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Karnal News: पहली बार चंदन की किस्में ईजाद करने की तैयारी, शोध शुरू

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 28 Nov 2024 02:42 AM IST
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Preparations underway to invent sandalwood varieties for the first time, research begins
देव शर्मा
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करनाल। चंदन की खेती अत्यधिक लाभप्रद है। इसके बावजूद किसान इसे अपनाने में हिचकते हैं, इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि चंदन के पेड़ को तैयार (परिपक्व) होने में करीब डेढ़ दशक का समय लगता है। अब वैज्ञानिक इसकी परिपक्वता का समय कम करने के साथ पहली बार चंदन की किस्म तैयार करने पर भी शोध कर रहे हैं। इससे किसान कम समय में अधिक लाभ कमा सकें।
चंदन के अच्छे और गुणवत्ता वाले पौधे तैयार करने के लिए केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान में एक परियोजना चल रही है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। क्षेत्र के सांभली गांव में एक किसान ने 10 किले में चंदन की खेती भी शुरू कर दी है। कुछ अन्य स्थानों पर भी किसानों ने इसकी खेती शुरू की है पर किसान अपेक्षित गति से इसे नहीं अपना पा रहे हैं।
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केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक (कृषि वानिकी) डॉ. राज कुमार ने बताया कि चंदन दो प्रकार के हैं लेकिन अभी तक पूरी दुनिया में इसकी कोई खास किस्म उपलब्ध नहीं है। संस्थान के निदेशक डॉ.आरके यादव के मार्गदर्शन में संस्थान में चंदन की खेती पर एक प्रोजेक्ट चल रहा है। इसी क्रम में शोध किए जा रहे हैं। जिसमें सफेद चंदन की नई किस्म तैयार करने, इसके परिपक्व होने की अवधि को कम करने, इसकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने, कम समय में इसकी मोटाई बढ़ाकर भार को अधिक करने आदि पर शोध कार्य किया जा रहा है ताकि आने वाले समय में चंदन की खेती वरदान साबित हो सके। किसानों का कहना है कि चंदन का पौधा तैयार होने में करीब 12 से 15 साल का समय लग जाता है। ये समय बहुत ज्यादा है। आजकल घटती जोत के बीच इतना समय एक फसल को देना संभव नहीं हो पाता है।
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वैज्ञानिक बताते हैं कि देश में चंदन दो प्रकार का मिलता है, इसमें एक सफेद चंदन है, जो तेल निकालने, धार्मिक कार्यों के कार्य में आता है। दूसरा, लाल चंदन, जिसकी लकड़ी सजावटी सामान बनाने के काम आती है। वैसे तो चंदन की खेती दक्षिण भारत में अधिक होती है लेकिन जलवायु को ध्यान में रखते हुए अब उत्तर भारत में भी इसकी खेती शुरू की गई है। चंदन का पेड़ जितना पुराना होता है, उतनी ज्यादा उसकी कीमत भी मिलती है। 15 साल के बाद एक पेड़ की कीमत करीब 70 हजार से दो लाख रुपये तक हो जाती है। इस तरह यह खेती फायदे का सौदा है।

सहपौधों की भी की गई पहचान
- सीएसएसआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राज कुमार ने बताया कि चंदन एक परजीवी पौधा है। इसलिए इस पर भी शोध चल रहा है कि उसके पास कौन से मेजबान पौधा (खुराक देने वाला पौधा) हो और उसे कितना खाद पानी दिया जाना चाहिए। जिससे चंदन का पौधा बेहतर खुराक प्राप्त कर सके। हालांकि अभी तक कुछ पौधे चिह्नित किए गए हैं, इनमें शीशम, नीम, डेक, सरू आदि सह पौधे शामिल हैं। जो चंदन के पौधे से करीब छह फीट की दूरी पर लगाने होते हैं। जिससे चंदन का पौधा मिट्टी के अंदर से ही अपनी जड़ों को सहपौधे तक पहुंचाकर अपनी खुराक प्राप्त कर लेता है।

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