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गैस सब्सिडी छोड़ने में नेता और अधिकारी सबसे पीछे
ब्यूरो/अमरउजाला, करनाल
Updated Mon, 07 Sep 2015 12:50 AM IST
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सीएम सिटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गैस सब्सिडी छोड़ने के आह्वान
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का असर न मंत्री, न भाजपा पदाधिकारी, न ही अधिकारियों पर देखने को मिल रहा
है। मोदी के आदर्शों पर चलने का ढोल पीटने वाली प्रदेश भाजपा सरकार में
करनाल जिले से स्वयं मुख्यमंत्री, एक खाद्य एवं पूर्ति विभाग के मंत्री, एक
सीपीएस, एक सांसद, तीन विधायक, मुख्यमंत्री के ओएसडी मुख्य भूमिका में
हैं, लेकिन सरकार के किसी भी नुमाइंदे ने गैस सब्सिडी नहीं छोड़ी।
इससे प्रदेश सरकार के नुमाइंदे मोदी के आदेशों के प्रति कितने गंभीर हैं यह साफ देखने को मिल रहा है। यही नहीं सीएम सिटी में किसी भी अधिकारी ने भी गैस सब्सिडी को नहीं छोड़ा है। ऐेसे में देशहित में गैस सब्सिडी छोड़ने का आम जनता से भावनात्मक तरीके से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान करना उनके हकों पर डाका डालने से कम नहीं होगा।
जिले के दो लाख साठ हजार उपभोक्ताओं में से मात्र 1500 आम लोगों ने गैस सब्सिडी छोड़ी है।
यह हाल मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के निर्वाचन क्षेत्र व खाद्य एवं पूर्ति विभाग के राज्यमंत्री कर्णदेव कांबोज के जिला में है, जहां एमएलए, एमपी के अलावा प्रशासनिक अधिकारी भी गैस सब्सिडी का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। इंडियन ऑयल कारपोरेशन के आंकड़ों के मुताबिक यह पोल खुली है। गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया गया है, लेकिन प्रबुद्ध लोगों के छोड़ने से गरीब लोगों को फायदा मिल जाता।
जिले में छोटी-बड़ी हैं 26 गैस एजेंसियां
26 गैस एजेंसियों से दो लाख 60 हजार उपभोक्ता जुड़े हैं। उपभोक्ताओं को सिलेंडर लेने के लिए करीब 620 रुपये देने पड़ते हैं और तीन से चार दिन बाद उपभोक्ता के खाते में सब्सिडी आ जाती है। उपभोक्ताओं को यह सिलेंडर 420 रुपये का पड़ता है। जो उपभोक्ता सब्सिडी लेना नहीं चाहते उन्होंने गैस एजेंसी पर लिखकर देना पड़ता है। इसके अलावा गैस बुकिंग के दौरान सब्सिडी छोड़ने का ऑप्शन बताया जाता है।
200 रुपये छोड़ने में नहीं दिखा रहे दिलचस्पी
प्रदेश के अग्रणी जिलों में करनाल का नाम सबसे आगे है। विकास के मामले में यहां पर हर क्षेत्र में आगे है। यही कारण है कि करनाल को स्मार्ट सिटी में जगह मिली। करनाल के चावल उद्योग का डंका विदेशों में बजता है। इसके लिए शिक्षा संस्थान, लिबर्टी सहित अन्य उद्योगों से करनाल का नाम ऊपर है, लेकिन गैस सब्सिडी के करीब 200 रुपये छोड़ने में यहां के खास लोग दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।
सब्सिडी छोड़ने के लिए करना चाहिए बाध्य
शहर के आम लोग देवेंद्र शर्मा, सुखबीर, राजेंद्र राणा का सुझाव है कि सरकार ने गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए बाध्य करना चाहिए। एमपी, एमएमए सहित जिला स्तर पर पार्टी के चुने जाने वाले सत्ता पक्ष के प्रतिनिधियों सहित हर प्रशासनिक अधिकारी व कर्मचारी को बगैर सब्सिडी का सिलेंडर दिया जाए। आह्वान से कोई नहीं मानता।
कोट
गैस सब्सिडी छोड़ने के मोदी के आह्वान को पूरा करने के लिए जल्द ही कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इसमें सभी से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया जाएगा। इसमें राजनेताओं के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होंगे। हमारी कोशिश यह रहेगी कि ज्यादा से ज्यादा गैस सब्सिडी को छोड़ें, ताकि गरीब का चूल्हा भी जल सके।
-अमरेंद्र सिंह, मुख्यमंत्री के ओएसडी करनाल।
कोट
गैस सब्सिडी छोड़ने वालों में अब तक आम लोग ही आए हैं। किसी मंत्री व जिले के अधिकारियों ने गैस सब्सिडी नहीं छोड़ी है। इस तरह की रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय सहित उच्चाधिकारियों को भेजी है। प्रबुद्ध लोग सब्सिडी छोड़ते हैं तो गैस के दाम कम भी हो सकते हैं।
इंद्रेवर यादव, डिप्टी मैनेजर, आईओसी, करनाल।
इससे प्रदेश सरकार के नुमाइंदे मोदी के आदेशों के प्रति कितने गंभीर हैं यह साफ देखने को मिल रहा है। यही नहीं सीएम सिटी में किसी भी अधिकारी ने भी गैस सब्सिडी को नहीं छोड़ा है। ऐेसे में देशहित में गैस सब्सिडी छोड़ने का आम जनता से भावनात्मक तरीके से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान करना उनके हकों पर डाका डालने से कम नहीं होगा।
जिले के दो लाख साठ हजार उपभोक्ताओं में से मात्र 1500 आम लोगों ने गैस सब्सिडी छोड़ी है।
यह हाल मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के निर्वाचन क्षेत्र व खाद्य एवं पूर्ति विभाग के राज्यमंत्री कर्णदेव कांबोज के जिला में है, जहां एमएलए, एमपी के अलावा प्रशासनिक अधिकारी भी गैस सब्सिडी का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। इंडियन ऑयल कारपोरेशन के आंकड़ों के मुताबिक यह पोल खुली है। गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया गया है, लेकिन प्रबुद्ध लोगों के छोड़ने से गरीब लोगों को फायदा मिल जाता।
जिले में छोटी-बड़ी हैं 26 गैस एजेंसियां
26 गैस एजेंसियों से दो लाख 60 हजार उपभोक्ता जुड़े हैं। उपभोक्ताओं को सिलेंडर लेने के लिए करीब 620 रुपये देने पड़ते हैं और तीन से चार दिन बाद उपभोक्ता के खाते में सब्सिडी आ जाती है। उपभोक्ताओं को यह सिलेंडर 420 रुपये का पड़ता है। जो उपभोक्ता सब्सिडी लेना नहीं चाहते उन्होंने गैस एजेंसी पर लिखकर देना पड़ता है। इसके अलावा गैस बुकिंग के दौरान सब्सिडी छोड़ने का ऑप्शन बताया जाता है।
200 रुपये छोड़ने में नहीं दिखा रहे दिलचस्पी
प्रदेश के अग्रणी जिलों में करनाल का नाम सबसे आगे है। विकास के मामले में यहां पर हर क्षेत्र में आगे है। यही कारण है कि करनाल को स्मार्ट सिटी में जगह मिली। करनाल के चावल उद्योग का डंका विदेशों में बजता है। इसके लिए शिक्षा संस्थान, लिबर्टी सहित अन्य उद्योगों से करनाल का नाम ऊपर है, लेकिन गैस सब्सिडी के करीब 200 रुपये छोड़ने में यहां के खास लोग दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।
सब्सिडी छोड़ने के लिए करना चाहिए बाध्य
शहर के आम लोग देवेंद्र शर्मा, सुखबीर, राजेंद्र राणा का सुझाव है कि सरकार ने गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए बाध्य करना चाहिए। एमपी, एमएमए सहित जिला स्तर पर पार्टी के चुने जाने वाले सत्ता पक्ष के प्रतिनिधियों सहित हर प्रशासनिक अधिकारी व कर्मचारी को बगैर सब्सिडी का सिलेंडर दिया जाए। आह्वान से कोई नहीं मानता।
कोट
गैस सब्सिडी छोड़ने के मोदी के आह्वान को पूरा करने के लिए जल्द ही कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इसमें सभी से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया जाएगा। इसमें राजनेताओं के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होंगे। हमारी कोशिश यह रहेगी कि ज्यादा से ज्यादा गैस सब्सिडी को छोड़ें, ताकि गरीब का चूल्हा भी जल सके।
-अमरेंद्र सिंह, मुख्यमंत्री के ओएसडी करनाल।
कोट
गैस सब्सिडी छोड़ने वालों में अब तक आम लोग ही आए हैं। किसी मंत्री व जिले के अधिकारियों ने गैस सब्सिडी नहीं छोड़ी है। इस तरह की रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय सहित उच्चाधिकारियों को भेजी है। प्रबुद्ध लोग सब्सिडी छोड़ते हैं तो गैस के दाम कम भी हो सकते हैं।
इंद्रेवर यादव, डिप्टी मैनेजर, आईओसी, करनाल।