज के समय में घंटियों की आवाज पर ध्यान साधना करवाई जा रही है, जिससे व्यक्ति का मन शांत हो सके। प्रचीन काल में पशुधन की चोरी रोकने के लिए भी घंटियां व घुंघरू बांधे जाते थे।
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प्राचीन ग्रंथों में भी वर्णित है इनका महत्व
डा. आशुतोष ने कहा कि कोरोना काल में हमारे पुरातन ज्ञान के आधार पर नागरिकों से अनुरोध किया गया था कि वे एक समय पर कुछ देर के लिए अपने घर पर मिलकर कोई भी वाद्य यंत्र, आवाज पैदा करने वाला शंख, घंटी या अन्य वाद्य यंत्र बजाएंगे। इसके पीछे जो आधार था वो भी हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। शंख की ध्वनि वातावरण को स्वच्छ बनाती है। इसी प्रकार अन्य वाद्य यंत्र अलग-अलग तीव्रता एवं तरंगों के आधार पर विषाणु, जीवाणु एवं छोटे जीव-जंतुओं का नाश करते हैं। जिससे वातावरण स्वच्छ रहता है।
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