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दो वक्त की रोटी के लिए जंग

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 22 Apr 2020 01:45 AM IST
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fighting for roti
दो वक्त की रोटी के लिए जंग लड़ रही जिंदगी
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करनाल। यह और बात है कि जिला प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं सभी को राशन और भोजन पहुंचाने का दावा करती हैं, लेकिन करनाल में ही कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां लॉकडाउन में जिंदगी को दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए जंग लड़नी पड़ रही है। उनके पास ना तो मास्क है और ना ही सैनिटाइजेशन की कोई व्यवस्था। बिना राशन कार्ड वालों को राशन देने की व्यवस्था खाद्य एवं आपूर्ति महकमा अभी शुरू नहीं कर पाया है। वहीं सामाजिक संस्थाओं की पहुंच भी इन गांव की गलियों तक नहीं हो सकी हैं।
बुड्ढा खेड़ा गांव में रोड के किनारे अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) का निवासी राजू गेहूं की बालियों को कूटकर हवा के झोकों से तुड़ी को निकालकर गेहूं को साफ करता मिला। उसने बताया कि वह शादी बारातों में बर्तन धोने का काम करता है, उसे रहने के लिए बुड्ढा खेड़ा में ही एक स्थान निशुल्क मिल गया है, लेकिन अब शादियां, दावतें आदि बंद होने के कारण उसे काम नहीं मिल रहा है। इसलिए सुबह से जिन खेतों में गेहूं की कटाई हो चुकी है, उनमें से शेष बच गईं बालियां बिनता है। उन्हें साफ करके पिसाई कराकर अपना पेट भरता है। उसके पास राशन कार्ड नहीं है, इसलिए उसे सरकारी राशन नहीं मिलता है। इतनी दूर गांव में कोई सामाजिक संस्था भी नहीं पहुंचती है।
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मंगलपुर गांव में चिलचिलाती धूप में गेहूं कटाई के दौरान खेतों में कंबाइन से छूट गई गेहूं की बालियां बिनकर लौट रही शांति पैदल आती मिली। पूछा तो उसका दर्द आंखों में डबडबाने लगा। आवाज सिसक उठी। बोली कि उसका पति नहीं है। एक बेटा, बहू व एक पोता है, सब एक साथ किराये के मकान में रहते हैं। लॉकडाउन के कारण बेटे को काम नहीं मिल रहा है। राशन कार्ड नहीं है तो डिपो से राशन नहीं मिला। आपात नंबर पर फोन कराया था लेकिन कोई राशन देने नहीं आया। इसलिए हर रोज सुबह से ही खेतों पर चली जाती है, दिनभर गेहूं की बालियां बीनती हैं, जिससे परिवार के खाने का जुगाड़ करती है।
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मंगलवार को आईटीआई चौक पर एक वृद्धा डिवाइडर स्ट्रीट पर बैठी थी, उसके पास ही ओढ़ने बिछाने के कुछ कपड़े रखे थे, जो कपड़े पहने थे, वह भी मैले थे। पूछा तो बोली-वह यहीं पर सोती है, यहीं पर रहती है। मूलरूप से बिहार राज्य में नैन पट्टी की रहने वाली है। उसके छह बेटे और छह बेटियां हैं, जो करनाल शहर में ही रहते हैं। दो बेटे मिलकर एक खाने का होटल भी चलाते हैं। अन्य सभी मजदूरी करते हैं। बहू और और पोते पोतियां भी हैं, लेकिन जहां रहते हैं, वहीं जगह नहीं है, इसलिए सभी ने उसे यहां पहुंचा दिया है लेकिन हर रोज खाना घर से भेजते हैं। पति बैंक में साफ सफाई करने जाता है। कभी कभी उससे मिलने भी आ जाता है। घर से निकाले जाने का कारण पूछने पर भी मां के दिल ने अपने बेटों को बुरा नहीं कहा।
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