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कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज में फिर सामने आया भ्रष्टाचार का 'जिन्न', अधिकारियों में हड़कंप

Fri, 03 Jan 2020 03:14 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, करनाल(हरियाणा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, करनाल(हरियाणा) Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 03 Jan 2020 03:14 PM IST
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corruption in kalpana chawla medical college karnal
कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज - फोटो : अमर उजाला
कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज में एक बार फिर से भ्रष्टाचार का जिन्न बाहर आया है। इस बार मामला नर्स के पद पर नौकरी लगाने के नाम पर 80 हजार रुपये लेने का आरोप है। शिकायतकर्ता का दावा है कि नौकरी के बदले 10 हजार रुपये नकद और 70 हजार रुपये कॉलेज के सीनियर अकाउंटेंट जितेंद्र कुमार के बैंक खाते में जमा कराए गए हैं। इसके अलावा, सिफारिशों पर अपने रिश्तेदारों और अयोग्य लोगों को नौकरियां देने के भी आरोप हैं।
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मामला यहीं पर खत्म नहीं होता, आरोप ये भी है कि कॉलेज में आउटसोर्सिंग एजेंसियों द्वारा न तो कर्मचारियों का पीएफ जमा कराया गया है और न ही उनको ईएसआई कार्ड दिए गए हैं। सबसे गंभीर बात ये है कि सरकार के आदेश के बावजूद एसक्रो अकाउंट नहीं खोले गए। एसक्रो अकाउंट वो होते हैं, जिसमें ठेकेदार सीधे ही कर्मचारियों के खाते में सैलरी जमा कराता है। इसके अलावा, सरकारी की पालिसी होने के बावजूद आउटसोर्सिंग की नौकरियों में आरक्षण को लागू नहीं किया जा रहा है।
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इस तरह के आरोपों के बाद मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों में भी हड़कंप की स्थिति बनी हुई है। ये आरोप आस फाउंडेशन की अध्यक्ष रानी कांबोज और दीपक मेहरा ने मीडिया से सामने लगाए। रानी कांबोज ने कहा कि मेडिकल कॉलेज में खुले आम भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है। कांबोज ने सीधे तौर पर मेडिकल कॉलेज की कार्यकारी निदेशक डा. हिमांशु मदान पर आरोप लगाया और कहा कि न तो कॉलेज में सरकार का पालिसी को लागू किया जा रहा है और न ही कर्मचारियों का शोषण रोका जा रहा है।
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नौकरियों के नाम पर बंदरबांट की गई है, नौकरियां पैसे में बेची गई हैं या फिर अपने चेहतों को लगा लिया गया। अन्य लोगों से सरेआम नौकरी के नाम पर 50 हजार रुपये से लेकर 1.50 लाख रुपये तक की रिश्वत ली गई है। इस मामले की शिकायत स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के पास भेजी गई, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने जानबूझ कर इस जांच को दबा लिया। कांबोज का आरोप है कि वर्ष 2017 से आउट सोर्सिंग के कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है। उनको न तो ईएसआई कार्ड दिए गए हैं और न ही पीएफ जमा कराया जा रहा है।

एक लाख रुपये मंथली मांगने का लगाया आरोप

आस फाउंडेशन और केपी एजेंसी के संचालक संजय भाटिया ने आरोप लगाया कि उससे प्रति माह के हिसाब से एक लाख रुपये की मांग की गई, पैसे देने से मना करने के बाद उनका टेंडर रद्द कर दिया गया। इसके लिए पहले 15 दिन का नोटिस दिया जाता है, लेकिन सबकुछ आनन फानन में किया गया है। भाटिया ने आरोप लगाया कि वे खुद अधिकारियों के भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए करनाल आएंगे और बाकायदा इसके दस्तावेज सौंपेंगे। भाटिया ने ये भी आरोप लगाया कि जानबूझकर अपने चहेतों को काम देने के लिए ऐसा किया गया है। वे इस मामले को लेकर अदालत में जाएंगे।

योग्य नहीं होने के बावजूद डायरेक्टर पद पर जमी
आस फाउंडेशन ने ये भी सवाल उठाया कि लाबिंग और सिफारिश के दम पर डा. हिमांशु को कॉलेज का कार्यकारी निदेशक बनाया गया है, ताकि भ्रष्टाचार के मामलों को दबाया जा सके। गौरतलब है कि डा. हिमांशु से सीनियर डा. जगदीश दुरेजा इस मामले में हाईकोर्ट में केस डाल चुके हैं और हाईकोर्ट ने डा. हिमांशु के स्थान पर डा. दुरेजा को कार्यकारी निदेशक लगाने के आदेश दिए थे, बावजूद इसके आज तक डा. हिमांशु सीट पर जमी हैं।  

आरक्षण की पॉलिसी नहीं लागू, सिफारिश पर मिलती है नौकरी
आस फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि कॉलेज में केवल सिफारिश और पैसे के दम पर नौकरी मिलती हैं। यहां पर योग्यता कोई मायने नहीं रखती। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल भाजपा के विधायक और सांसद दबाव बनाने के लिए कॉलेज का निरीक्षण करते हैं और पुराने कर्मचारियों को हटाकर नये को रखने के लिए दबाव बनाते हैं। इस मामले की जांच की जाए तो कॉलेज के कर्मचारियों ने अपने रिश्तेदारों को नौकरी पर रखा हुआ है, जबकि वे इसके लिए योग्य भी नहीं हैं।

पहले भी कई मामले आ चुके हैं सामने

बता दें कि जब से मेडिकल कॉलेज शुरू हुआ है, तभी से विवाद चल रहे हैं। कॉलेज में नौकरियों के नाम पर पैसे लेने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। इतना ही नहीं पुलिस पैसे लेकर नौकरियां लगाने के मामलों में एफआईआर तक दर्ज कर चुकी है और तीन लोग इसमें गिरफ्तार भी हो चुके हैं। हालांकि, अभी तक कॉलेज का कोई कर्मचारी इसमें पकड़ा नहीं गया है। लेकिन सवाल ये है कि बिना किसी कर्मचारी व अधिकारियों की मिलीभगत के कॉलेज में किसी को नौकरी कैसे मिल सकती है?

सभी आरोप निराधार, ठेका रद्द होना है कारण: जितेंद्र कुमार
इस बारे में मेडिकल कॉलेज के सीनियर अकाउंटेंट जितेंद्र कुमार का पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने सभी आरोपों को निराधार बताया। जितेंद्र कुमार ने कहा कि न तो उनका एक्सेस बैंक में खाता है और न ही किसी जानकार का है। दूसरा न तो मैं किसी नर्स से मिला और न ही किसी से पैसे लिए। ये सब ठेकेदार द्वारा ठेका रद्द होने की रंजिश में किया जा रहा है। मैं हर तरह की जांच के लिए तैयार हूं, अगर उनके पास कोई सबूत हो तो पेश करें।

आरोप निराधार, सबूत पेश करें : हिमांशु मदान
इस बारे में मेडिकल कॉलेज की कार्यकारी निदेशक डा. हिमांशु मदान का कहना है कि ऐसे कोई भी किसी पर आरोप लगा सकता है। अगर उनके पास सबूत हैं तो वे दिखाएं। जहां तक ठेकेदार का ठेका रद्द होने की बात है तो आप ठेकेदार के बारे में पता करें, उसके  खिलाफ कितनी शिकायतें हैं। रही बात सीनियर अकाउंट आफिसर जितेंद्र कुमार की, तो उस बारे में मुझे जानकारी नहीं है। हालांकि, जितेंद्र कुमार काबिल कर्मचारी है, अगर किसी ने पैसे लिए हैं तो उसकी जांच की जाएगी और सख्त कार्रवाई भी की जाएगी। मैं न तो गलत कार्य करती हूं और न ही गलत काम बर्दाश्त करती हूं?
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