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ऐसे तो पानी चला जाएगा पाताल...
कैथल
Updated Thu, 08 May 2014 11:29 PM IST
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भू-जलस्तर के गिरने का सिलसिला यदि यूं ही जारी रहा तो आने वाले समय में कैथल में पीने तक का पानी नसीब नहीं होगा। वर्ष 1974 में जो जलस्तर छह मीटर की गहराई पर था, वह आज पाताल की ओर खिसकते हुए 23 मीटर से ज्यादा की गहराई में पहुंच गया है। लगभग 70 फुट से नीचे की औसत पर जिले भर में भू-जलस्तर पहुंच गया है। इस समय हो रहे जल के अंधाधुंध दोहन को नहीं रोका गया तो आने वाले समय में जल संकट पैदा हो सकता है।
हर साल गिर रहा है एक मीटर गिर रहा है
कृषि विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार. वर्ष 1974 में कैथल में जलस्तर की स्थिति औसतन 6.21 मीटर थी। जो इसके बाद थोड़ा ओर ऊपर आया। यह वर्ष 1978 में 3.46 मीटर पर आ गया था। लेकिन इसके बाद से यह लगातार गिरता ही चला गया। वर्ष 1980 में जिले में भू-जल 4.93 मीटर की गहराई पर था। जो वर्ष 2000 तक भी 9.80 मीटर पर था। लेकिन इसके बाद से धान-गेहूं के फसल चक्र ने इसके गणित को बिगाड़ दिया।
लगातार गिरते हुए भू-जलस्तर में तेजी से गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद तो यह एक मीटर तो किसी साल यह दो मीटर की गति से गिरा। वर्ष 2005 में यह 13.48 मीटर पर पहुंच गया। अगले साल 2006 में 14.21 मीटर, 2007 में 16.89 मीटर, 2008 में 19.16 मीटर, 2009 में 20.24 मीटर, 2010 में 20.24 मीटर, वर्ष 2011 में 21.21 मीटर, वर्ष 2012 में 21.88 मीटर की गहराई पर जलस्तर था। जो वर्ष 2013 में 23.07 मीटर की गहराई पर जा चुका है।
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अंधाधुंध निकाला जा रहा है जमीन से पानी
जमीन में से पानी अंधाधुंध तरीके से निकाला जा रहा है। खेतों में बड़े सबमर्सिबल पंप के अलावा घरों में छोटे सबमर्सिबल पंप भी पानी का जरूरत से ज्यादा दोहन कर रहे हैं।
जनस्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, अकेले कैथल शहर में ही जनस्वास्थ्य विभाग ने 40 ट्यूबवेलों के अलावा 514 छोटे सबमर्सिबल पंप लगवाए हैं। इसके अलावा हजारों की संख्या में लोगों के निजी सबमर्सिबल पंप भी पानी निकालने का काम कर रहे हैं। वहीं गांवों में खुले चलते नल के अलावा पंचायतों द्वारा लगवाए जा रहे सबमर्सिबल पंप इस समस्या को ओर ज्यादा विकराल किए हुए हैं। हर गांव में तालाब ओवरफ्लो हो गए हैं। लेकिन पानी की बर्बादी की ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसके अलावा खेतों में भी एक ही फसल चक्र के लिए करोड़ों लीटर पानी भूमि में से निकाला जा रहा है। लेकिन भूमि में रिचार्जिंग का कोई सिस्टम नहीं है।
सबमर्सिबल पंप लगाने पर लगे रोक : विशेषज्ञ
कृषक कृषि वैज्ञानिक ईश्वर सिंह कुंडू का कहना है कि लोगों को इस बारे में जानकारी होनी चाहिए कि यदि पानी को यूं ही बहाया जाता रहा तो आने वाले 10 साल में ही पीने का पानी भी नसीब नहीं हो पाएगा। पानी की बचत के लिए सबसे पहले सबमर्सिबल पंपों पर रोक लगाई जानी चाहिए। किसानों को फसल चक्र बदलने पर लाने के लिए सरकार को कोई न कोई व्यवस्था करनी चाहिए। इसी प्रकार से वैज्ञानिक लछमन सिंह का कहना है कि पानी की बचत के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। जब तक लोग खुद यह समझ नहीं जाते कि पानी इसी गति से बहता रहा तो पीने तक को नहीं मिलेगा, तब तक बर्बादी रोकना मुश्किल है।
गंभीर समस्या है : डीसी
यह एक गंभीर समस्या है। इस संबंध में मासिक मीटिंग में चर्चा की जाएगी। सबमर्सिबल पंपों मामले पर कोई न कोई निर्णय लिया जाएगा, ताकि पानी की बर्बादी को रोका जा सके।
एन के सोलंकी, डीसी, कैथल।
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हर साल गिर रहा है एक मीटर गिर रहा है
कृषि विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार. वर्ष 1974 में कैथल में जलस्तर की स्थिति औसतन 6.21 मीटर थी। जो इसके बाद थोड़ा ओर ऊपर आया। यह वर्ष 1978 में 3.46 मीटर पर आ गया था। लेकिन इसके बाद से यह लगातार गिरता ही चला गया। वर्ष 1980 में जिले में भू-जल 4.93 मीटर की गहराई पर था। जो वर्ष 2000 तक भी 9.80 मीटर पर था। लेकिन इसके बाद से धान-गेहूं के फसल चक्र ने इसके गणित को बिगाड़ दिया।
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लगातार गिरते हुए भू-जलस्तर में तेजी से गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद तो यह एक मीटर तो किसी साल यह दो मीटर की गति से गिरा। वर्ष 2005 में यह 13.48 मीटर पर पहुंच गया। अगले साल 2006 में 14.21 मीटर, 2007 में 16.89 मीटर, 2008 में 19.16 मीटर, 2009 में 20.24 मीटर, 2010 में 20.24 मीटर, वर्ष 2011 में 21.21 मीटर, वर्ष 2012 में 21.88 मीटर की गहराई पर जलस्तर था। जो वर्ष 2013 में 23.07 मीटर की गहराई पर जा चुका है।
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अंधाधुंध निकाला जा रहा है जमीन से पानी
जमीन में से पानी अंधाधुंध तरीके से निकाला जा रहा है। खेतों में बड़े सबमर्सिबल पंप के अलावा घरों में छोटे सबमर्सिबल पंप भी पानी का जरूरत से ज्यादा दोहन कर रहे हैं।
जनस्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, अकेले कैथल शहर में ही जनस्वास्थ्य विभाग ने 40 ट्यूबवेलों के अलावा 514 छोटे सबमर्सिबल पंप लगवाए हैं। इसके अलावा हजारों की संख्या में लोगों के निजी सबमर्सिबल पंप भी पानी निकालने का काम कर रहे हैं। वहीं गांवों में खुले चलते नल के अलावा पंचायतों द्वारा लगवाए जा रहे सबमर्सिबल पंप इस समस्या को ओर ज्यादा विकराल किए हुए हैं। हर गांव में तालाब ओवरफ्लो हो गए हैं। लेकिन पानी की बर्बादी की ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसके अलावा खेतों में भी एक ही फसल चक्र के लिए करोड़ों लीटर पानी भूमि में से निकाला जा रहा है। लेकिन भूमि में रिचार्जिंग का कोई सिस्टम नहीं है।
सबमर्सिबल पंप लगाने पर लगे रोक : विशेषज्ञ
कृषक कृषि वैज्ञानिक ईश्वर सिंह कुंडू का कहना है कि लोगों को इस बारे में जानकारी होनी चाहिए कि यदि पानी को यूं ही बहाया जाता रहा तो आने वाले 10 साल में ही पीने का पानी भी नसीब नहीं हो पाएगा। पानी की बचत के लिए सबसे पहले सबमर्सिबल पंपों पर रोक लगाई जानी चाहिए। किसानों को फसल चक्र बदलने पर लाने के लिए सरकार को कोई न कोई व्यवस्था करनी चाहिए। इसी प्रकार से वैज्ञानिक लछमन सिंह का कहना है कि पानी की बचत के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। जब तक लोग खुद यह समझ नहीं जाते कि पानी इसी गति से बहता रहा तो पीने तक को नहीं मिलेगा, तब तक बर्बादी रोकना मुश्किल है।
गंभीर समस्या है : डीसी
यह एक गंभीर समस्या है। इस संबंध में मासिक मीटिंग में चर्चा की जाएगी। सबमर्सिबल पंपों मामले पर कोई न कोई निर्णय लिया जाएगा, ताकि पानी की बर्बादी को रोका जा सके।
एन के सोलंकी, डीसी, कैथल।