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भीष्म भवन से भारतीय ध्वज नहीं उतार पाई थी ब्रिटिश हुकूमत
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201: स्वामी भीष्म जी महाराज । फाइन फोटो
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कर्मबीर लाठर
करनाल। आजादी की जंग में क्रांतिकारियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने वाले स्वामी भीष्म जी महाराज के घरौंडा स्थित भीष्म भवन से ब्रिटिश हुकूमत वर्ष 1939 में भारतीय ध्वज नहीं उतार पाई थी। ब्रिटिश सत्ता ने कड़ा विरोध किया, लेकिन ध्वज को टस से मस नहीं कर सकी। स्वामी जी को 1936 में आर्य समाज सभा घरौंडा के वार्षिक उत्सव में आमंत्रित किया गया था। यहां के निवासियों के अनुरोध पर उन्होंने 19 अप्रैल 1939 को भीष्म भवन की स्थापना की थी। जो बाद में गुरुकुल कहलाया। जिसे उन्होंने अपने शिष्य स्वामी रामेश्वरानंद को सौंप दिया था। 125 वर्ष की आयु में आठ जनवरी 1984 को उनका देहावसान घरौंडा आश्रम में हुआ। उनके नाम पर घरौंडा शहर में भीष्म मार्ग है, विडंबना है कि नामकरण के बाद कोई शिलालेख तक नहीं लगाया। हर्बल पार्क में 2019 में विधायक हरविंद्र कल्याण ने स्वामी भीष्म पुस्तकालय का निर्माण कराया।
इतिहासकार बताते हैं कि स्वामी भीष्म जी महाराज का जन्म 7 मार्च 1859 को कुरुक्षेत्र जिले के गांव त्योड़ा में पांचाल ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका बचपन का नाम लाल सिंह था। वे उग्र राष्ट्रवादियों के संपर्क में थे। अंबाला के एक क्रांतिकारी दल की योजना अनुसार 1878 में कानपुर में जाकर ब्रिटिश फौज में भर्ती हो गए। डेढ़ वर्ष सेना में रहे। सैन्य प्रशिक्षण हासिल होने के बाद वे वहां से हथियार लेकर फरार हो गए। ब्रिटिश सत्ता उनकी तलाश करती रही। वे मेरठ के जंगलों में जाकर क्रांतिकारी दोस्तों से मिले और सभी को हथियार बांटकर भूमिगत हो गए। बाद में उन्होंने उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद जिले के करहैड़ा नामक गांव में संस्कृत पाठशाला के रूप में आश्रम बनाया। वह आश्रम क्रांतिकारियों के छिपने, निशानेबाजी सीखने और हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने का गुप्त केंद्र था। आश्रम में लालबहादुर शास्त्री, रामचंद्र जी विकल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, असफाक उल्ला खां व चौधरी चरण सिंह भी स्वामी जी के पास विचार-विमर्श करने जाते थे।
भगत सिंह से की थी मुलाकात
बाद में वे सनातनी सन्यासी हुए। सोनीपत जिले के बलि ब्राह्मण गांव में वेदांती गुरु योगीराज से दीक्षा ली और तब स्वयं के हाथों से इंद्री छेदन करने के कारण वे भीष्म ब्रह्मचारी के नाम से विख्यात हुए। कुछ वर्षों बाद उन्होंने आर्य समाज को अपनाया और प्रचार करते रहे। 1919 में जब अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों पर रोलेट एक्ट थोपा तो दिल्ली में स्वामी श्रद्धानंद ने जनता को संबोधित किया था, तब स्वामी भीष्म जी उनके साथ थे। शहीद ए आजम भगत सिंह को फांसी से पूर्व वे उनसे मिलने जेल गए थे।
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आपातकाल में भी किए गए नजरबंद
स्वामी भीष्म महाराज 1934 में करैहड़ा आश्रम से जींद के पांडू पिंडारा गांव आ गए और वहां तीर्थ पर कुटिया बनाकर रहने लगे। वह आर्य समाज की शिक्षाओं का प्रचार करने लगे। जुलानी गांव के गोरक्षक फूल सिंह जाट ने उनकी प्रेरणा से जींद रियासत के बूचड़खाने बंद करवा दिए। 1981 में 21 से 24 मई तक केंद्र सरकार ने भीष्म महाराज का कुरुक्षेत्र में अभिनंदन समारोह आयोजित किया था। 27 मार्च 1983 को राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पांडू पिंडारा-जींद में स्वामी जी से मिलने आए थे। आजादी के बाद 1975 में जब आपातकाल लगा तो स्वामी जी व उनके शिष्यों को घरौंडा आश्रम में नजरबंद कर दिया था। स्वामी जी ने अपने जीवन में 250 किताबों लिखीं और 95 वर्ष आर्य समाज का प्रचार किया। 85 भजन मंडलियां तैयार की थी। जीवन पर्यंत सामाजिक बुराइयां का विरोध किया। घरौंडा स्थित राजकीय कॉलेज का नामकरण स्वामी जी के नाम से किया जाए तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
- प्रोफेसर विनय डांगी, इतिहासकार, राजकीय महिला महाविद्यालय, मतलौडा (पानीपत)
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करनाल। आजादी की जंग में क्रांतिकारियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने वाले स्वामी भीष्म जी महाराज के घरौंडा स्थित भीष्म भवन से ब्रिटिश हुकूमत वर्ष 1939 में भारतीय ध्वज नहीं उतार पाई थी। ब्रिटिश सत्ता ने कड़ा विरोध किया, लेकिन ध्वज को टस से मस नहीं कर सकी। स्वामी जी को 1936 में आर्य समाज सभा घरौंडा के वार्षिक उत्सव में आमंत्रित किया गया था। यहां के निवासियों के अनुरोध पर उन्होंने 19 अप्रैल 1939 को भीष्म भवन की स्थापना की थी। जो बाद में गुरुकुल कहलाया। जिसे उन्होंने अपने शिष्य स्वामी रामेश्वरानंद को सौंप दिया था। 125 वर्ष की आयु में आठ जनवरी 1984 को उनका देहावसान घरौंडा आश्रम में हुआ। उनके नाम पर घरौंडा शहर में भीष्म मार्ग है, विडंबना है कि नामकरण के बाद कोई शिलालेख तक नहीं लगाया। हर्बल पार्क में 2019 में विधायक हरविंद्र कल्याण ने स्वामी भीष्म पुस्तकालय का निर्माण कराया।
इतिहासकार बताते हैं कि स्वामी भीष्म जी महाराज का जन्म 7 मार्च 1859 को कुरुक्षेत्र जिले के गांव त्योड़ा में पांचाल ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका बचपन का नाम लाल सिंह था। वे उग्र राष्ट्रवादियों के संपर्क में थे। अंबाला के एक क्रांतिकारी दल की योजना अनुसार 1878 में कानपुर में जाकर ब्रिटिश फौज में भर्ती हो गए। डेढ़ वर्ष सेना में रहे। सैन्य प्रशिक्षण हासिल होने के बाद वे वहां से हथियार लेकर फरार हो गए। ब्रिटिश सत्ता उनकी तलाश करती रही। वे मेरठ के जंगलों में जाकर क्रांतिकारी दोस्तों से मिले और सभी को हथियार बांटकर भूमिगत हो गए। बाद में उन्होंने उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद जिले के करहैड़ा नामक गांव में संस्कृत पाठशाला के रूप में आश्रम बनाया। वह आश्रम क्रांतिकारियों के छिपने, निशानेबाजी सीखने और हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने का गुप्त केंद्र था। आश्रम में लालबहादुर शास्त्री, रामचंद्र जी विकल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, असफाक उल्ला खां व चौधरी चरण सिंह भी स्वामी जी के पास विचार-विमर्श करने जाते थे।
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भगत सिंह से की थी मुलाकात
बाद में वे सनातनी सन्यासी हुए। सोनीपत जिले के बलि ब्राह्मण गांव में वेदांती गुरु योगीराज से दीक्षा ली और तब स्वयं के हाथों से इंद्री छेदन करने के कारण वे भीष्म ब्रह्मचारी के नाम से विख्यात हुए। कुछ वर्षों बाद उन्होंने आर्य समाज को अपनाया और प्रचार करते रहे। 1919 में जब अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों पर रोलेट एक्ट थोपा तो दिल्ली में स्वामी श्रद्धानंद ने जनता को संबोधित किया था, तब स्वामी भीष्म जी उनके साथ थे। शहीद ए आजम भगत सिंह को फांसी से पूर्व वे उनसे मिलने जेल गए थे।
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आपातकाल में भी किए गए नजरबंद
स्वामी भीष्म महाराज 1934 में करैहड़ा आश्रम से जींद के पांडू पिंडारा गांव आ गए और वहां तीर्थ पर कुटिया बनाकर रहने लगे। वह आर्य समाज की शिक्षाओं का प्रचार करने लगे। जुलानी गांव के गोरक्षक फूल सिंह जाट ने उनकी प्रेरणा से जींद रियासत के बूचड़खाने बंद करवा दिए। 1981 में 21 से 24 मई तक केंद्र सरकार ने भीष्म महाराज का कुरुक्षेत्र में अभिनंदन समारोह आयोजित किया था। 27 मार्च 1983 को राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पांडू पिंडारा-जींद में स्वामी जी से मिलने आए थे। आजादी के बाद 1975 में जब आपातकाल लगा तो स्वामी जी व उनके शिष्यों को घरौंडा आश्रम में नजरबंद कर दिया था। स्वामी जी ने अपने जीवन में 250 किताबों लिखीं और 95 वर्ष आर्य समाज का प्रचार किया। 85 भजन मंडलियां तैयार की थी। जीवन पर्यंत सामाजिक बुराइयां का विरोध किया। घरौंडा स्थित राजकीय कॉलेज का नामकरण स्वामी जी के नाम से किया जाए तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
- प्रोफेसर विनय डांगी, इतिहासकार, राजकीय महिला महाविद्यालय, मतलौडा (पानीपत)