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Kaithal News: शीतला अष्टमी पर पूजा कर मांगी मन्नतें
Sat, 22 Mar 2025 01:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sat, 22 Mar 2025 01:04 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। शीतला अष्टमी का त्योहार देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। शुक्रवार को कैथल में श्रद्धालुओं ने माता गेट मंदिर, शीतला माता मंदिर, चचंदाना गेट, देवीगढ़ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर माता शीतला की पूजा-अर्चना की।
शीतला अष्टमी को बासड़े के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में एक दिन पूर्व बनाए गए बासी पकवानों जैसे ओलिया, खाजा, चूरमा, पकौड़ी, पूड़ी, और राबड़ी का भोग माता को अर्पित किया जाता है। इसके साथ श्रद्धालुओं ने गोबर के उपलों से बने चांद भी माता रानी के दरबार पर चढाए वहीं सेवादारों ने छोटे बच्चों व परिवार के सदस्यों के सिर के उपर म़ुर्गा छुआ कर श्रद्धालुओं की सुख शांति व मंगल कामना की।
धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य बना रहता है। श्रद्धालु बालादेवी, पूजा, सुमन, कविता, ओमप्रकाश, आशिष गुप्ता, पवन, आदी ने बताया कि माता शीतला को सेहत और सफाई की देवी माना जाता है, जो विशेष रूप से चेचक और त्वचा रोगों से रक्षा करती हैं।
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इस दिन व्रत रखने और माता को ठंडा व बासी भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि चूल्हे की गर्मी से शरीर में उष्णता बढ़ सकती है, जिससे त्वचा रोग होने की संभावना रहती है, इसलिए इस दिन बासी भोजन ग्रहण करना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। सुबह बिना स्नान किए श्रद्धालु माता की प्रतिमा का गंगाजल से अभिषेक करते हैं और रोली, मौली, हल्दी, चावल और फूल अर्पित करते हैं। भोग लगाने के बाद माता की आरती और पूजा की जाती है। तत्पश्चात प्रसाद को परिवार और आसपास के लोगों में बांटने की परंपरा भी है।
कलायत में रही धूमधाम ः कलायत। शीतला सप्तमी का पर्व श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया गया। श्रीकपिल मुनि के पौराणिक तीर्थ के किनारे व पंचरथ शैली से बने प्राचीन शिवालय के पास स्थित माता शीतला देवी की पूजा अर्चना करने के लिए आज सुबह करीब 2 बजे से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमडऩा शुरू हो गई थी। इस मौके पर माताओं ने अपने पुत्र-पुत्रियों की लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य के लिए व्रत रखा और शीतला माता की पूजा अर्चना की। शीतला माता को इस दिन बासी खाने का भोग लगाया जाता है। सुबह से ही कलायत के शीतला माता मंदिर में महिलाओं की भारी भीड़ नजर आई।
विशाल शांडिल्य ने बताया कि होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन माता शीतला की उपासना की जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी मनाई जाती है। उन्होंने बताया कि आयूष, आरोग्य और परिवार की सुख समृद्धि के लिए इस दिन शीतला माता की पूजा और ठंडे भोजन के भोग का विधान है। यह एक धार्मिक परम्परा तो है ही साथ ही इसका वैज्ञानिक आधार भी है। इस समय ऋतु परिवर्तन होता है और ऐसे में संक्रमण के कारण होने वाले कई रोगों से बचाव के लिए भी यह उपयोगी है।
शीतला माता जिसे बूढ़ी माता भी कहा जाता है के मंदिर में आयोजित होने वाले इस मेले को बासड़े के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है।
चीका में श्रद्धालुओं की लाइन
गुहला-चीका। हर वर्ष की भांति शीतला सप्तमी के दिन शुक्रवार को बासड़े का पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया गया।
शहरवासियों ने सुबह होने से पूर्व ही बसंती माता मंदिर में पहुंच कर माता के दरबार में रात को बनाकर रखा भोजन प्रसाद के रूप में चढ़ाया। इस पर्व को लेकर लोगों की भारी भीड़ शुक्रवार देर रात को ही पिहोवा रोड स्थित बसंती माता मंदिर में पहुंच गई, जहां सुबह तक लंबी लाइन में लगकर श्रद्धालुओं ने अपनी बारी का इंतजार किया। अपनी बारी आने पर लोगों ने माता के दरबार में माथा टेका और भोजन प्रसाद के रूप में चढ़ाया। संवाद
गौरतलब है कि गर्मियों की दस्तक के साथ होली का पर्व आता है और होली के बाद दूसरे मंगलवार व सप्तमी को चीका में बासडे पर्व मनाया जाता है। बासडे का अर्थ है की रात को बनाया हुआ यह प्रसाद को लोग देर रात को 12 बजे के बाद माता के दरबार में चढ़ाते हैं। इसमें मुख्य रूप से हलवा पूरी, गुलगुले, गुड़ की भेली और चने की दाल आदि शामिल हैं। यही कारण है कि माता के दरबार में बासा भोजन चढ़ाने की वजह से इस पर्व को बासड़े कहा जाता है। मंदिर के सेवादार। पार्षद सुखवीर पहलवान, सुखा पहलवान ने बताया कि देर सुबह से ही लोग कतारबद्ध होकर माथा टेक रहे हैं। उन्होंने कहा कि मान्यता के अनुसार यहां नवविवाहित जोड़े और छोटे बच्चों को माथा टेकने के लिए विशेष रूप से लाया जाता है। मान्यता यह भी है कि बच्चों के यहां माता देखने से उन्हें भविष्य में चिकन पॉक्स जैसी बीमारी नहीं होती। लोगों का मानना है कि शीतला माता बच्चों को शीतलता प्रदान करती है। यही कारण है कि हर वर्ष यह पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। जो लोग किसी कारण वश शीतला माता मंदिर नहीं पहुंच पाते हैं। वह अपने घरों में ही शीतला माता की पूजा अर्चना कर माता को बासा भोजन प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं और बच्चों की सलामती की दुआएं करते हैं। इस अवसर पर गुरदीप पहलवान, बिंदर सिंह, वीरेंद्र सिंह, सुशील कुमार, अशोक कुमार, लकी अंटाल, कश्मीरा पहलवान, महेंद्र सिंह भी मौजूद रहे।
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कैथल। शीतला अष्टमी का त्योहार देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। शुक्रवार को कैथल में श्रद्धालुओं ने माता गेट मंदिर, शीतला माता मंदिर, चचंदाना गेट, देवीगढ़ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर माता शीतला की पूजा-अर्चना की।
शीतला अष्टमी को बासड़े के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में एक दिन पूर्व बनाए गए बासी पकवानों जैसे ओलिया, खाजा, चूरमा, पकौड़ी, पूड़ी, और राबड़ी का भोग माता को अर्पित किया जाता है। इसके साथ श्रद्धालुओं ने गोबर के उपलों से बने चांद भी माता रानी के दरबार पर चढाए वहीं सेवादारों ने छोटे बच्चों व परिवार के सदस्यों के सिर के उपर म़ुर्गा छुआ कर श्रद्धालुओं की सुख शांति व मंगल कामना की।
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धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य बना रहता है। श्रद्धालु बालादेवी, पूजा, सुमन, कविता, ओमप्रकाश, आशिष गुप्ता, पवन, आदी ने बताया कि माता शीतला को सेहत और सफाई की देवी माना जाता है, जो विशेष रूप से चेचक और त्वचा रोगों से रक्षा करती हैं।
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इस दिन व्रत रखने और माता को ठंडा व बासी भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि चूल्हे की गर्मी से शरीर में उष्णता बढ़ सकती है, जिससे त्वचा रोग होने की संभावना रहती है, इसलिए इस दिन बासी भोजन ग्रहण करना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। सुबह बिना स्नान किए श्रद्धालु माता की प्रतिमा का गंगाजल से अभिषेक करते हैं और रोली, मौली, हल्दी, चावल और फूल अर्पित करते हैं। भोग लगाने के बाद माता की आरती और पूजा की जाती है। तत्पश्चात प्रसाद को परिवार और आसपास के लोगों में बांटने की परंपरा भी है।
कलायत में रही धूमधाम ः कलायत। शीतला सप्तमी का पर्व श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया गया। श्रीकपिल मुनि के पौराणिक तीर्थ के किनारे व पंचरथ शैली से बने प्राचीन शिवालय के पास स्थित माता शीतला देवी की पूजा अर्चना करने के लिए आज सुबह करीब 2 बजे से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमडऩा शुरू हो गई थी। इस मौके पर माताओं ने अपने पुत्र-पुत्रियों की लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य के लिए व्रत रखा और शीतला माता की पूजा अर्चना की। शीतला माता को इस दिन बासी खाने का भोग लगाया जाता है। सुबह से ही कलायत के शीतला माता मंदिर में महिलाओं की भारी भीड़ नजर आई।
विशाल शांडिल्य ने बताया कि होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन माता शीतला की उपासना की जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी मनाई जाती है। उन्होंने बताया कि आयूष, आरोग्य और परिवार की सुख समृद्धि के लिए इस दिन शीतला माता की पूजा और ठंडे भोजन के भोग का विधान है। यह एक धार्मिक परम्परा तो है ही साथ ही इसका वैज्ञानिक आधार भी है। इस समय ऋतु परिवर्तन होता है और ऐसे में संक्रमण के कारण होने वाले कई रोगों से बचाव के लिए भी यह उपयोगी है।
शीतला माता जिसे बूढ़ी माता भी कहा जाता है के मंदिर में आयोजित होने वाले इस मेले को बासड़े के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है।
चीका में श्रद्धालुओं की लाइन
गुहला-चीका। हर वर्ष की भांति शीतला सप्तमी के दिन शुक्रवार को बासड़े का पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया गया।
शहरवासियों ने सुबह होने से पूर्व ही बसंती माता मंदिर में पहुंच कर माता के दरबार में रात को बनाकर रखा भोजन प्रसाद के रूप में चढ़ाया। इस पर्व को लेकर लोगों की भारी भीड़ शुक्रवार देर रात को ही पिहोवा रोड स्थित बसंती माता मंदिर में पहुंच गई, जहां सुबह तक लंबी लाइन में लगकर श्रद्धालुओं ने अपनी बारी का इंतजार किया। अपनी बारी आने पर लोगों ने माता के दरबार में माथा टेका और भोजन प्रसाद के रूप में चढ़ाया। संवाद
गौरतलब है कि गर्मियों की दस्तक के साथ होली का पर्व आता है और होली के बाद दूसरे मंगलवार व सप्तमी को चीका में बासडे पर्व मनाया जाता है। बासडे का अर्थ है की रात को बनाया हुआ यह प्रसाद को लोग देर रात को 12 बजे के बाद माता के दरबार में चढ़ाते हैं। इसमें मुख्य रूप से हलवा पूरी, गुलगुले, गुड़ की भेली और चने की दाल आदि शामिल हैं। यही कारण है कि माता के दरबार में बासा भोजन चढ़ाने की वजह से इस पर्व को बासड़े कहा जाता है। मंदिर के सेवादार। पार्षद सुखवीर पहलवान, सुखा पहलवान ने बताया कि देर सुबह से ही लोग कतारबद्ध होकर माथा टेक रहे हैं। उन्होंने कहा कि मान्यता के अनुसार यहां नवविवाहित जोड़े और छोटे बच्चों को माथा टेकने के लिए विशेष रूप से लाया जाता है। मान्यता यह भी है कि बच्चों के यहां माता देखने से उन्हें भविष्य में चिकन पॉक्स जैसी बीमारी नहीं होती। लोगों का मानना है कि शीतला माता बच्चों को शीतलता प्रदान करती है। यही कारण है कि हर वर्ष यह पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। जो लोग किसी कारण वश शीतला माता मंदिर नहीं पहुंच पाते हैं। वह अपने घरों में ही शीतला माता की पूजा अर्चना कर माता को बासा भोजन प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं और बच्चों की सलामती की दुआएं करते हैं। इस अवसर पर गुरदीप पहलवान, बिंदर सिंह, वीरेंद्र सिंह, सुशील कुमार, अशोक कुमार, लकी अंटाल, कश्मीरा पहलवान, महेंद्र सिंह भी मौजूद रहे।