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पराली में छिपा करोड़ों का खजाना, इसे न जलाना
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201: धान के अवशेष । अमर उजाला
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कर्मबीर लाठर
करनाल। प्रदेश में धान की फसल से होने वाली 68 लाख टन पराली में करीब 40 करोड़ का खजाना छिपा होता है। अज्ञानतावश जो किसान जितनी मात्रा में पराली जलाता है, वह उसी अनुपात में अपना नुकसान करता है। विशेषज्ञों के अनुसार एक टन पराली में नाइट्रोजन की मात्रा पांच से आठ किलो, फास्फोरस करीब एक से 1.2 किलो, पोटाश 12 से 17 किलो, सल्फर आधा से एक किलो तक, कैल्शियम तीन से चार किलो, मैग्नीशियम एक से तीन किलो तथा सिल्का जो पौधे में जान डालता है वह 40 से 70 किलो तक होता है।
महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल के प्रोफेसर डा. विजय अरोड़ा ने बताया कि 68 लाख टन धान पराली में नाइट्रोजन 98 लाख किलो, 4 लाख किलो फास्फोरस, पोटाश 46 लाख किलो, सल्फर की मात्रा 8 लाख किलो तक होती है। चार तत्वों में नाइट्रोजन की कीमत 13.6 करोड़, फास्फोरस की 2.7 करोड़, पोटाश की 19.3 करोड़ रुपये तथा सल्फर की कीमत 2.2 करोड़ रुपये बनती है। इसके अलावा सूक्ष्म तत्व होते हैं। इन सभी पोषक तत्वों की कुल कीमत करीब 40 लाख करोड़ रुपये बनती है।
उन्होंने बताया कि पराली अवशेष जलाने से नाइट्रोजन 90 प्रतिशत, फास्फोरस का 25 प्रतिशत, पोटाश 20 प्रतिशत और सल्फर की मात्रा 7 प्रतिशत खत्म हो जाती है। इसके अलावा कार्बन सारा ही खत्म हो जाता है। यही कारण है कि कार्बन की इस समय जमीन में सबसे ज्यादा कमी हो रही है। प्रदेश में धान का रकबा करीब 12 लाख हेक्टेयर रहता है। करनाल, कुरुक्षेत्र, फतेहाबाद, सिरसा व कैथल जिले अवशेष जलाने के मामले में ज्यादा संवेदनशील हैं। करनाल में धान का रकबा करीब 1.65 लाख हेक्टेयर है।
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जमीन में सहेजने की दी सलाह
डा. अरोड़ा ने बताया कि अवशेष जलाने से कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइट व विषैले कण वातावरण में घुलते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए ज्यादा नुकसानदायक हैं। इन दिनों आग से वातावरण में नमी बनने से स्मॉग बनेगा जिस कारण न केवल सड़कों पर यातायात प्रभावित होगा, बल्कि अस्थमा मरीजों को बहुत दिक्कत पैदा होगी। उन्होंने अवशेष न जलाने और इस संपदा को जमीन में सहेजने की सलाह दी।
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करनाल। प्रदेश में धान की फसल से होने वाली 68 लाख टन पराली में करीब 40 करोड़ का खजाना छिपा होता है। अज्ञानतावश जो किसान जितनी मात्रा में पराली जलाता है, वह उसी अनुपात में अपना नुकसान करता है। विशेषज्ञों के अनुसार एक टन पराली में नाइट्रोजन की मात्रा पांच से आठ किलो, फास्फोरस करीब एक से 1.2 किलो, पोटाश 12 से 17 किलो, सल्फर आधा से एक किलो तक, कैल्शियम तीन से चार किलो, मैग्नीशियम एक से तीन किलो तथा सिल्का जो पौधे में जान डालता है वह 40 से 70 किलो तक होता है।
महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल के प्रोफेसर डा. विजय अरोड़ा ने बताया कि 68 लाख टन धान पराली में नाइट्रोजन 98 लाख किलो, 4 लाख किलो फास्फोरस, पोटाश 46 लाख किलो, सल्फर की मात्रा 8 लाख किलो तक होती है। चार तत्वों में नाइट्रोजन की कीमत 13.6 करोड़, फास्फोरस की 2.7 करोड़, पोटाश की 19.3 करोड़ रुपये तथा सल्फर की कीमत 2.2 करोड़ रुपये बनती है। इसके अलावा सूक्ष्म तत्व होते हैं। इन सभी पोषक तत्वों की कुल कीमत करीब 40 लाख करोड़ रुपये बनती है।
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उन्होंने बताया कि पराली अवशेष जलाने से नाइट्रोजन 90 प्रतिशत, फास्फोरस का 25 प्रतिशत, पोटाश 20 प्रतिशत और सल्फर की मात्रा 7 प्रतिशत खत्म हो जाती है। इसके अलावा कार्बन सारा ही खत्म हो जाता है। यही कारण है कि कार्बन की इस समय जमीन में सबसे ज्यादा कमी हो रही है। प्रदेश में धान का रकबा करीब 12 लाख हेक्टेयर रहता है। करनाल, कुरुक्षेत्र, फतेहाबाद, सिरसा व कैथल जिले अवशेष जलाने के मामले में ज्यादा संवेदनशील हैं। करनाल में धान का रकबा करीब 1.65 लाख हेक्टेयर है।
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जमीन में सहेजने की दी सलाह
डा. अरोड़ा ने बताया कि अवशेष जलाने से कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइट व विषैले कण वातावरण में घुलते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए ज्यादा नुकसानदायक हैं। इन दिनों आग से वातावरण में नमी बनने से स्मॉग बनेगा जिस कारण न केवल सड़कों पर यातायात प्रभावित होगा, बल्कि अस्थमा मरीजों को बहुत दिक्कत पैदा होगी। उन्होंने अवशेष न जलाने और इस संपदा को जमीन में सहेजने की सलाह दी।