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अराईंपुरा : सैनिकों की है नर्सरी, प्रथम युद्ध से लेकर अब तक दिखा रहे शौर्य
ब्यूरो/अमर उजाला, करनाल
Updated Thu, 13 Oct 2016 12:18 AM IST
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अराईंपुरा : सैनिकों की है नर्सरी, प्रथम युद्ध से लेकर अब तक दिखा रहे शौर्य
- फोटो : Amar Ujala
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कस्बे के गांव अराईपूरा के युवाओं में देश प्रेम की भावन सीखने का मिलती है। गांव में आज भी करीब 200 युवा देश सेवा कर रहे हैं, वहीं दर्जनों लोग सेना के उच्च पदों से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। गांव के युवाओं की बहादुरी और जज्बे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रथम युद्ध से लेकर अब तक जवान देश की सीमा की रक्षा कर रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गांव के बसते समय गांव में राई मुसलमान आकर बसे थे, इसलिए इस गांव को नाम राइपूरा था। बाद में गांव में बाबा राणा शेर सिंह आकर बस गए ओर राई मुसलमान गांव छोड़ कर चले गए। इसके बाद में गांव का नाम अराईपूरा रख दिया।
गांव अराईपूरा का इतिहास काफी कहानियों से जुड़ा हुआ है। गांव में दो प्राचीन मंदिर, स्कूल व कॉलेज के साथ-साथ शहीदी स्मारक है। गांव से आधा दर्जन से ज्यादा लोग विभिन्न विभागों के उच्च अधिकारी पर तैनात हैं और कुछ सेवानिवृत हो चुके हैं।
पढ़ाई के प्रति गंभीर
गांव अराईपूरा के लोगों में देश सेवा के साथ-साथ बेटियों को पढ़ाने का जनून है। सन 1971 में गांव की पंचायती जमीन में कॉलेज बनाने के लिए ग्राम पंचायत ने लगभग 40 एकड़ जमीन बेटियों को पढ़ाने के लिए सरकार को अनुदान कर दी थी। गांव की पंचायत के पास विकास कार्य करवाने के लिए पंचायती जमीन बहुत कम है। पंचायत के पास केवल दस एकड़ जमीन बची है। जिस समय गांव में कॉलेज का निर्माण हुआ, उस समय घरौंडा व पानीपत में भी सरकारी कॉलेज नहीं था। ग्रामीणों का मलाल है कि आज तक कॉलेज में बीए व बीकॉम की कक्षाओं तक ही सीमित है।
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ग्रामीण कई बार सरकार से कॉलेज में बीएससी व पीजी की मांग कर चुके हैं, लेकिन सरकार ने ग्रामीणों की नही सुनी। युवाओं में देश सेवा का जनून गांव के युवाओं में सेना में भर्ती होने का जनून है। सन 1914 से 1919 में देश में पहला वर्ल्ड वार हुआ। इसमें गांव के 32 जवान युद्ध में गए थे। जिसमें तीन गांव के जवान शहीद हो गए थे। जिससे सरकार ने गांव में शहीदी स्मारक बनाने, जमीन देने व सड़क का निर्माण कराने बात कही थी, लेकिन ग्रामीणों ने शहीदों की शहादत को याद रखने के लिए गांव में शहीदी स्मारक बनाने की मांग रखी थी। पूरे क्षेत्र के किसी भी गांव में शहीदी स्मारक है।
गांव में भाईचारे को प्राथमिकता दी जाती है। गांव के सरपंच महेंद्र उर्फ अरग सिंह, बलराज सिंह, यशपाल, अजय सिंह, अनिल राणा, नरेश सेन ने बताया कि गांव में राजपूत बिरादरी बाहुल्य है और राजपूतों की पूरी बिरादरी एक ही बाबा की औलाद है। गांव में राजपूत बिरादरी की आबादी लगभग चार हजार है।
युद्ध में कुशलता से कार्य करने पर मिले मेडल
सेवानिवृत्त सुबेदार शगुन ने बताया कि सन 1914 से 1919 व 1939-1945 व 1962 में देश में हुए युद्धों में गांव के काफी लोगों ने हिस्सा लिया। जिसमें तीन लोग शहीद हो गए थे। तथा युद्ध में अच्छी कुशलता दिखाने पर सरकार ने शगुन राणा, सुबेदार मलादारा, सुनहरा सहित अन्य फौजियों को मेडल से सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि गांव के युवओं में देश सेवा की भावना है और आज भी लगभग सैकड़ों युवा देश की सेवा कर रहे है।
ये रहे इस गांव के अधिकारी
गांव अराईपूरा का इतिहास बहुत पुराना है। उन्होंने बताया कि सन 1922 में वजीर नामक व्यक्ति ने बीएससी पाकिस्तान के शहर लायलपुर में की थी और वे उपनिदेशक के पद पर तैनात हुए हैं। गांव के राजीव शर्मा कमिश्नर पद से सेवानिवृत्त हुए और बाद में उनको चुनाव आयोग का आयुक्त नियुक्त किया गया। राजीव शर्मा को इस समय स्वर्ण जयंती को नोडल अधिकारी लगाया गया है। आरपी सिंह चीफ टाउन प्लानर के पद से सेवानिवृत्त हुए है। गांव के डॉ सुरेश कुमार वैज्ञानिक भी और राजकुमार रेलवे विभाग में उच्चाधिकारी पद पर है। गांव के लवकुश योगा में गोल्ड मेडलिस्ट भी रहे है। गांव में काफी ऐसी बातें हैं, जो कि क्षेत्र को गौरववांवित कर रही है।
अब खेल अकादमी की जरूरत
सरपंच गांव के सरपंच महेंद्र सिंह ने बताया कि गांव में विकास कार्य करवाने के लिए पंचायती जमीन बहुत कम है। गांव की बेटियों को पढ़ाने के लिए 40 एकड़ जमीन कॉलेज के लिए अनुदान दे दी है। उन्होंने कहा कि खाली पड़ी जमीन में व्यायामशाला व खेल एकेडमी बनाई जाएं। उन्होंने कहा कि गांव में सभी बिरादारिया भाई चारे से रहती है। गांव के छोटे छोटे झगड़े पंचायती तौर पर निपटाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने गांव की कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि इस गांव में काफी चीजें प्राचीन है और गांव के युवाओं में देश प्रेम भावना आज भी पूरी तरह से जागृत है। इस गांव के सैकड़ों लोग सेना से सेवानिवृत्त हो चुके है ओर गांव के काफी लोगों ने सरकार में उच्च पदों पर रहकर गांव का नाम रोशन भी किया है।
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गांव अराईपूरा का इतिहास काफी कहानियों से जुड़ा हुआ है। गांव में दो प्राचीन मंदिर, स्कूल व कॉलेज के साथ-साथ शहीदी स्मारक है। गांव से आधा दर्जन से ज्यादा लोग विभिन्न विभागों के उच्च अधिकारी पर तैनात हैं और कुछ सेवानिवृत हो चुके हैं।
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पढ़ाई के प्रति गंभीर
गांव अराईपूरा के लोगों में देश सेवा के साथ-साथ बेटियों को पढ़ाने का जनून है। सन 1971 में गांव की पंचायती जमीन में कॉलेज बनाने के लिए ग्राम पंचायत ने लगभग 40 एकड़ जमीन बेटियों को पढ़ाने के लिए सरकार को अनुदान कर दी थी। गांव की पंचायत के पास विकास कार्य करवाने के लिए पंचायती जमीन बहुत कम है। पंचायत के पास केवल दस एकड़ जमीन बची है। जिस समय गांव में कॉलेज का निर्माण हुआ, उस समय घरौंडा व पानीपत में भी सरकारी कॉलेज नहीं था। ग्रामीणों का मलाल है कि आज तक कॉलेज में बीए व बीकॉम की कक्षाओं तक ही सीमित है।
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ग्रामीण कई बार सरकार से कॉलेज में बीएससी व पीजी की मांग कर चुके हैं, लेकिन सरकार ने ग्रामीणों की नही सुनी। युवाओं में देश सेवा का जनून गांव के युवाओं में सेना में भर्ती होने का जनून है। सन 1914 से 1919 में देश में पहला वर्ल्ड वार हुआ। इसमें गांव के 32 जवान युद्ध में गए थे। जिसमें तीन गांव के जवान शहीद हो गए थे। जिससे सरकार ने गांव में शहीदी स्मारक बनाने, जमीन देने व सड़क का निर्माण कराने बात कही थी, लेकिन ग्रामीणों ने शहीदों की शहादत को याद रखने के लिए गांव में शहीदी स्मारक बनाने की मांग रखी थी। पूरे क्षेत्र के किसी भी गांव में शहीदी स्मारक है।
गांव में भाईचारे को प्राथमिकता दी जाती है। गांव के सरपंच महेंद्र उर्फ अरग सिंह, बलराज सिंह, यशपाल, अजय सिंह, अनिल राणा, नरेश सेन ने बताया कि गांव में राजपूत बिरादरी बाहुल्य है और राजपूतों की पूरी बिरादरी एक ही बाबा की औलाद है। गांव में राजपूत बिरादरी की आबादी लगभग चार हजार है।
युद्ध में कुशलता से कार्य करने पर मिले मेडल
सेवानिवृत्त सुबेदार शगुन ने बताया कि सन 1914 से 1919 व 1939-1945 व 1962 में देश में हुए युद्धों में गांव के काफी लोगों ने हिस्सा लिया। जिसमें तीन लोग शहीद हो गए थे। तथा युद्ध में अच्छी कुशलता दिखाने पर सरकार ने शगुन राणा, सुबेदार मलादारा, सुनहरा सहित अन्य फौजियों को मेडल से सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि गांव के युवओं में देश सेवा की भावना है और आज भी लगभग सैकड़ों युवा देश की सेवा कर रहे है।
ये रहे इस गांव के अधिकारी
गांव अराईपूरा का इतिहास बहुत पुराना है। उन्होंने बताया कि सन 1922 में वजीर नामक व्यक्ति ने बीएससी पाकिस्तान के शहर लायलपुर में की थी और वे उपनिदेशक के पद पर तैनात हुए हैं। गांव के राजीव शर्मा कमिश्नर पद से सेवानिवृत्त हुए और बाद में उनको चुनाव आयोग का आयुक्त नियुक्त किया गया। राजीव शर्मा को इस समय स्वर्ण जयंती को नोडल अधिकारी लगाया गया है। आरपी सिंह चीफ टाउन प्लानर के पद से सेवानिवृत्त हुए है। गांव के डॉ सुरेश कुमार वैज्ञानिक भी और राजकुमार रेलवे विभाग में उच्चाधिकारी पद पर है। गांव के लवकुश योगा में गोल्ड मेडलिस्ट भी रहे है। गांव में काफी ऐसी बातें हैं, जो कि क्षेत्र को गौरववांवित कर रही है।
अब खेल अकादमी की जरूरत
सरपंच गांव के सरपंच महेंद्र सिंह ने बताया कि गांव में विकास कार्य करवाने के लिए पंचायती जमीन बहुत कम है। गांव की बेटियों को पढ़ाने के लिए 40 एकड़ जमीन कॉलेज के लिए अनुदान दे दी है। उन्होंने कहा कि खाली पड़ी जमीन में व्यायामशाला व खेल एकेडमी बनाई जाएं। उन्होंने कहा कि गांव में सभी बिरादारिया भाई चारे से रहती है। गांव के छोटे छोटे झगड़े पंचायती तौर पर निपटाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने गांव की कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि इस गांव में काफी चीजें प्राचीन है और गांव के युवाओं में देश प्रेम भावना आज भी पूरी तरह से जागृत है। इस गांव के सैकड़ों लोग सेना से सेवानिवृत्त हो चुके है ओर गांव के काफी लोगों ने सरकार में उच्च पदों पर रहकर गांव का नाम रोशन भी किया है।