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पिछले चुनाव के मुकाबले फीका रहा मतदान
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कैथल। आखिर कार दो साल बाद ही सही, बुधवार को गांवों में उनके प्रधान मिल गए। जो सरकारी कार्यालयों में पहुंच कर गांव की समस्याओं के लिए पैरवी कर सकेंगे। पिछले दो साल से गांवों की चौधर आधिकारिक तौर पर अधिकारियों के हाथ में थी। जिस कारण सरपंच पद के उम्मीदवारों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी।
बुधवार को सरपंच व पंचों के लिए सुबह ही भीड़ उमडऩा शुरू हो गई थी। वर्ष 2016 में हुए चुनाव में 84 प्रतिशत मतदान हुआ था। बुधवार को अधिकतम यह 78.2 प्रतिशत तक पहुंच पाया। जो पिछली बार के मुकाबले कम है, लेकिन दो दिन पहले संपन्न हुए जिला परिषद व पंचायत समिति के चुनाव में 68.2 प्रतिशत के मुकाबले दस प्रतिशत अधिक है। जिससे स्पष्ट है कि मतदाताओं का ज्यादा रूझान सरपंच पद के चुनाव में रहता है।
ग्राम पंचायतों का चुनाव पिछली बार जनवरी 2016 में संपन्न हुआ था। इसके बाद वर्ष 2020 में जब कार्यकाल पूरा हुआ तो चुनाव समय पर नहीं हो पाए। इसके बाद सरकार ने पंचायतों में बीडीपीओ को प्रशासक नियुक्त कर दिया था। वहीं जिला परिषद में जिला परिषद के सीईओ प्रशासक के तौर पर काम कर रहे थे। कई सालों से सरपंच पद की तैयारी कर रहे या फिर पिछले चुनाव में पराजित उम्मीदवार इस बात के इंतजार में थे कि कब चुनाव हो और कब उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर मिले।
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वर्ष 2020 के बाद से लेकर अब तक कई बार ऐसा समय आया, जब चुनाव होने की बातें हुईं। तब-तब गांवों में लोगों ने सरपंच पद के लिए तैयारियां शुरू कर दीं, लेकिन हर बार चुनाव किसी न किसी कारण आगे सरकते रहे। आखिरकार सरकार ने पिछले माह चुनावी शेड्यूल जारी किया। जिस पर सरपंच, पंच, पंचायत समिति व जिला परिषद का चुनाव लडऩे के इच्छुक उम्मीदवारों ने बड़ी राहत की सांस ली थी। अब सभी पिछले लगभग बीस दिन से चुनावी मैदान में हैं। बुधवार को हुए मतदान के बाद रात को ही परिणाम जारी हुआ। जिसमें गांवों को नए जनप्रतिनिधि मिल गए हैं।
सायं के समय छह बजे के बाद जैसे ही गिनती शुरू हुई, उस समय उम्मीदवारों की सांसें थमीं रहीं। जैसे-जैसे परिणाम आते गए, उसी अनुसार समर्थकों में खुशियां व मायूसी छाती रही। जीतने वाले उम्मीदवारों ने समर्थकों सहित जश्र मनाया। वहीं हारने वाले उम्मीदवार व समर्थक मायूस होकर घरों की ओर लौट गए।
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बुधवार को सरपंच व पंचों के लिए सुबह ही भीड़ उमडऩा शुरू हो गई थी। वर्ष 2016 में हुए चुनाव में 84 प्रतिशत मतदान हुआ था। बुधवार को अधिकतम यह 78.2 प्रतिशत तक पहुंच पाया। जो पिछली बार के मुकाबले कम है, लेकिन दो दिन पहले संपन्न हुए जिला परिषद व पंचायत समिति के चुनाव में 68.2 प्रतिशत के मुकाबले दस प्रतिशत अधिक है। जिससे स्पष्ट है कि मतदाताओं का ज्यादा रूझान सरपंच पद के चुनाव में रहता है।
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ग्राम पंचायतों का चुनाव पिछली बार जनवरी 2016 में संपन्न हुआ था। इसके बाद वर्ष 2020 में जब कार्यकाल पूरा हुआ तो चुनाव समय पर नहीं हो पाए। इसके बाद सरकार ने पंचायतों में बीडीपीओ को प्रशासक नियुक्त कर दिया था। वहीं जिला परिषद में जिला परिषद के सीईओ प्रशासक के तौर पर काम कर रहे थे। कई सालों से सरपंच पद की तैयारी कर रहे या फिर पिछले चुनाव में पराजित उम्मीदवार इस बात के इंतजार में थे कि कब चुनाव हो और कब उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर मिले।
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वर्ष 2020 के बाद से लेकर अब तक कई बार ऐसा समय आया, जब चुनाव होने की बातें हुईं। तब-तब गांवों में लोगों ने सरपंच पद के लिए तैयारियां शुरू कर दीं, लेकिन हर बार चुनाव किसी न किसी कारण आगे सरकते रहे। आखिरकार सरकार ने पिछले माह चुनावी शेड्यूल जारी किया। जिस पर सरपंच, पंच, पंचायत समिति व जिला परिषद का चुनाव लडऩे के इच्छुक उम्मीदवारों ने बड़ी राहत की सांस ली थी। अब सभी पिछले लगभग बीस दिन से चुनावी मैदान में हैं। बुधवार को हुए मतदान के बाद रात को ही परिणाम जारी हुआ। जिसमें गांवों को नए जनप्रतिनिधि मिल गए हैं।
सायं के समय छह बजे के बाद जैसे ही गिनती शुरू हुई, उस समय उम्मीदवारों की सांसें थमीं रहीं। जैसे-जैसे परिणाम आते गए, उसी अनुसार समर्थकों में खुशियां व मायूसी छाती रही। जीतने वाले उम्मीदवारों ने समर्थकों सहित जश्र मनाया। वहीं हारने वाले उम्मीदवार व समर्थक मायूस होकर घरों की ओर लौट गए।