{"_id":"5aecb5c14f1c1b57098b80b6","slug":"41525462465-karnal-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मेडिकल कालेज में दवाइयां न मुफ्त मिल रही हैं और न ही सस्ती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मेडिकल कालेज में दवाइयां न मुफ्त मिल रही हैं और न ही सस्ती
Updated Sat, 05 May 2018 01:04 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल।
कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज में मरीजों को न तो मुफ्त में दवाइयां मिल रही हैं और न ही सस्ती। मजबूरी में मरीजों को प्राइवेट मेडिकल स्टोरों पर जाना पड़ रहा है, जहां पर महंगे दामों पर दवाइयां लेनी पड़ रही हैं। इस मामले को लेकर मरीजों समेत शहर की कई सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएं मेडिकल कॉलेज के प्रबंधन से दवाइयां का स्टॉक पूरा करने की मांग कर चुके हैं, बावजूद इसके प्रबंधन पर इसका कोई असर नहीं है। इसलिए मरीज आ रहे हैं और चेकअप के बाद सीधे कॉलेज के बाहर स्टोरों से दवा ले रहे हैं।
बता दें कि इस समय मेडिकल कॉलेज में करीब 2500 मरीजों की ओपीडी है। इसके अलावा, 650 से ज्यादा मरीज दाखिल हैं। दवाइयों के लिए सबसे पहले ये मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में खोली गई मुफ्त दवा काउंटरों पर जाते हैं, यहां पर जरूरी व सामान्य दवाएं तक नहीं मिल रही हैं। घंटों लाइनों में लगने के बाद भी मरीजों को केवल ये दवा नहीं है, का जवाब मिलता है। करीब 450 प्रकार की दवाइयों में से यहां पर आधी दवाइयां ही हैं, शेष के लिए मरीजों को बाहर जाना पड़ता है। इसके अलावा, केंद्र की योजना के तहत सस्ती दवाइयों के लिए खोले गए जन औषधालय अमृत फार्मेसी के हालात भी कुछ इसी प्रकार है। यहां पर न तो अभी स्टाफ पूरा है और न ही दवाइयां। आलम ये है कि एलर्जी से लेकर पेट दर्द तक की दवाइयां इनके पास नहीं है। स्टाक की बात करें तो यहां पर फिलहाल केवल 25 प्रतिशत दवाइयां ही हैं, 75 प्रतिशत दवाइयों का इंतजार है।
कौन आएगा यहां दवा लेने, कोई साइन बोर्ड तक नहीं
जन औषधालय खुले हए एक महीना बीतने को, लेकिन अभी तक मरीजों को इस जन औषधालय के बारे में किसी को नहीं पता है। यह जन औषधालय मेडिकल कॉलेज में ऐसी जगह खोला गया है जो दिखाई नहीं देता, दूसरी ओर न ही जन औषधालय का एक भी साइन बोर्ड लगाया गया है और स्टाफ द्वारा इसके बारे में बताया जा रहा है। इधर-उधर से पूछकर एक दो मरीज इस जन औषधालय पर पहुंचते हैं, लेकिन वहां उन्हें वह दवा ही नहीं मिलती है। बता दें कि यहां पर जेनरिक दवाइयां 80 प्रतिशत तक कम रेट पर मिलती हैं। होना ये चाहिए था कि स्टोर खोलने से पहले ही इसके साइन बोर्ड लगाए जाने चाहिए थे, ताकि मरीजों को इसकी जानकारी मिल सके।
विज्ञापन
न दवाइयां पूरी न ही स्टाफ
मेडिकल कॉलेज में यह जन औषधालय पहले की एक साल बाद खुला है, लेकिन अभी तक इस जन औषधालय में न दवाइयां पूरी है और न ही फार्मासिस्ट। यह जन औषधालय 24 घंटे खुलना है, लेकिन अभी यह आठ घंटे ही खुलता है। कई बार यह बंद भी रह चुका है। दवाइयों की बात करें तो मरीज यहां दवा लेने के लिए आते हैं, लेकिन यहां भी मेडिकल कॉलेज की डिस्पेंसरी की तरह एक या दो ही दवा मिलती हैं बाकीकी सारी दवाइयां मरीजों को बाहर से प्राइवेट मेडिकल स्टोर से ही लेनी पड़ती है। अब तक बात करें तो मात्र 200 लोग ही यहां से दवा ले सकें हैं।
आठ रुपये सस्ती एक ही मिली दवा
दाहा निवासी महेंद्र सिंह ने बताया कि उसे इस जन औषधालय का पता चला था, लेकिन इधर-उधर पूछकर ही इस जन औषधालय पर पहुंचा। यह जन औषधालय को छिपाकर खोला हुआ है। इस पर दवा तो सस्ती मिली। यहां दवाइयां ही नहीं हैं। डॉक्टर ने पांच दवा लिखी थी दो डिस्पेंसरी से मिल गई थी, लेकिन यहां भी एक ही दवा मिली बाकी की फिर बाहर से लानी पड़ रही है। स्टाफ ने बताया कि अभी दवाइयां आने में समय लगेगा।
हमें तो किसी ने बताया ही नहीं
मेडिकल कॉलेज में दवा लेने आए सुनील से जब जन औषधालय के बारे में पूछा तो उसने कहा कि उसे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और न ही किसी ने बताया कि यहां पर सस्ती दवा के लिए जन औषधालय खोला हुआ है। मेडिकल कॉलेज की ओर से साइन बोर्ड लगाने चाहिए या फिर वह जन औषधालय ओपीडी के सामने ही खोलना चाहिए जो मरीजों को दिखाई दे। ये निजी स्टोर संचालकों की मेडिकल कालेज प्रबंधन से मिलीभगत भी हो सकती है, क्योंकि ये स्टोर सामने खुलना चाहिए था न कि छुपे हुए स्थान पर।
जानबूझकर साइन बोर्ड नहीं लगा रहे हैं
सतबीर ने बताया कि न उसे जन औषधालय का पता है कि वह कहां और कब खुला है? यदि खुला है तो उसके साइन बोर्ड क्यों नहीं लगाए। मरीज बाहर मेडिकल स्टोर से महंगे दाम में दवा खरीद रहे हैं, क्योंकि डॉक्टर ऐसी दवा लिख देते हैं जो डिस्पेंसरी में मिलती ही नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज में करोड़ों रुपये की दवा आती है, लेकिन फिर भी मरीजों को बाहर से दवा लेनी पड़ती है। इसको सरकारी दवाइयों की दुकान के साथ ही खोला जाना चाहिए।
जन औषधालय अमृत फार्मेसी में दवा की संख्या बढ़ाने और साइन बोर्ड के लिए इसके संचालक को कई बार बोल चुके हैं, लेकिन उसने अभी तक साइन बोर्ड ही नहीं लगाए हैं। हमारे डॉक्टर, सिक्योरिटी गार्ड आदि सभी मरीजों को इस जन औषधालय के बारे में बता रहे हैं। जल्द ही यहां साइन बोर्ड लगवाए जाएंगे। दवाइयां उपलब्ध कराने को लेकर स्टाफ से बात की जाएगी और जिसकी कमी होगी, उसे पूरा किया जाएगा।
-डॉ. हिमांशु मदान, कार्यवाहक निदेशक, कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज करनाल।
विज्ञापन
करनाल।
कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज में मरीजों को न तो मुफ्त में दवाइयां मिल रही हैं और न ही सस्ती। मजबूरी में मरीजों को प्राइवेट मेडिकल स्टोरों पर जाना पड़ रहा है, जहां पर महंगे दामों पर दवाइयां लेनी पड़ रही हैं। इस मामले को लेकर मरीजों समेत शहर की कई सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएं मेडिकल कॉलेज के प्रबंधन से दवाइयां का स्टॉक पूरा करने की मांग कर चुके हैं, बावजूद इसके प्रबंधन पर इसका कोई असर नहीं है। इसलिए मरीज आ रहे हैं और चेकअप के बाद सीधे कॉलेज के बाहर स्टोरों से दवा ले रहे हैं।
बता दें कि इस समय मेडिकल कॉलेज में करीब 2500 मरीजों की ओपीडी है। इसके अलावा, 650 से ज्यादा मरीज दाखिल हैं। दवाइयों के लिए सबसे पहले ये मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में खोली गई मुफ्त दवा काउंटरों पर जाते हैं, यहां पर जरूरी व सामान्य दवाएं तक नहीं मिल रही हैं। घंटों लाइनों में लगने के बाद भी मरीजों को केवल ये दवा नहीं है, का जवाब मिलता है। करीब 450 प्रकार की दवाइयों में से यहां पर आधी दवाइयां ही हैं, शेष के लिए मरीजों को बाहर जाना पड़ता है। इसके अलावा, केंद्र की योजना के तहत सस्ती दवाइयों के लिए खोले गए जन औषधालय अमृत फार्मेसी के हालात भी कुछ इसी प्रकार है। यहां पर न तो अभी स्टाफ पूरा है और न ही दवाइयां। आलम ये है कि एलर्जी से लेकर पेट दर्द तक की दवाइयां इनके पास नहीं है। स्टाक की बात करें तो यहां पर फिलहाल केवल 25 प्रतिशत दवाइयां ही हैं, 75 प्रतिशत दवाइयों का इंतजार है।
विज्ञापन
कौन आएगा यहां दवा लेने, कोई साइन बोर्ड तक नहीं
जन औषधालय खुले हए एक महीना बीतने को, लेकिन अभी तक मरीजों को इस जन औषधालय के बारे में किसी को नहीं पता है। यह जन औषधालय मेडिकल कॉलेज में ऐसी जगह खोला गया है जो दिखाई नहीं देता, दूसरी ओर न ही जन औषधालय का एक भी साइन बोर्ड लगाया गया है और स्टाफ द्वारा इसके बारे में बताया जा रहा है। इधर-उधर से पूछकर एक दो मरीज इस जन औषधालय पर पहुंचते हैं, लेकिन वहां उन्हें वह दवा ही नहीं मिलती है। बता दें कि यहां पर जेनरिक दवाइयां 80 प्रतिशत तक कम रेट पर मिलती हैं। होना ये चाहिए था कि स्टोर खोलने से पहले ही इसके साइन बोर्ड लगाए जाने चाहिए थे, ताकि मरीजों को इसकी जानकारी मिल सके।
विज्ञापन
न दवाइयां पूरी न ही स्टाफ
मेडिकल कॉलेज में यह जन औषधालय पहले की एक साल बाद खुला है, लेकिन अभी तक इस जन औषधालय में न दवाइयां पूरी है और न ही फार्मासिस्ट। यह जन औषधालय 24 घंटे खुलना है, लेकिन अभी यह आठ घंटे ही खुलता है। कई बार यह बंद भी रह चुका है। दवाइयों की बात करें तो मरीज यहां दवा लेने के लिए आते हैं, लेकिन यहां भी मेडिकल कॉलेज की डिस्पेंसरी की तरह एक या दो ही दवा मिलती हैं बाकीकी सारी दवाइयां मरीजों को बाहर से प्राइवेट मेडिकल स्टोर से ही लेनी पड़ती है। अब तक बात करें तो मात्र 200 लोग ही यहां से दवा ले सकें हैं।
आठ रुपये सस्ती एक ही मिली दवा
दाहा निवासी महेंद्र सिंह ने बताया कि उसे इस जन औषधालय का पता चला था, लेकिन इधर-उधर पूछकर ही इस जन औषधालय पर पहुंचा। यह जन औषधालय को छिपाकर खोला हुआ है। इस पर दवा तो सस्ती मिली। यहां दवाइयां ही नहीं हैं। डॉक्टर ने पांच दवा लिखी थी दो डिस्पेंसरी से मिल गई थी, लेकिन यहां भी एक ही दवा मिली बाकी की फिर बाहर से लानी पड़ रही है। स्टाफ ने बताया कि अभी दवाइयां आने में समय लगेगा।
हमें तो किसी ने बताया ही नहीं
मेडिकल कॉलेज में दवा लेने आए सुनील से जब जन औषधालय के बारे में पूछा तो उसने कहा कि उसे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और न ही किसी ने बताया कि यहां पर सस्ती दवा के लिए जन औषधालय खोला हुआ है। मेडिकल कॉलेज की ओर से साइन बोर्ड लगाने चाहिए या फिर वह जन औषधालय ओपीडी के सामने ही खोलना चाहिए जो मरीजों को दिखाई दे। ये निजी स्टोर संचालकों की मेडिकल कालेज प्रबंधन से मिलीभगत भी हो सकती है, क्योंकि ये स्टोर सामने खुलना चाहिए था न कि छुपे हुए स्थान पर।
जानबूझकर साइन बोर्ड नहीं लगा रहे हैं
सतबीर ने बताया कि न उसे जन औषधालय का पता है कि वह कहां और कब खुला है? यदि खुला है तो उसके साइन बोर्ड क्यों नहीं लगाए। मरीज बाहर मेडिकल स्टोर से महंगे दाम में दवा खरीद रहे हैं, क्योंकि डॉक्टर ऐसी दवा लिख देते हैं जो डिस्पेंसरी में मिलती ही नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज में करोड़ों रुपये की दवा आती है, लेकिन फिर भी मरीजों को बाहर से दवा लेनी पड़ती है। इसको सरकारी दवाइयों की दुकान के साथ ही खोला जाना चाहिए।
जन औषधालय अमृत फार्मेसी में दवा की संख्या बढ़ाने और साइन बोर्ड के लिए इसके संचालक को कई बार बोल चुके हैं, लेकिन उसने अभी तक साइन बोर्ड ही नहीं लगाए हैं। हमारे डॉक्टर, सिक्योरिटी गार्ड आदि सभी मरीजों को इस जन औषधालय के बारे में बता रहे हैं। जल्द ही यहां साइन बोर्ड लगवाए जाएंगे। दवाइयां उपलब्ध कराने को लेकर स्टाफ से बात की जाएगी और जिसकी कमी होगी, उसे पूरा किया जाएगा।
-डॉ. हिमांशु मदान, कार्यवाहक निदेशक, कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज करनाल।