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पर्यावरण: ग्लोबल वार्मिंग पर शोध करेगा बागवानी विश्वविद्यालय, ग्रीन हाउस गैसों को कम और संतुलित करने का उद्देश्य

Thu, 26 May 2022 02:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो कर्मबीर लाठर, संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल (हरियाणा)
कर्मबीर लाठर, संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल (हरियाणा) Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 26 May 2022 02:21 AM IST
सार

महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो समर सिंह ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का सीधा असर वर्तमान में भीषण गर्मी के रूप में सामने आ चुका है। यह बहुत हानिकारक है।

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Horticulture University to conduct research on global warming
Global Warming - फोटो : File

विस्तार

वैश्विक उष्णता और जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार घटक हरित गृह गैसों की सांद्रता कम करने पर हरियाणा के करनाल में स्थित महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्य करेगा। ग्रीन हाउस गैसों को कम और संतुलित करने के उद्देश्य से यह शोध किया जाएगा। शोध के तहत विभिन्न फसलों व भूमि से उत्सर्जित होने वाली हरित गृह गैसों का आकलन किया जाएगा। यह भी परखा जाएगा कि कौन सी फसलें और तकनीक अपनाकर हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।

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विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो समर सिंह ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का सीधा असर वर्तमान में भीषण गर्मी के रूप में सामने आ चुका है। यह बहुत हानिकारक है। बढ़ती जनसंख्या और बदलती जीवनशैली के कारण पिछले कुछ दशकों में जलवायु में बहुत ज्यादा परिवर्तन देखने को मिला है। मौसम में अचानक होने वाले बड़े बदलाव जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम हैं। ऐसे में बढ़ते तापमान के कारण समस्त जीवों के सामने अस्तित्व बचाने का गंभीर संकट तक पैदा हो सकता है।

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जैव विविधता पर संकट
समर सिंह ने कहा कि बढ़ते तापमान का प्रमुख कारण हरित गृह गैसों की बढ़ती मात्रा है। वर्तमान में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 421.72 पीपीएम तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा मीथेन व नाइट्रस ऑक्साइड आदि गैसों की मात्रा भी लगातार बढ़ रही है। जिनकी वैश्विक तापमान बढ़ाने की क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना ज्यादा है। बढ़ते तापमान के कारण हर साल पौधों व प्राणियों की अनेक प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, जिससे जैव विविधता पर संकट है।

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ग्लोबल वार्मिंग का कारण जनसंख्या वृद्धि और बढ़ता शहरीकरण भी है। निर्माण कार्यों के चलते कृषि भूमि आवासीय क्षेत्र में तबदील हो रही है। खाद्यान्न की मांग तेजी से बढ़ी है। खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए शेष भूमि पर दबाव है। कीटनाशकों व रसायनिक उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए जैविक कृषि समय की जरूरत है। फसल अवशेषों को खेत में जलाना भी जलवायु परिवर्तन के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। यदि जागृत नहीं हुए तो समस्त जीवों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है। - डॉ. पवन कुमार, पर्यावरण विशेषज्ञ, महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल

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