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Karnal News: देश सेवा का था जुनून, 20 की उम्र में दे दी शहादत

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 26 Jul 2024 06:59 AM IST
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Had passion to serve the country, martyred at the age of 20
- बेटे गुलाब सिंह को याद कर फफक पड़ती हैं मां, सहेज कर रखी हैं चिटि्ठयां
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- कारगिल युद्ध के दौरान चोटी संख्या 5299 पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए दी थी कुर्बानी
विश्वनाथ अत्री
मूनक। गुलाब सिंह की शहादत के करीब 25 वर्ष बीत चुके हैं मगर मां अपने लाडले को याद कर अब भी फफक कर रो पड़ती हैं। उन्होंने बेटे के भेजे गए सभी चिटि्ठयां सहेज कर रखी हैं। जिन्हें पढ़कर वह अतीत में खो जाती हैं।
मां मैहरो देवी बताती हैं कि गुलाब के अंदर देश सेवा का जुनून सवार था। जब वह 12वीं कक्षा में पढ़ रहा था तभी सेना में भर्ती हो गया। दो वर्ष के कार्यकाल में उसने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
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मां ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान चोटी संख्या 5299 पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए गुलाब शहीद हो गया था। वह फरवरी 1997 में भर्ती हुआ और 21 जून 1999 को अपने प्राणों की आहुति दे दी। मैहरो देवी का कहना है कि जब भी कोई फौजी गांव में आता है तो वह अपने लाल के खयालों में खो जाती हैं। उसमें बेटे गुलाब सिंह की छवि देखती हैं। - संवाद
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लगता है वह जरूर आएगा
मैहरो देवी बताती हैं कि वह अक्सर गुलाब की तस्वीर देखती हैं और सोचती हैं कि उसका बेटा एक दिन वापस आकर गले लगेगा। उसकी हर त्योहार व पर्व पर याद सताती है। शहादत के बाद भी गुलाब की लिखी हुई चिट्ठी उन्हें मिली थी। किसान परिवार में जन्मा गुलाब पढ़ाई में भी होनहार था। वह तब अविवाहित था। 20 वर्ष की आयु में ही देश के काम आया। मां ने कहा कि उसे फख्र है कि उसका बेटा देश के काम आया।
लाइब्रेरी बनी मगर पुस्तकें नहीं आईं
शहीद गुलाब के भाई दलबीर ने बताया कि तत्कालीन सरकार ने लाइब्रेरी व समाधि के लिए ढाई लाख रुपए दिए थे। इसके बाद गुलाब सिंह की समाधि बनाई गई थी। उन्होंने बताया कि गांव के सरपंच कर्मचंद ने अब इस समाधि के नजदीक पार्क को चहारदीवारी कर बेहतर बना दिया है।

दलबीर ने बताया कि यह समाधि गांव के सहयोग से स्कूल के गेट के पास बनाई गई थी। क्योंकि स्कूल का नाम शहीद गुलाब सिंह के नाम से रखना था परंतु इस पर आगे कार्यवाही नहीं हुई। लाइब्रेरी में भी पुस्तकें नहीं आईं।
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