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Vijay Diwas: शादी की थी तैयारी, सरहद से आई 21 साल के प्रवेश की शहादत की खबर, 71 की लड़ाई में शहीद हुए थे दादा

Tue, 26 Jul 2022 03:00 AM IST
भूपेंद्र सिंह प्रवीण कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, इंद्री, करनाल (हरियाणा)
प्रवीण कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, इंद्री, करनाल (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Tue, 26 Jul 2022 03:00 AM IST
सार

क्षेत्रवासी आज भी कारगिल शहीद प्रवेश की वीरता को याद करते हैं। ऐसा नहीं है कि प्रवेश कुमार अपने परिवार में एकमात्र शहीद थे, बल्कि इससे पूर्व उनके दादा महावीर सिंह भी फौज में रहकर अपने प्राण सरहद की रक्षा के लिए न्योछावर कर चुके हैं। 

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Pravesh Kumar of Mukhana village of Karnal was martyred in Kargil war
करनाल जिले के इंद्री खंड के गांव मुखाला में कारगिल के शहीद प्रवेश कुमार की प्रतिमा। शहीद प्रवेश कुम - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

कारगिल युद्ध में शहीद हुए हरियाणा के करनाल जिले के इंद्री क्षेत्र के मुखाला गांव के प्रवेश कुमार-21 की शहादत को क्षेत्र के लोग आज भी भुला नहीं पाए हैं। दरअसल कारगिल युद्ध से पहले ही प्रवेश की शादी तय हुई थी और तीन माह बाद उसे विवाह के बंधन में बंधना था, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। परिजन इधर शादी की तैयारियों में लगे हुए थे, तभी सरहद से प्रवेश के शहादत की खबर आई। 

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कारगिल युद्ध का जिक्र आते ही क्षेत्रवासियों के जेहन में शहीद की तस्वीर उभर आती है। करीब दो महीने से भी अधिक समय तक चले युद्ध में 34वें दिन प्रवेश कुमार अपनी बटालियन के साथ दुश्मनों से लड़ता हुआ छह जून 1999 को देश के लिए शहीद हो गया था। परिवार के पास प्रवेश कुमार की शहादत की खबर पहुंची तो गांव के साथ-साथ पूरे क्षेत्र में मातम पसर गया।
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शादी को लेकर चल रही तैयारियां और खुशियां मातम में तब्दील हो गईं। इसके बावजूद उनके पिता रामेश्वर दास को दिल के किसी कोने में एक संतुष्टि जरूर थी कि उनका बेटा देश की रक्षा के लिए शहीद हुआ है। कसक यह भी थी कि सरहदों की रक्षा करते समय जान न्योछावर करने वाले शहीदों को सरकार बदलते ही भुला दिया जाता है।

इसका खामियाजा शहीदों के परिवारों को भुगतना पड़ता है। प्रवेश की मृत्यु उपरांत सरकार ने परिवार को गैस एजेंसी, करनाल बस स्टैंड पर दुकान, गांव में पुस्तकालय व शहीद प्रवेश के नाम पर सड़क बनाने की घोषणा की थी। हैरानी की बात है कि 23 वर्षों के बाद भी शहीद के परिवार को आज तक कोई दुकान नहीं मिली, जिससे परिवार में सरकार के प्रति गहरा रोष है। 

पुस्तकालय के स्थान पर चल रहा आंगनबाड़ी केंद्र 
शहीद प्रवेश कुमार के नाम पर सरकार ने गांव में एक पुस्तकालय खोलने की घोषणा की थी, जिसका भवन तो सरकार की ओर से बनाया गया, लेकिन पुस्तकालय में एक भी पुस्तक नहीं भेजी। बाद में पुस्तकालय में आंगनबाड़ी केंद्र खोल दिया गया। शहीद के चचेरे भाई अशोक कुमार का कहना है कि सरकार का कार्य केवल घोषणा करना नहीं बल्कि उसे अमलीजामा पहनाना भी होता है।


गैस एजेंसी दी पर दुकान की घोषणा अधूरी
शहीद के भाई संजय कुमार का कहना है कि सरकार ने घोषणा अनुसार निसिंग में गैस एजेंसी दी, जिस कारण उन्हें अपना गांव छोड़ निसिंग विस्थापित होना पड़ा। इस कारण खेती बाड़ी का कार्य भी छूट गया। इसके अलावा सरकार ने दुकान देने की घोषणा की थी जो आज तक पूरी नहीं हुई। बीती 17 अप्रैल को पिताजी भी गुजर गए। अंतिम समय में भी उनके मन में एक टीस थी कि सरकारें शहीदों के लिए की गई घोषणाओं को आखिर कब पूरा करेंगी। 

परिवार से मिली थी सेना में जाने की प्रेरणा
ऐसा नहीं है कि प्रवेश कुमार अपने परिवार में एकमात्र शहीद थे, बल्कि इससे पूर्व उनके दादा महावीर सिंह भी फौज में रहकर अपने प्राण सरहद की रक्षा के लिए न्योछावर कर चुके हैं। परिजनों का कहना है कि दादा महावीर सिंह 1971 की लड़ाई में शहीद हो गए थे। परिवार को उनका पार्थिव शरीर भी प्राप्त नहीं हुआ था। सेना की ओर से केवल उनका ट्रक भेजा गया था। प्रवेश को भी सेना में जाने की प्रेरणा परिवार से ही मिली थी। छह फरवरी 1978 को जन्मे प्रवेश कुमार 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करते ही सेना में भर्ती हो गए थे।

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