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मंडियों में धन अटा, उतारने की जगह नहीं, यूपी-हरियाणा का पोर्टल बंद
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सरकार की धान खरीद व्यवस्था इस बार जी का जंजाल बन गई है। राइस मिलर्स और आढ़तियों ने जहां एक बार मंडी पर एकाधिकार कर लिया है तो वहीं खरीद एजेंसियों मंडियों से बाहर हो गई हैं। यही कारण है कि धान के भाव में एक बार फिर गिरावट आ गई है। शनिवार को धान 1750 रुपये प्रति क्विंटल तक बिका है। जिससे किसान लाचार नजर आ रहा है। मंडी में पैर रखने की भी जगह नहीं बची है, आढ़तियों की आढ़तों के सामने से धान की लिफ्टिंग कराने के लिए ट्रांसपोर्ट कर्मियों ने भी उगाही करनी शुरू कर दी है। किसान को धान बेचने के बाद भी एक रुपये का भी भुगतान नहीं मिलने से उसकी आगे की फसल की तैयारी प्रभावित होने लगी है, इस कारण उसका पुराना कर्ज अभी उतरा नहीं, उसे इन्हीं आढ़ती से फिर से कर्ज लेना पड़ रहा है।
बिना कुछ किए ही कमा रहे मोटा मुनाफा
-अनाज मंडियों में सरकार ने खरीद एजेंसियों को धान खरीदने की तो मंडियों से राइस मिलों तक धान पहुंचाने की जिम्मेदारी ट्रांसपोर्टर को सौंपी हैं, लेकिन अब सभी व्यवस्थाएं ध्वस्त नजर आ रही हैं। खरीद एजेंसियां मंडियों से गायब हो गई हैं। धान की खरीद सिर्फ आढ़तियों के हाथों में आ गई है। आलम यह कै कि किसान जब धान लेकर मंडी में लाकर उतारता है तो आढ़ती किसानों से सस्ता धान लेकर उसके ही गेटपास के जरिये सरकारी एजेंसी को बेचकर बिना कुछ किए ही 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक कमा लेते हैं। इसी तरह महीन धान यानी 1509 आदि प्रजाति को भी स्वयं खरीदकर राइस मिलर्स को महंगे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं। सबसे खास बात तो यह है कि अधिकांश आढ़ती स्वयं राइस मिलर्स भी हैं, या फिर उनके परिवार को कोई न कोई राइस मिलर्स है।
कर्ज पर कर्ज लेने को विवश हो रहे किसान
-26 सितंबर से धान की खरीद शुरू हुई, लेकिन 17 सितंबर तक लाखों क्विंटल धान की खरीद की गई लेकिन 72 घंटे में किसान या आढ़ती के खाते में भुगतान पहुंचाने का वादा करने वाले हरियाणा सरकार ने 22 दिनों की खरीद का एक रुपया भी किसानों को नहीं दिया है। यह धनराशि अरबों में पहुंच गई हैं। धान का भुगतान नहीं मिलने से किसान के सभी कार्य अटक गए हैं, ना तो वह त्योहारी खरीदारी कर पा रहा है और ना ही गेहूं आदि आगामी फसलों की तैयारी। शादी ब्याह के लिए भी बाजार जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। धान की फसल को तैयार करने के लिए लिया गया ऋण तो अभी उतरा नहीं, अगली फसल की तैयारी के लिए किसानों को कर्ज के ऊपर कर्ज लेने को विवश हो रहा है।
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मंडी धान से अटी, ट्रांसपोर्ट कर्मी कर रहे वसूली
-खरीद एजेंसियां भले ही 75 फीसदी तक लिफ्टिंग का दावा कर रही हो लेकिन वास्तविकता ह है कि करनाल अनाज मंडी में पैर रखने की जगह नहीं बची है। आढ़तियों के दुकानों के आगे सड़क तक बोरियां ही बोरियां व धान की ढ़ेरियां अटी पड़ी है, जिसके कारण आढ़तियों ने सड़क पर धान उतरवा दिया है, आसपास खाली पड़ी दुकानों के आगे उतार हो रहा है। इतना ही दशहरा ग्राउंड आदि मंडी के बाहर भी धान को उतारा जा रहा है। आरोप यह है कि ट्रांसपोर्टर के ट्रक चालकों ने आढ़तियों से लिफ्टिंग के नाम पर सुविधाशुल्क वसूलेना शुरू कर दिया है, जो आढ़ती सुविधाशुल्क दे देता है, उसके यहां ट्रक लिफ्टिंग के लिए पहुंच जाते हैं, अन्यथा कई कई दिनों तक इंतजार करना होता, जिससे वह आढ़ती खरीद नहीं कर पाता है।
-नरुखेड़ी गांव के किसान जसवंत ने बताया कि तीन दिन पहले वह पीआर 126 धान लाया था, ट्राली में भरे भरे धान काला पड़ गया। आज मजबूरी में 1400 रुपये प्रति क्विंटल बेचना पड़ा है। पहले नमी अधिक बताकर कम रेट लगाते हैं, फिर धान की क्वालिटी खराब बताकर सस्ते में खरीदते हैं। हर तरफ से किसान को ही नुकसान है। तीन दिनों में मुझे यहां कोई खरीद एजेंसी का कर्मचारी घूमता हुआ नहीं दिखा है।
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-बसली गांव के किसान मुकेश कुमार ने बताया कि वह धान को सुखाकर लाया था, साफ भी किया था, लेकिन इसके बावजूद आढ़ती नमी अधिक बता रहे हैं। मार्केट कमेटी जब धर्मकांटा गेट पर लगा सकती है तो नमी मापक यंत्र क्यों नहीं लगाती। जिससे मंडी में आते ही किसान को मालूम हो जाए कि उसके धान में कितनी नमी है। सरकार, खरीद एजेसियां भी आढ़तियों, राइस मिलर्स से मिली हुई हैं।
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बिना कुछ किए ही कमा रहे मोटा मुनाफा
-अनाज मंडियों में सरकार ने खरीद एजेंसियों को धान खरीदने की तो मंडियों से राइस मिलों तक धान पहुंचाने की जिम्मेदारी ट्रांसपोर्टर को सौंपी हैं, लेकिन अब सभी व्यवस्थाएं ध्वस्त नजर आ रही हैं। खरीद एजेंसियां मंडियों से गायब हो गई हैं। धान की खरीद सिर्फ आढ़तियों के हाथों में आ गई है। आलम यह कै कि किसान जब धान लेकर मंडी में लाकर उतारता है तो आढ़ती किसानों से सस्ता धान लेकर उसके ही गेटपास के जरिये सरकारी एजेंसी को बेचकर बिना कुछ किए ही 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक कमा लेते हैं। इसी तरह महीन धान यानी 1509 आदि प्रजाति को भी स्वयं खरीदकर राइस मिलर्स को महंगे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं। सबसे खास बात तो यह है कि अधिकांश आढ़ती स्वयं राइस मिलर्स भी हैं, या फिर उनके परिवार को कोई न कोई राइस मिलर्स है।
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कर्ज पर कर्ज लेने को विवश हो रहे किसान
-26 सितंबर से धान की खरीद शुरू हुई, लेकिन 17 सितंबर तक लाखों क्विंटल धान की खरीद की गई लेकिन 72 घंटे में किसान या आढ़ती के खाते में भुगतान पहुंचाने का वादा करने वाले हरियाणा सरकार ने 22 दिनों की खरीद का एक रुपया भी किसानों को नहीं दिया है। यह धनराशि अरबों में पहुंच गई हैं। धान का भुगतान नहीं मिलने से किसान के सभी कार्य अटक गए हैं, ना तो वह त्योहारी खरीदारी कर पा रहा है और ना ही गेहूं आदि आगामी फसलों की तैयारी। शादी ब्याह के लिए भी बाजार जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। धान की फसल को तैयार करने के लिए लिया गया ऋण तो अभी उतरा नहीं, अगली फसल की तैयारी के लिए किसानों को कर्ज के ऊपर कर्ज लेने को विवश हो रहा है।
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मंडी धान से अटी, ट्रांसपोर्ट कर्मी कर रहे वसूली
-खरीद एजेंसियां भले ही 75 फीसदी तक लिफ्टिंग का दावा कर रही हो लेकिन वास्तविकता ह है कि करनाल अनाज मंडी में पैर रखने की जगह नहीं बची है। आढ़तियों के दुकानों के आगे सड़क तक बोरियां ही बोरियां व धान की ढ़ेरियां अटी पड़ी है, जिसके कारण आढ़तियों ने सड़क पर धान उतरवा दिया है, आसपास खाली पड़ी दुकानों के आगे उतार हो रहा है। इतना ही दशहरा ग्राउंड आदि मंडी के बाहर भी धान को उतारा जा रहा है। आरोप यह है कि ट्रांसपोर्टर के ट्रक चालकों ने आढ़तियों से लिफ्टिंग के नाम पर सुविधाशुल्क वसूलेना शुरू कर दिया है, जो आढ़ती सुविधाशुल्क दे देता है, उसके यहां ट्रक लिफ्टिंग के लिए पहुंच जाते हैं, अन्यथा कई कई दिनों तक इंतजार करना होता, जिससे वह आढ़ती खरीद नहीं कर पाता है।
-नरुखेड़ी गांव के किसान जसवंत ने बताया कि तीन दिन पहले वह पीआर 126 धान लाया था, ट्राली में भरे भरे धान काला पड़ गया। आज मजबूरी में 1400 रुपये प्रति क्विंटल बेचना पड़ा है। पहले नमी अधिक बताकर कम रेट लगाते हैं, फिर धान की क्वालिटी खराब बताकर सस्ते में खरीदते हैं। हर तरफ से किसान को ही नुकसान है। तीन दिनों में मुझे यहां कोई खरीद एजेंसी का कर्मचारी घूमता हुआ नहीं दिखा है।
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-बसली गांव के किसान मुकेश कुमार ने बताया कि वह धान को सुखाकर लाया था, साफ भी किया था, लेकिन इसके बावजूद आढ़ती नमी अधिक बता रहे हैं। मार्केट कमेटी जब धर्मकांटा गेट पर लगा सकती है तो नमी मापक यंत्र क्यों नहीं लगाती। जिससे मंडी में आते ही किसान को मालूम हो जाए कि उसके धान में कितनी नमी है। सरकार, खरीद एजेसियां भी आढ़तियों, राइस मिलर्स से मिली हुई हैं।