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कल्पना के पिता बनारसी लाल चावला: संस्कारों व समाज के प्रति समर्पित रहा घराना, पाकिस्तानी से आकर बसा था परिवार

Wed, 04 Oct 2023 08:34 AM IST
नवीन दलाल देव शर्मा, करनाल (हरियाणा)
देव शर्मा, करनाल (हरियाणा) Published by: नवीन दलाल Updated Wed, 04 Oct 2023 08:34 AM IST
सार

बनारसी दास चावला के करीबी प्रितपाल सिंह पन्नू ने बताया कि बनारसी लाल चावला, को कई विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में लेक्चर के लिए बुलाया जाता था। वह जाते थे तो अपने साथ कल्पना चावला पर विभिन्न चैनलों, संस्थाओं द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री, प्रोग्राम आदि की सीडी बनवाकर ले जाते थे। वहां विद्यार्थियों को निशुल्क बांटते थे, ताकि उन्हें प्रेरणा मिल सके।

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Kalpana father Banarasi Lal Chawla, family dedicated to values and society, family settled here from Pakistan
कल्पना चावला के पिता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अंतरिक्ष परी कल्पना चावला का परिवार संस्कारों व समाज के प्रति समर्पित रहा है। कल्पना के चाचा ने अपनी पूरी संपत्ति समाजसेवा के लिए दान कर दी। आज पिता के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को चिकित्सा जगत के विद्यार्थियों को सौंप दिया, ताकि वह उससे नए प्रयोग करके सीख सकें।

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पांच जुलाई 1929 को शेखपुरा, किले पिंड (पाकिस्तान) में जन्मे बनारसी लाल चावला चार भाई थे। बनारसी लाल सबसे बड़े थे, उनसे छोटे अमरीक देव, फिर दर्शन लाल चावला और सबसे छोटे सतीश चावला। 1947 में वह विभाजन के बाद करनाल में आकर बसे तो सभी भाई कारोबार से जुड़ गए। सुपर टायर के नाम से बड़ा टायर उद्योग स्थापित किया, जिसके बनारसी लाल चावला प्रबंध निदेशक रहे।
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कुछ समय बाद अमरीक देव जी का मन बैरागी हो गया और वह संत हो गए। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, उद्योग बेचकर निर्मल कुटिया को दान कर दिया और निर्मलधाम की स्थापना की। जिसमें आज वृद्धाआश्रम व संत निक्का सिंह पब्लिक स्कूल चलता है, जिसमें बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। निर्मल धाम के निकट ही कल्पना चावला कंप्यूटर सेंटर भी खुला है, जहां निशुल्क कंप्यूटर शिक्षा दी जाती है। अब बनारसी लाल चावला व संत अमरीक देव महाराज तो दुनिया में नहीं हैं, लेकिन दर्शन लाल चावला व सतीश चावला दिल्ली में रहते हैं।
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मोंटू ने खुद रखा था अपना नाम कल्पना
कुछ समय पहले बनारसी लाल चावला ने बताया था कि जब वह कल्पना चावला का दाखिला कराने स्कूल में गए थे तो उस समय परिवार वाले उसे मोंटू कहकर बुलाते थे। हेड मास्टर बोले कि ये क्या नाम है, कुछ और नाम लिखवाओ, जैसे हेमा, राखी या कल्पना आदि। तो मोंटू तपाक से बोल पड़ी कि मेरा नाम कल्पना रख दो। इसके बाद उसका नाम कल्पना चावला हो गया।

पशु का वध न हो, इसलिए फटा जूता सिलवा लिया

कुछ दिन पहले ही बनारसी लाल चावला ने बताया था कि जब कल्पना अमेरिका में थी तो वह उसके पास गए थे। एक दिन उसे कॉलेज से लौटने में काफी देर हो गई। जब वह कमरे पर पहुंची तो उन्होंने पूछा कि इतनी देरी क्यों हो गई। कल्पना ने कहा कि पिता जी जूता फट गया था, इसे सिलवाने में देर हो गई। उसकी सिलाई के लिए दिए गए रुपये सुनकर वह बोले कि इतने पैसे में तो जूते नए आ जाते, तो कल्पना का जवाब सुनकर वह चौक गए। उसने कहा कि पिता जी सुना है कि जूते चमड़े से बनाए जाते हैं, चमड़ा पशुओं को काटकर निकाला जाता है। नए जूते खरीदने का मतलब है, एक पशु का वध। यही सोचकर फटा जूता सिलवा लिया।

कल्पना पर बने प्रोग्राम सीडी निशुल्क देकर करते थे प्रेरित

उनके करीबी प्रितपाल सिंह पन्नू ने बताया कि बनारसी लाल चावला, को कई विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में लेक्चर के लिए बुलाया जाता था। वह जाते थे तो अपने साथ कल्पना चावला पर विभिन्न चैनलों, संस्थाओं द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री, प्रोग्राम आदि की सीडी बनवाकर ले जाते थे। वहां विद्यार्थियों को निशुल्क बांटते थे, ताकि उन्हें प्रेरणा मिल सके। खास बात ये भी है कि वह किसी भी कार्यक्रम में बुके या स्मृति चिह्न नहीं लेते थे, उनका कहना था कि ये पैसे बच्चों की शिक्षा पर खर्च होने चाहिए।

समय की कीमत समझें

बनारसी लाल चावला, समय के बेहद पाबंद थे, किसी भी कार्यक्रम में वह समय पर पहुंचते थे, आयोजकों से कहते थे कार्यक्रम समय पर ही शुरू और खत्म होना चाहिए। जो समय की कीमत नहीं समझते, समय उनकी कद्र नहीं करता। वह बालिका शिक्षा को लेकर काफी गंभीर थे। उन्होंने इसके लिए हमेशा प्रयास किए।

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