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Karnal News: अब एआई से पशुओं में सर्वोत्तम जींस की तलाश करेंगे भारत-अमेरिका के वैज्ञानिक
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अब एआई से पशुओं में सर्वोत्तम जींस की तलाश करेंगे भारत-अमेरिका के वैज्ञानिक
- अमेरिका के सुपर कंप्यूटर की भी ली जाएगी मदद, मकसद-दुधारू पशुओं में नस्ल सुधार करना
- आगामी चार से पांच वर्षों में सामने आएगी नई तकनीक के बेहतर परिणाम
- किस पशु में अधिक दूध देने की और किसमें अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता, ऐसे जींस किए जाएंगे चिह्नित
देव शर्मा
करनाल। किन पशुओं में अधिक दूध देने की क्षमता है, उसमें कितनी जलवायु अनुकूलता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता कितनी है। अब अमेरिका और भारत के वैज्ञानिक मिलकर पशुओं के डीएनए के जीनोम में ऐसे जींस की पहचान करेंगे। इस शोध का मकसद समय की मांग के अनुसार दुधारू पशुओं में नस्ल सुधार करना है। जींस की पहचान करने के लिए ''आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस'' (एआई) और अमेरिका के सुपर कंप्यूटर की मदद ली जाएगी। चार से पांच वर्षों में इस शोध के बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि देश दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ रहा है, मगर जलवायु परिवर्तन के बीच दुधारू पशुओं की नस्ल सुधार के मद्देनजर अभी भी कई चुनौतियां हैं। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) के निदेशक डॉ. धीर सिंह के मार्गदर्शन में इसी महीने जीनोम एडिटिंग पर कार्य शुरू हो चुका है। हाल ही में एनडीआरआई में ही जर्मनी के ''एमएलआई-इंस्टीट्यूट ऑफ फॉर्म एनीमल जेनेटिक्स'' के प्रो.बिल्फ्रेड ए.कुज की मौजूदगी में देश के विभिन्न शोध और तकनीक संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकी पर एक कार्यशाला भी की गई थी, लेकिन ये तकनीक भविष्य पर आधारित है। जिसमें पशुओं के डीएनए में तकनीकी बदलाव करके मनवांछित सुधार किया जा सकता है। इससे इतर अब अमेरिका और भारत ने पशुओं में उपलब्ध डीएनए के जीनोम (जीन का समूह) में से बेहतर जीन की पहचान करके उसी पशुओं के प्रजनन को बढ़ावा देने की तकनीक पर कार्य शुरू किया है।
एनडीआरआई के पशु प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास वोहरा बताते हैं कि जीनोम तो जीन का एक समुद्र होता है। एक पशु के डीएनए में करीब 40 हजार जीन होते हैं। लेकिन इसमें पशुओं को दुधारू बनाने के लिए सर्वोत्तम जींस का पता लगाने के लिए पूरे जीनोम का अध्ययन करना पड़ता है, जो उपलब्ध संसाधनों से संभव नहीं हो पाता। इसलिए अब इस अध्ययन के लिए अमेरिका के सुपर कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद ली जाएगी। इससे उन जींस की शीघ्रता से पहचान हो सकेगी, जो दूध व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और ताप सहनशील बनाने वाले के लिए सहायक होते हैं।
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इसी तकनीक पर चर्चा करने अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. सेड्रिक गोंड्रो नग इन दिनों एनडीआरआई पहुंचे हुए हैं। वे एनडीआरआई सहित कई शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों, छात्रों को सीधे मिशीगन के सुपर कंप्यूटर से जोड़कर उसकी मदद से इस तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। इस तकनीक की जानकारी देने के लिए संस्थान विकास योजना (आईडीपी), राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी) व आईसीएआर-एनडीआरआई करनाल के सहयोग से एनडीआरआई में दो सप्ताह की कार्यशाला भी आयोजित की जाएगी, जिसमें अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो. सेड्रिक गोंड्रो मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के सुपर कंप्यूटर से जोड़कर भारतीय वैज्ञानिकों को तकनीक की बारीकियां बताएंगे।
आसानी से चिह्नित होंगे जींस
जिस तरह गूगल मैप पर रास्ता बताने वाली तकनीक चिह्नित किए गए गंतव्य तक पहुंचा देती है, उसी तरह ये तकनीक भी पशुओं के भीतर उन जींस तक पहुंचा देगी, जिसका अध्ययन वैज्ञानिक करना चाहते हैं। इसी के जरिए एक पशु में दुग्ध व रोग प्रतिरोधक क्षमता और जलवायु अनुकूलता वाले जींस को वैज्ञानिक आसानी से चिह्नित कर सकते हैं। संयुक्त निदेशक अकादमिक ड़ॉ.एके सिंह और संयुक्त निदेशक अनुसंधान डॉ. राजन शर्मा भी इस प्रोेजेक्ट में सहयोग कर रहे हैं।
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- आगामी चार से पांच वर्षों में सामने आएगी नई तकनीक के बेहतर परिणाम
- किस पशु में अधिक दूध देने की और किसमें अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता, ऐसे जींस किए जाएंगे चिह्नित
देव शर्मा
करनाल। किन पशुओं में अधिक दूध देने की क्षमता है, उसमें कितनी जलवायु अनुकूलता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता कितनी है। अब अमेरिका और भारत के वैज्ञानिक मिलकर पशुओं के डीएनए के जीनोम में ऐसे जींस की पहचान करेंगे। इस शोध का मकसद समय की मांग के अनुसार दुधारू पशुओं में नस्ल सुधार करना है। जींस की पहचान करने के लिए ''आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस'' (एआई) और अमेरिका के सुपर कंप्यूटर की मदद ली जाएगी। चार से पांच वर्षों में इस शोध के बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि देश दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ रहा है, मगर जलवायु परिवर्तन के बीच दुधारू पशुओं की नस्ल सुधार के मद्देनजर अभी भी कई चुनौतियां हैं। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) के निदेशक डॉ. धीर सिंह के मार्गदर्शन में इसी महीने जीनोम एडिटिंग पर कार्य शुरू हो चुका है। हाल ही में एनडीआरआई में ही जर्मनी के ''एमएलआई-इंस्टीट्यूट ऑफ फॉर्म एनीमल जेनेटिक्स'' के प्रो.बिल्फ्रेड ए.कुज की मौजूदगी में देश के विभिन्न शोध और तकनीक संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकी पर एक कार्यशाला भी की गई थी, लेकिन ये तकनीक भविष्य पर आधारित है। जिसमें पशुओं के डीएनए में तकनीकी बदलाव करके मनवांछित सुधार किया जा सकता है। इससे इतर अब अमेरिका और भारत ने पशुओं में उपलब्ध डीएनए के जीनोम (जीन का समूह) में से बेहतर जीन की पहचान करके उसी पशुओं के प्रजनन को बढ़ावा देने की तकनीक पर कार्य शुरू किया है।
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एनडीआरआई के पशु प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास वोहरा बताते हैं कि जीनोम तो जीन का एक समुद्र होता है। एक पशु के डीएनए में करीब 40 हजार जीन होते हैं। लेकिन इसमें पशुओं को दुधारू बनाने के लिए सर्वोत्तम जींस का पता लगाने के लिए पूरे जीनोम का अध्ययन करना पड़ता है, जो उपलब्ध संसाधनों से संभव नहीं हो पाता। इसलिए अब इस अध्ययन के लिए अमेरिका के सुपर कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद ली जाएगी। इससे उन जींस की शीघ्रता से पहचान हो सकेगी, जो दूध व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और ताप सहनशील बनाने वाले के लिए सहायक होते हैं।
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इसी तकनीक पर चर्चा करने अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. सेड्रिक गोंड्रो नग इन दिनों एनडीआरआई पहुंचे हुए हैं। वे एनडीआरआई सहित कई शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों, छात्रों को सीधे मिशीगन के सुपर कंप्यूटर से जोड़कर उसकी मदद से इस तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। इस तकनीक की जानकारी देने के लिए संस्थान विकास योजना (आईडीपी), राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी) व आईसीएआर-एनडीआरआई करनाल के सहयोग से एनडीआरआई में दो सप्ताह की कार्यशाला भी आयोजित की जाएगी, जिसमें अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो. सेड्रिक गोंड्रो मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के सुपर कंप्यूटर से जोड़कर भारतीय वैज्ञानिकों को तकनीक की बारीकियां बताएंगे।
आसानी से चिह्नित होंगे जींस
जिस तरह गूगल मैप पर रास्ता बताने वाली तकनीक चिह्नित किए गए गंतव्य तक पहुंचा देती है, उसी तरह ये तकनीक भी पशुओं के भीतर उन जींस तक पहुंचा देगी, जिसका अध्ययन वैज्ञानिक करना चाहते हैं। इसी के जरिए एक पशु में दुग्ध व रोग प्रतिरोधक क्षमता और जलवायु अनुकूलता वाले जींस को वैज्ञानिक आसानी से चिह्नित कर सकते हैं। संयुक्त निदेशक अकादमिक ड़ॉ.एके सिंह और संयुक्त निदेशक अनुसंधान डॉ. राजन शर्मा भी इस प्रोेजेक्ट में सहयोग कर रहे हैं।