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आजादी की शर्त पर विश्व युद्ध में 10 जांबाजों ने दी थी शहादत
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जयभगवान सैन
घरौंडा। अंग्रेजी हुकूमत ने भारतवासियों से वादा किया था कि यदि वे विश्व युद्ध में उनका साथ दें तो उन्हें जल्द आजाद कर दिया जाएगा। इसी वादे को ध्यान में रखते हुए अराइपुरा गांव के 32 जांबाजों ने प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था। जिनमें से तीन जवान शहीद हो गए थे। उन वीर शहीदों की याद में गांव में शहीद स्मारक बनाया गया है। युद्ध के बाद सूबेदार सुनहरा सिंह को सरदार बहादुर ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश मेडल भी मिला था। अंग्रेजों ने इस गांव के सैनिकों से खुश होकर एक बावनी जमीन देने की घोषणा की थी, लेकिन सैनिकों ने जमीन के बजाय शहीद स्मारक बनवाने की मांग की थी। हालांकि ब्रिटिश सरकार अपने वादे से मुकर गई थी, जिसके बाद जवानों ने आजादी के लिए संघर्ष किया था। वहीं दूसरे विश्व युद्ध में इस गांव के 40 जवानों ने हिस्सा लिया था जिनमें सात जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इन दोनों युद्धों में 72 जांबाजों ने हिस्सा लिया, जिसमें 10 ने शहादत दी थी। संवाद
प्रथम विश्वयुद्ध में 32 जांबाजों ने लड़ी लड़ाई
प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने गांधी जी को आश्वासन दिया था कि यदि भारत प्रथम युद्ध में इंग्लैंड की मदद करता है तो उसे जल्द आजादी दी जाएगी। उस समय करनाल जिले के अंतर्गत पानीपत, जींद, कैथल और कुरुक्षेत्र भी आता था। गांधी जी के आह्वान पर ही अराइपुरा से 32 जांबाजों ने सेना में भर्ती होकर विश्व युद्ध लड़ा। इस युद्ध में सिपाही दान सिंह, तेग सिंह व बनवारी सिंह शहीद हो गए थे। शहीदों के नाम से गांव में शहीदी स्मारक बनाया गया ताकि उनकी शहादत को याद रखा जा सके। ग्रामीण अनिल कुमार ने बताया कि गांव के 32 सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत की ओर से लड़ाई लड़ी थी। युद्ध में तीन सैनिक शहीद हो गए थे।
द्वितीय विश्व युद्ध में 40 जवानों ने लिया हिस्सा
द्वितीय विश्व युद्ध में गांव अराइपुरा के 40 जवानों ने हिस्सा लिया था। जिनमें से सात जवान हवलदार बारू सिंह, सिपाही अबल सिंह, सिपाही जयसिंह, वजीर सिंह, छज्जू राम, बल्ला सिंह व धूमन सिंह शहीद हो गए थे। विश्व युद्ध में वीरता दिखाने पर सूबेदार मालदेव सिंह को मिलिट्री क्रॉस मेडल से सम्मानित किया गया था। 1962 में भारत व चीन के बीच युद्ध हुआ था। जंग में इस गांव के सूबेदार शुगन सिंह को सेना के मेडल से सम्मानित किया था। 1965 में भारत व पाकिस्तान युद्ध में इस गांव के तेग सिंह व सिपाही ज्ञान सिंह शहीद हुए। इसके अलावा अन्य कई युद्धों में इस गांव के जवानों ने देश की सुरक्षा के लिए दुश्मनों का मुकाबला किया।
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घरौंडा। अंग्रेजी हुकूमत ने भारतवासियों से वादा किया था कि यदि वे विश्व युद्ध में उनका साथ दें तो उन्हें जल्द आजाद कर दिया जाएगा। इसी वादे को ध्यान में रखते हुए अराइपुरा गांव के 32 जांबाजों ने प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था। जिनमें से तीन जवान शहीद हो गए थे। उन वीर शहीदों की याद में गांव में शहीद स्मारक बनाया गया है। युद्ध के बाद सूबेदार सुनहरा सिंह को सरदार बहादुर ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश मेडल भी मिला था। अंग्रेजों ने इस गांव के सैनिकों से खुश होकर एक बावनी जमीन देने की घोषणा की थी, लेकिन सैनिकों ने जमीन के बजाय शहीद स्मारक बनवाने की मांग की थी। हालांकि ब्रिटिश सरकार अपने वादे से मुकर गई थी, जिसके बाद जवानों ने आजादी के लिए संघर्ष किया था। वहीं दूसरे विश्व युद्ध में इस गांव के 40 जवानों ने हिस्सा लिया था जिनमें सात जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इन दोनों युद्धों में 72 जांबाजों ने हिस्सा लिया, जिसमें 10 ने शहादत दी थी। संवाद
प्रथम विश्वयुद्ध में 32 जांबाजों ने लड़ी लड़ाई
प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने गांधी जी को आश्वासन दिया था कि यदि भारत प्रथम युद्ध में इंग्लैंड की मदद करता है तो उसे जल्द आजादी दी जाएगी। उस समय करनाल जिले के अंतर्गत पानीपत, जींद, कैथल और कुरुक्षेत्र भी आता था। गांधी जी के आह्वान पर ही अराइपुरा से 32 जांबाजों ने सेना में भर्ती होकर विश्व युद्ध लड़ा। इस युद्ध में सिपाही दान सिंह, तेग सिंह व बनवारी सिंह शहीद हो गए थे। शहीदों के नाम से गांव में शहीदी स्मारक बनाया गया ताकि उनकी शहादत को याद रखा जा सके। ग्रामीण अनिल कुमार ने बताया कि गांव के 32 सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत की ओर से लड़ाई लड़ी थी। युद्ध में तीन सैनिक शहीद हो गए थे।
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द्वितीय विश्व युद्ध में 40 जवानों ने लिया हिस्सा
द्वितीय विश्व युद्ध में गांव अराइपुरा के 40 जवानों ने हिस्सा लिया था। जिनमें से सात जवान हवलदार बारू सिंह, सिपाही अबल सिंह, सिपाही जयसिंह, वजीर सिंह, छज्जू राम, बल्ला सिंह व धूमन सिंह शहीद हो गए थे। विश्व युद्ध में वीरता दिखाने पर सूबेदार मालदेव सिंह को मिलिट्री क्रॉस मेडल से सम्मानित किया गया था। 1962 में भारत व चीन के बीच युद्ध हुआ था। जंग में इस गांव के सूबेदार शुगन सिंह को सेना के मेडल से सम्मानित किया था। 1965 में भारत व पाकिस्तान युद्ध में इस गांव के तेग सिंह व सिपाही ज्ञान सिंह शहीद हुए। इसके अलावा अन्य कई युद्धों में इस गांव के जवानों ने देश की सुरक्षा के लिए दुश्मनों का मुकाबला किया।
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