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Karnal News: सजा कीर्तन दरबार, अरदास कर टेका मत्था
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हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर साहिब के शहीदी दिवस पर कार्यक्रम
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर साहिब के शहीदी दिवस पर आयोजित कीर्तन दरबार में रविवार सुबह गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश कर हेड ग्रंथी भाई कुलविंद्र सिंह ने अरदास कर कीर्तन का शुभारंभ करवाया। सजे कीर्तन दरबार में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष श्रद्धालु सुबह से शाम तक माथा टेकते रहे।
कीर्तन दरबार में गुरु तेग बहादुर साहिब की महिमा का गुणगान करते हुए बीबी बलविंद्र कौर ने... गुरु तेग बहादुर जी का शब्द कर लो गिरफ्तार हो गया हुकम लग्या न देरियां गाकर उनकी बाणी का गुणगान किया गया। इस अवसर पर बाबा सुखा सिंह ने कहा कि सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर सिंह थे, जिनको हिंद की चादर भी कहा जाता है। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। पंजाब के अमृतसर में एक अप्रैल 1621 को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। इनकी माता का नाम नानकी और पिता गुरु हरगोबिंद सिखों के छठे गुरु थे। करतारपुर की लड़ाई के बाद वह किरतपुर जा रहे थे। उस दौरान उनकी उम्र महज 13 साल थी। मुगलों की फौज की एक टुकड़ी ने उनका पीछा करते हुए फगवाड़ा के पास पलाही गांव में अचानक हमला कर दिया। इस युद्ध के दौरान पिता गुरु हरगोबिंद साहिब के साथ मुगलों से गुरु तेग बहादुर ने भी दो-दो हाथ किए। गुरु तेग बहादुर की शादी साल 1632 में जालंधर के नजदीक करतारपुर में बीबी गुजरी से हुई। फिर वह अमृतसर के पास बकाला में रहने लगे। वहीं सिखों के आठवें गुरु हरकृष्ण साहिब जी के निधन के बाद साल 1665 में गुरु तेग बहादुर अमृतसर के गुरु की गद्दी पर बैठे और सिखों के नौवें गुरु बने।
गुरु तेग बहादुर के दौरान मुगल शासक औरंगजेब था। वहीं औरंगजेब की छवि एक कट्टर मुगल बादशाह के रूप में थी। औरंगजेब के शासनकाल में हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा था। इसका शिकार सबसे ज्यादा कश्मीरी पंडित हुए। तब श्री आनंदपुर साहिब में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शरण में कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल मदद के लिए पहुंचा। इस दौरान गुरु तेग बहादुर ने उनके धर्म की रक्षा का वचन दिया। औरंगजेब की कैद में गुरु तेग बहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। औरंगजेब ने उनके सामने तीन शर्तें रखीं। जिनमें कलमा पढ़कर मुस्लिम बनना, चमत्कार दिखाने या फिर मौत स्वीकार करने की शर्त रखी, लेकिन गुरु तेग बहादुर ने धर्म छोड़ने और चमत्कार दिखाने से इंकार कर दिया। गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब से कहा कि वह मृत्यु स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन अपने केस नहीं कटवा सकते हैं। जिस पर 24 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया। कीर्तन में भाई संदीप सिंह, भाई तजिंद्र, भाई लखविंद्र सिंह ने भी गुरु की महिमा का गुणगान किया। इस अवसर पर आयोजित लंगर में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर साहिब के शहीदी दिवस पर आयोजित कीर्तन दरबार में रविवार सुबह गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश कर हेड ग्रंथी भाई कुलविंद्र सिंह ने अरदास कर कीर्तन का शुभारंभ करवाया। सजे कीर्तन दरबार में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष श्रद्धालु सुबह से शाम तक माथा टेकते रहे।
कीर्तन दरबार में गुरु तेग बहादुर साहिब की महिमा का गुणगान करते हुए बीबी बलविंद्र कौर ने... गुरु तेग बहादुर जी का शब्द कर लो गिरफ्तार हो गया हुकम लग्या न देरियां गाकर उनकी बाणी का गुणगान किया गया। इस अवसर पर बाबा सुखा सिंह ने कहा कि सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर सिंह थे, जिनको हिंद की चादर भी कहा जाता है। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। पंजाब के अमृतसर में एक अप्रैल 1621 को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। इनकी माता का नाम नानकी और पिता गुरु हरगोबिंद सिखों के छठे गुरु थे। करतारपुर की लड़ाई के बाद वह किरतपुर जा रहे थे। उस दौरान उनकी उम्र महज 13 साल थी। मुगलों की फौज की एक टुकड़ी ने उनका पीछा करते हुए फगवाड़ा के पास पलाही गांव में अचानक हमला कर दिया। इस युद्ध के दौरान पिता गुरु हरगोबिंद साहिब के साथ मुगलों से गुरु तेग बहादुर ने भी दो-दो हाथ किए। गुरु तेग बहादुर की शादी साल 1632 में जालंधर के नजदीक करतारपुर में बीबी गुजरी से हुई। फिर वह अमृतसर के पास बकाला में रहने लगे। वहीं सिखों के आठवें गुरु हरकृष्ण साहिब जी के निधन के बाद साल 1665 में गुरु तेग बहादुर अमृतसर के गुरु की गद्दी पर बैठे और सिखों के नौवें गुरु बने।
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गुरु तेग बहादुर के दौरान मुगल शासक औरंगजेब था। वहीं औरंगजेब की छवि एक कट्टर मुगल बादशाह के रूप में थी। औरंगजेब के शासनकाल में हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा था। इसका शिकार सबसे ज्यादा कश्मीरी पंडित हुए। तब श्री आनंदपुर साहिब में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शरण में कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल मदद के लिए पहुंचा। इस दौरान गुरु तेग बहादुर ने उनके धर्म की रक्षा का वचन दिया। औरंगजेब की कैद में गुरु तेग बहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। औरंगजेब ने उनके सामने तीन शर्तें रखीं। जिनमें कलमा पढ़कर मुस्लिम बनना, चमत्कार दिखाने या फिर मौत स्वीकार करने की शर्त रखी, लेकिन गुरु तेग बहादुर ने धर्म छोड़ने और चमत्कार दिखाने से इंकार कर दिया। गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब से कहा कि वह मृत्यु स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन अपने केस नहीं कटवा सकते हैं। जिस पर 24 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया। कीर्तन में भाई संदीप सिंह, भाई तजिंद्र, भाई लखविंद्र सिंह ने भी गुरु की महिमा का गुणगान किया। इस अवसर पर आयोजित लंगर में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
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