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रबी सीजन में डीएपी खाद की जरूरत ३० हजार एमटी, उपलब्ध दो हजार एमटी
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जिले में डीएपी और यूरिया खाद की भारी कमी है। रबी सीजन के लिए 30 हजार मीट्रिक टन डीएपी की आवश्यकता है, जबकि फिलहाल दो हजार मीट्रिक टन की ही उपलब्धता है। वहीं यूरिया 90 हजार मीट्रिक टन यूरिया की जरूरत होगी, जबकि 15 हजार की उपलब्धता है। ऐसे में अगर जल्द संज्ञान नहीं लिया गया तो गेहूं बिजाई में किसानों के समक्ष संकट खड़ा हो सकता है।
अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में गेहूं की बिजाई शुरू हो जाएगी। वहीं नवंबर के प्रथम सप्ताह में यह जोर पकड़ेगी, लेकिन फिलहाल जिले में डीएपी और यूरिया खाद का संकट बना हुआ है। इस लेकर किसान ही नहीं अपितु कृषि विभाग के अधिकारी भी चिंतित हैं। स्थिति यह है कि रबी सीजन में छह महीने के दौरान डीएपी खाद की खपत करीब 30 हजार मीट्रिक टन होती है, जबकि इस समय जिले में दो हजार मीट्रिक टन ही डीएपी खाद उपलब्ध है। अकेले गेहूूं की बिजाई के लिए ही करीब 20 हजार मीट्रिक टन डीएपी खाद की आवश्यकता होगी। करीब 1.72 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बिजाई की जानी है। इसके अलावा रबी सीजन में गेहूं, आलू, सब्जियों व गन्ना फसल के लिए डीएपी का इस्तेमाल किया जाता है। विदित हो कि सहकारी समितियों, प्राइवेट डीलर्स, इफ्को व कृभको के बिक्री केंद्रों के मार्फत खाद की बिक्री होती है। जिले में करीब 1400 प्राइवेट खाद विक्रेता हैं। होल सेलर करीब 20 हैं जिनसे विक्रेताओं को खाद भेजी जाती है।
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डीएपी खाद बाबत विभाग से लगातार पत्राचार कर रहे हैं। विक्रेताओं को हिदायत दी है कि पॉश मशीन के माध्यम से ही खाद बेचें। जिसकी मशीन बकाया खाद दर्शा रही है और मौके पर खाद उपलब्ध नहीं है उसे दुरुस्त करें। पूरे रबी सीजन में 90 हजार मीट्रिक टन यूरिया खाद चाहिए। हमारे पास 15 हजार मीट्रिक टन यूरिया इस समय उपलब्ध है। डीएपी की उपलब्धता के भी प्रयास किए जा रहे हैं।
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- डॉ. आदित्य प्रताप डबास, उपनिदेशक, कृषि विभाग।
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जिन किसानों ने धान की कटाई कर ली है और गेहूं बिजाई के लिए खेत तैयार कर रहे हैं। वे किसान अक्तूबर के अंत में बिजाई शुरू कर देते हैं। समय पर खाद नहीं मिला तो गेहूं की फसल को नुकसान होगा। डीएपी खाद की कमी पूरे उत्तर भारत में है। खाद के प्रबंधन में कई सालों से गड़बड़ी है।
- विजय कपूर, प्रदेश महासचिव, किसान क्लब।
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यदि समय पर डीएपी नहीं मिला तो गेहूं बिजाई के दौरान भारी दिक्कत होगी। सरकार को सीजन से पहले ही इंतजाम कर लेने चाहिए ताकि किसानों को परेशानी न हो। किसी भी माध्यम से किसान को डीएपी खाद नहीं मिल रहा। मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिश के अनुसार खेत में उर्वरक डालने पड़ते हैं।
- धर्मवीर सतीजा, प्रगतिशील किसान।
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अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में गेहूं की बिजाई शुरू हो जाएगी। वहीं नवंबर के प्रथम सप्ताह में यह जोर पकड़ेगी, लेकिन फिलहाल जिले में डीएपी और यूरिया खाद का संकट बना हुआ है। इस लेकर किसान ही नहीं अपितु कृषि विभाग के अधिकारी भी चिंतित हैं। स्थिति यह है कि रबी सीजन में छह महीने के दौरान डीएपी खाद की खपत करीब 30 हजार मीट्रिक टन होती है, जबकि इस समय जिले में दो हजार मीट्रिक टन ही डीएपी खाद उपलब्ध है। अकेले गेहूूं की बिजाई के लिए ही करीब 20 हजार मीट्रिक टन डीएपी खाद की आवश्यकता होगी। करीब 1.72 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बिजाई की जानी है। इसके अलावा रबी सीजन में गेहूं, आलू, सब्जियों व गन्ना फसल के लिए डीएपी का इस्तेमाल किया जाता है। विदित हो कि सहकारी समितियों, प्राइवेट डीलर्स, इफ्को व कृभको के बिक्री केंद्रों के मार्फत खाद की बिक्री होती है। जिले में करीब 1400 प्राइवेट खाद विक्रेता हैं। होल सेलर करीब 20 हैं जिनसे विक्रेताओं को खाद भेजी जाती है।
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डीएपी खाद बाबत विभाग से लगातार पत्राचार कर रहे हैं। विक्रेताओं को हिदायत दी है कि पॉश मशीन के माध्यम से ही खाद बेचें। जिसकी मशीन बकाया खाद दर्शा रही है और मौके पर खाद उपलब्ध नहीं है उसे दुरुस्त करें। पूरे रबी सीजन में 90 हजार मीट्रिक टन यूरिया खाद चाहिए। हमारे पास 15 हजार मीट्रिक टन यूरिया इस समय उपलब्ध है। डीएपी की उपलब्धता के भी प्रयास किए जा रहे हैं।
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- डॉ. आदित्य प्रताप डबास, उपनिदेशक, कृषि विभाग।
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जिन किसानों ने धान की कटाई कर ली है और गेहूं बिजाई के लिए खेत तैयार कर रहे हैं। वे किसान अक्तूबर के अंत में बिजाई शुरू कर देते हैं। समय पर खाद नहीं मिला तो गेहूं की फसल को नुकसान होगा। डीएपी खाद की कमी पूरे उत्तर भारत में है। खाद के प्रबंधन में कई सालों से गड़बड़ी है।
- विजय कपूर, प्रदेश महासचिव, किसान क्लब।
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यदि समय पर डीएपी नहीं मिला तो गेहूं बिजाई के दौरान भारी दिक्कत होगी। सरकार को सीजन से पहले ही इंतजाम कर लेने चाहिए ताकि किसानों को परेशानी न हो। किसी भी माध्यम से किसान को डीएपी खाद नहीं मिल रहा। मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिश के अनुसार खेत में उर्वरक डालने पड़ते हैं।
- धर्मवीर सतीजा, प्रगतिशील किसान।