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कोरोना की चिंता छोड़ भूख से परेशान मजदूर घरों को चले
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लुधियाना, पानीपत, करनाल से भी बड़ी संख्या में बिहार और यूपी के मजदूर और फेरी वाले साइकिलों से अपने घरों को रवाना हो रहे हैं। मजदूरों का कहना है कि रास्ते में कई समाजसेवी संस्थाएं उन्हें भोजन करा देती हैं। वे कहीं भी जगह देखकर रात्रि विश्राम कर लेते हैं। उनका कहना है कि इस तरह वह सप्ताहभर से एक पखवाड़े के अंदर अपने घरों को पहुंच जाएंगे।
दरअसल लॉकडाउन के चलते सर्वाधिक प्रभावित दैनिक मजदूरी करने वाला तबका हो रहा है। जो दिनभर मेहनत करने के बाद शाम को उसके घर में चूल्हा जल पाता था। दो तीन दिन तक तो मजदूर तबका, जहां का तहां बैठा रहा लेकिन अब वह पैदल ही घर को निकल पड़े हैं। मजदूरों के इस कदम से सोशल डिस्टेसिंग की चेन टूट रही है। करनाल में रविवार को जीटी रोड पर यही नजारा दिखा। बड़ी संख्या में मजदूर पैदल व साइकिलों से अपने घरों की ओर रवाना होते दिखे। इन शहरों में बिहार, उत्तर प्रदेश के मजदूरों की संख्या लाखों में है। जीटी रोड करनाल में कुछ साइकिल सवारों को रोककर पूछा तो रघुवीर प्रजापति, अनिल, भूरे, सतीश आदि दर्जनभर से अधिक लोगों ने बताया कि वे लुधियाना से आ रहे हैं। सभी यूपी के अलीगढ़ जिले के हुसैनपर गांव के निवासी हैं। होली के बाद वह हर साल लुधियाना आते हैं। फेरी लगाकर कोई सब्जी बेचता है तो कोई सेव व संतरा और कपड़ा। उनकी साइकिलें व खाना बनाने के बर्तन आदि लुधियाना में ही एक कमेटी के पास रहते हैं। लेकिन इस बार गए तो लॉकडाउन हो गया। जो पैसे थे, वह खत्म हो गए। काम शुरू नहीं हो सका और भोजन मिलने में दिक्कत आने लगी। इसलिए सभी अपनी अपनी साइकिलों से अपने घरों की ओर रवाना हो रहे हैं। करीब ढाई से तीन सौ किमी की दूरी साइकिलों से तय करके घरों को पहुंच जाएंगे। श्रमिक पानीपत व करनाल से भी अपने घरों को रवाना हुए हैं।
-साइकिलों से अलीगढ़ लौट रहे मजदूरों ने बताया कि शनिवार को अपराह्न दो बजे चले थे। रातभर चलते रहे। सुबह करनाल में समाजसेवी संस्थाओं ने उन्हें भोजन करा दिया। कुछ समय आराम करने के बाद फिर चल दिए हैं। उनका कहना है कि यहां रहकर भी क्या करें और क्या खाएं। इससे बेहतर अपने घर लौट जाएंगे। वहां अपनों के साथ तो रहेंगे।
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कहीं महंगी न पड़ जाए गांव वापसी
लाखों मजदूर वर्ग अपने घरों को लौटने की जल्दी में है लेकिन यह जल्दबाजी उनके अपनों के लिए खतरे से भरी हो सकती है। यदि इन लाखों मजदूरों में से कुछ मजदूर कोरोना संक्रमित हुए तो कोरोना संक्रमण की आशंका उन गांवों में उत्पन्न हो सकती है। उनके अपनों में भी फैल सकती है, जिनसे मिलने की जल्दी में यह मजदूर पैदल व साइकिलों से भागे चले जा रहे हैं। सोशल डिस्टेंसिंग की जानकारी इन श्रमिकों को नहीं है। एक साथ चल रहे हैं, एक साथ रात्रि विश्राम कर रहे हैं, एक साथ भोजन कर रहे हैं।
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दरअसल लॉकडाउन के चलते सर्वाधिक प्रभावित दैनिक मजदूरी करने वाला तबका हो रहा है। जो दिनभर मेहनत करने के बाद शाम को उसके घर में चूल्हा जल पाता था। दो तीन दिन तक तो मजदूर तबका, जहां का तहां बैठा रहा लेकिन अब वह पैदल ही घर को निकल पड़े हैं। मजदूरों के इस कदम से सोशल डिस्टेसिंग की चेन टूट रही है। करनाल में रविवार को जीटी रोड पर यही नजारा दिखा। बड़ी संख्या में मजदूर पैदल व साइकिलों से अपने घरों की ओर रवाना होते दिखे। इन शहरों में बिहार, उत्तर प्रदेश के मजदूरों की संख्या लाखों में है। जीटी रोड करनाल में कुछ साइकिल सवारों को रोककर पूछा तो रघुवीर प्रजापति, अनिल, भूरे, सतीश आदि दर्जनभर से अधिक लोगों ने बताया कि वे लुधियाना से आ रहे हैं। सभी यूपी के अलीगढ़ जिले के हुसैनपर गांव के निवासी हैं। होली के बाद वह हर साल लुधियाना आते हैं। फेरी लगाकर कोई सब्जी बेचता है तो कोई सेव व संतरा और कपड़ा। उनकी साइकिलें व खाना बनाने के बर्तन आदि लुधियाना में ही एक कमेटी के पास रहते हैं। लेकिन इस बार गए तो लॉकडाउन हो गया। जो पैसे थे, वह खत्म हो गए। काम शुरू नहीं हो सका और भोजन मिलने में दिक्कत आने लगी। इसलिए सभी अपनी अपनी साइकिलों से अपने घरों की ओर रवाना हो रहे हैं। करीब ढाई से तीन सौ किमी की दूरी साइकिलों से तय करके घरों को पहुंच जाएंगे। श्रमिक पानीपत व करनाल से भी अपने घरों को रवाना हुए हैं।
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-साइकिलों से अलीगढ़ लौट रहे मजदूरों ने बताया कि शनिवार को अपराह्न दो बजे चले थे। रातभर चलते रहे। सुबह करनाल में समाजसेवी संस्थाओं ने उन्हें भोजन करा दिया। कुछ समय आराम करने के बाद फिर चल दिए हैं। उनका कहना है कि यहां रहकर भी क्या करें और क्या खाएं। इससे बेहतर अपने घर लौट जाएंगे। वहां अपनों के साथ तो रहेंगे।
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लाखों मजदूर वर्ग अपने घरों को लौटने की जल्दी में है लेकिन यह जल्दबाजी उनके अपनों के लिए खतरे से भरी हो सकती है। यदि इन लाखों मजदूरों में से कुछ मजदूर कोरोना संक्रमित हुए तो कोरोना संक्रमण की आशंका उन गांवों में उत्पन्न हो सकती है। उनके अपनों में भी फैल सकती है, जिनसे मिलने की जल्दी में यह मजदूर पैदल व साइकिलों से भागे चले जा रहे हैं। सोशल डिस्टेंसिंग की जानकारी इन श्रमिकों को नहीं है। एक साथ चल रहे हैं, एक साथ रात्रि विश्राम कर रहे हैं, एक साथ भोजन कर रहे हैं।