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ताने नहीं तोड़ पाए हौसले, आज देते हैं मिसाल
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माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। जब खेल शुरू किया तो शुरूआती दिनों में साइकिल नहीं आती थी। इसलिए डंडा साइकिल से अभ्यास किया। इस दौरान पुरुषों के साथ भी अभ्यास करना पड़ता था, जिस पर कुछ लोग ताने मारते थे और कहते थे कि लड़की बिगड़ जाएगी। यह सुनकर परिवार वाले भी खेल छोड़ने का दबाव बनाने लगे थे। लेकिन मां ने हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया। वह कहती थीं लोग क्या कहते हैं इसकी परवाह न करो। मगर खुद सही रहो और अपने लक्ष्य तक पहुंचो और आज वही लोग मेरी मिसाल देते हैं। यह कहना है साइकिलिंग प्रशिक्षक मुकेश शर्मा का।
शांति नगर गली नंबर एक निवासी मुकेश शर्मा ने बताया कि उनके पिता सत्यपाल शर्मा रोडवेज कर्मचारी हैं। पांच भाई-बहनों में वह चौथे नंबर की बेटी हैं। दो भाई हैं, जिनमें एक विदेश में है, दूसरे पोलियो है। वह हमेशा परिवार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती हैं। इसलिए माता-पिता कहते हैं ये हमारी बेटी नहीं, बेटा है।
मुकेश ने बताया कि पढ़ाई के लिए यमुनानगर हॉस्टल में रहने के दौरान एक बार पिता जी ने कह दिया था, बस बहुत है बीए कर लिया, अब शादी कर लो लेकिन मां कलावती शर्मा ने हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया। इसलिए इस मुकाम पर पहुंच सकी।
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10 वर्ष तक खेला वॉलीबॉल
2002 से लगभग 10 वर्ष तक वॉलीबॉल खेला और कई बार टीम को प्रदेश स्तर पर स्वर्ण पदक दिलाया। इसी दौरान वॉलीबॉल की टीम टूट गई और लगा कि आगे के सपने भी टूट गए। फिर प्रशिक्षक जोगेंद्र सर के कहने पर कुछ समय ताइक्वांडो भी खेला। अंत में साइकिलिंग में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। इसके बाद पटियाला से एनआईएस किया और अब माता सुंदरी खालसा गर्ल्स कालेज निसिंग में शारीरिक शिक्षक के पद पर कार्य कर रही हूं। मैं अक्सर लड़कों वाले लुक में रहती थी। आज ताना देने वाले लोग ही अपने बच्चों से कहते हैं कि बेटी हो तो मुकेश जैसी। उन्होंने महिलाओं को संदेश दिया कि लोग क्या कहेंगे, इसकी परवाह न करें और आगे बढ़ते रहें।
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करनाल। जब खेल शुरू किया तो शुरूआती दिनों में साइकिल नहीं आती थी। इसलिए डंडा साइकिल से अभ्यास किया। इस दौरान पुरुषों के साथ भी अभ्यास करना पड़ता था, जिस पर कुछ लोग ताने मारते थे और कहते थे कि लड़की बिगड़ जाएगी। यह सुनकर परिवार वाले भी खेल छोड़ने का दबाव बनाने लगे थे। लेकिन मां ने हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया। वह कहती थीं लोग क्या कहते हैं इसकी परवाह न करो। मगर खुद सही रहो और अपने लक्ष्य तक पहुंचो और आज वही लोग मेरी मिसाल देते हैं। यह कहना है साइकिलिंग प्रशिक्षक मुकेश शर्मा का।
शांति नगर गली नंबर एक निवासी मुकेश शर्मा ने बताया कि उनके पिता सत्यपाल शर्मा रोडवेज कर्मचारी हैं। पांच भाई-बहनों में वह चौथे नंबर की बेटी हैं। दो भाई हैं, जिनमें एक विदेश में है, दूसरे पोलियो है। वह हमेशा परिवार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती हैं। इसलिए माता-पिता कहते हैं ये हमारी बेटी नहीं, बेटा है।
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मुकेश ने बताया कि पढ़ाई के लिए यमुनानगर हॉस्टल में रहने के दौरान एक बार पिता जी ने कह दिया था, बस बहुत है बीए कर लिया, अब शादी कर लो लेकिन मां कलावती शर्मा ने हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया। इसलिए इस मुकाम पर पहुंच सकी।
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10 वर्ष तक खेला वॉलीबॉल
2002 से लगभग 10 वर्ष तक वॉलीबॉल खेला और कई बार टीम को प्रदेश स्तर पर स्वर्ण पदक दिलाया। इसी दौरान वॉलीबॉल की टीम टूट गई और लगा कि आगे के सपने भी टूट गए। फिर प्रशिक्षक जोगेंद्र सर के कहने पर कुछ समय ताइक्वांडो भी खेला। अंत में साइकिलिंग में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। इसके बाद पटियाला से एनआईएस किया और अब माता सुंदरी खालसा गर्ल्स कालेज निसिंग में शारीरिक शिक्षक के पद पर कार्य कर रही हूं। मैं अक्सर लड़कों वाले लुक में रहती थी। आज ताना देने वाले लोग ही अपने बच्चों से कहते हैं कि बेटी हो तो मुकेश जैसी। उन्होंने महिलाओं को संदेश दिया कि लोग क्या कहेंगे, इसकी परवाह न करें और आगे बढ़ते रहें।