{"_id":"625b296cf2dca54ddd498671","slug":"after-seeing-bajrang-bali-people-take-a-pledge-to-renounce-evils-karnal-news-knl1051652103","type":"story","status":"publish","title_hn":"खुदाई के दौरान जमीन से मिली थी बलरंग बली की मूर्ति","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खुदाई के दौरान जमीन से मिली थी बलरंग बली की मूर्ति
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
करनाल। पुराना सराफा बाजार के समीप हनुमान गली में अमरजीत मित्तल का करीब 160 वर्ष पुराना मकान है। यहां पर घर की दीवार में हनुमान जी की यह मूर्ति विराजमान है। इसमें हनुमान जी के कंधों पर श्रीराम-लक्ष्मण विराजमान हैं और चरणों में राक्षसी दबी हुई है। ये दृश्य रामायण के युद्ध कांड की घटना से संबंधित है। यहां पर आकर लोग बुराइयों को त्यागने का संकल्प लेकर जाते हैं।
अमरजीत मित्तल बताते हैं कि जब उनके पूर्वज मकान बनाने के लिए खुदाई कर रहे थे तो जमीन से ये मूर्ति मिली थी। मूर्ति को घर की दहलीज के समीप चौड़ी दीवार में स्थान बनाकर स्थापित कर दिया गया। इसके बाद से शहरवासी यहां पूजा-अर्चना करने लगे। धीरे-धीरे लोगों की आस्था बढ़ती गई। उन्होंने बताया कि इस मूर्ति पर वर्षों तक चोला चढ़ाने की वजह से इसका स्वरूप मोटा हो गया था और सही से जान नहीं पड़ता था। इस वजह से वर्ष 1958 में क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने मशविरा करके नई मूर्ति स्थापित करने पर विचार किया। इसके बाद राजस्थान से संगमरमर की मूर्ति लाई गई। जब नई मूर्ति की पेटी को करनाल लाकर खोला तो वह खंडित मिली। इसके बाद कभी यहां किसी अन्य मूर्ति को स्थापित करने का प्रयास नहीं किया गया। 1964 में सभी श्रद्धालुओं ने हनुमान जी का स्वरूप मोटा होने की वजह से चोले की परत हटाने का निर्णय लिया। इस मूर्ति के प्रति शहरवासियों की इतनी श्रद्धा है कि वे हर मंगलवार व शनिवार यहां ध्वजा-प्रसाद चढ़ाने आते हैं। हनुमान जी से संबंधित सभी शोभायात्राएं यहीं पर आकर संपन्न होती हैं।
विज्ञापन
अमरजीत मित्तल बताते हैं कि जब उनके पूर्वज मकान बनाने के लिए खुदाई कर रहे थे तो जमीन से ये मूर्ति मिली थी। मूर्ति को घर की दहलीज के समीप चौड़ी दीवार में स्थान बनाकर स्थापित कर दिया गया। इसके बाद से शहरवासी यहां पूजा-अर्चना करने लगे। धीरे-धीरे लोगों की आस्था बढ़ती गई। उन्होंने बताया कि इस मूर्ति पर वर्षों तक चोला चढ़ाने की वजह से इसका स्वरूप मोटा हो गया था और सही से जान नहीं पड़ता था। इस वजह से वर्ष 1958 में क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने मशविरा करके नई मूर्ति स्थापित करने पर विचार किया। इसके बाद राजस्थान से संगमरमर की मूर्ति लाई गई। जब नई मूर्ति की पेटी को करनाल लाकर खोला तो वह खंडित मिली। इसके बाद कभी यहां किसी अन्य मूर्ति को स्थापित करने का प्रयास नहीं किया गया। 1964 में सभी श्रद्धालुओं ने हनुमान जी का स्वरूप मोटा होने की वजह से चोले की परत हटाने का निर्णय लिया। इस मूर्ति के प्रति शहरवासियों की इतनी श्रद्धा है कि वे हर मंगलवार व शनिवार यहां ध्वजा-प्रसाद चढ़ाने आते हैं। हनुमान जी से संबंधित सभी शोभायात्राएं यहीं पर आकर संपन्न होती हैं।
विज्ञापन