{"_id":"60b27a538ebc3e18515fe858","slug":"this-time-there-will-be-an-exercise-to-reduce-the-area-of-paddy-to-save-water-kaithal-news-knl71461325","type":"story","status":"publish","title_hn":"पानी बचाने को धान का रकबा कम करने की इस बार भी रहेगी कवायद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पानी बचाने को धान का रकबा कम करने की इस बार भी रहेगी कवायद
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
धान उत्पादन में अन्य फसलों के मुकाबले कई गुना पानी की आवश्यकता होती है। प्रदेश के अन्य जिलों की तरह से कैथल में भी भू जलस्तर काफी नीचे जा रहा है। इसी भू जल के संरक्षण के लिए कृषि विभाग ने इस बार भी करीब 5 से लेकर 10 हजार हेक्टेयर धान के रकबे को कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए शीघ्र ही आवश्यक निर्देश जारी होंगे। पिछले साल जिले में लगभग 5 हजार से अधिक एकड़ में धान का रकबा कम किया गया था। इसके लिए सात हजार रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन योजना भी विभाग ने लागू की है।
विदित रहे कि जिले में भू जल के मामले में गुहला, राजौंद व कैथल डार्क जोन में आते हैं। यहां भू जलस्तर में लगातार कमी हो रही है। इसी के संरक्षण के लिए पिछले साल मेरा पानी मेरी विरासत नामक योजना शुरू की गई थी। जिसमें धान का रकबा छोड़कर अन्य कम पानी वाली फसल पैदा करने या फिर छह माह के लिए अपने खेत को खाली छोड़ने पर 7000 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन दिया गया था। इस बार भी यही योजना लागू की गई है। जिसमें धान का रकबा छोड़ने वाले किसानों व पिछले साल इस योजना को अपनाने वाले किसान यदि इस बार भी धान का उत्पादन उस खेत में नहीं करेंगे तो उन्हें भी 7000 रुपये प्रति एकड़ की दर से सरकार की ओर से प्रोत्साहन दिया जाएगा।
पूरे जिले में करीब 1 लाख 55 हजार हेक्टेयर में धान का उत्पादन होता है। विभाग का प्रयास है कि इस रकबे को कम किया जाए। पूरे प्रदेश में करीब दो लाख हेक्टेयर में धान का उत्पादन कम करने का लक्ष्य है। कैथल के लिए यह लगभग 5 से 10 हजार हेक्टेयर बताया जा रहा है।
विज्ञापन
कृषि विभाग का जोर है कि पनीरी उगाकर फिर रोपाई की बजाए किसान धान की सीधी बीजाई करें। इससे भी पानी की बचत होती है और किसानों का खर्च भी कम होता है। विभाग का प्रयास है कि सीधी बीजाई के एरिया को भी इस बार करीब करीब डबल किया जाए। किसानों में सीधी बीजाई को लेकर उत्साह भी नजर आ रहा है।
जिला कृषि उपनिदेशक डॉ. महावीर सिंह ने बताया कि पिछले साल जिले में लगभग 5 हजार एकड़ से अधिक एरिया धान का कम किया गया था। जिसके लिए मेरा पानी मेरी विरासत नामक योजना लागू की गई थी। जिसमें सात हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से उन किसानों को दिए गए, जिन्होंने धान का रकबा छोड़कर उस खेत में कोई अन्य कम पानी की लागत पर तैयार होने वाली फसल उगाने का निर्णय लिया था। इस बार भी यह योजना लागू है। जो किसान अपने खेत को खाली छोड़ना चाहता है, या फिर पिछली बार भी उसने धान का रकबा छोड़ा था और इस बार भी वह धान का उत्पादन उस खेत में नहीं करता है तो उसे निश्चित तौ पर 7000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।
विज्ञापन
विदित रहे कि जिले में भू जल के मामले में गुहला, राजौंद व कैथल डार्क जोन में आते हैं। यहां भू जलस्तर में लगातार कमी हो रही है। इसी के संरक्षण के लिए पिछले साल मेरा पानी मेरी विरासत नामक योजना शुरू की गई थी। जिसमें धान का रकबा छोड़कर अन्य कम पानी वाली फसल पैदा करने या फिर छह माह के लिए अपने खेत को खाली छोड़ने पर 7000 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन दिया गया था। इस बार भी यही योजना लागू की गई है। जिसमें धान का रकबा छोड़ने वाले किसानों व पिछले साल इस योजना को अपनाने वाले किसान यदि इस बार भी धान का उत्पादन उस खेत में नहीं करेंगे तो उन्हें भी 7000 रुपये प्रति एकड़ की दर से सरकार की ओर से प्रोत्साहन दिया जाएगा।
विज्ञापन
पूरे जिले में करीब 1 लाख 55 हजार हेक्टेयर में धान का उत्पादन होता है। विभाग का प्रयास है कि इस रकबे को कम किया जाए। पूरे प्रदेश में करीब दो लाख हेक्टेयर में धान का उत्पादन कम करने का लक्ष्य है। कैथल के लिए यह लगभग 5 से 10 हजार हेक्टेयर बताया जा रहा है।
विज्ञापन
कृषि विभाग का जोर है कि पनीरी उगाकर फिर रोपाई की बजाए किसान धान की सीधी बीजाई करें। इससे भी पानी की बचत होती है और किसानों का खर्च भी कम होता है। विभाग का प्रयास है कि सीधी बीजाई के एरिया को भी इस बार करीब करीब डबल किया जाए। किसानों में सीधी बीजाई को लेकर उत्साह भी नजर आ रहा है।
जिला कृषि उपनिदेशक डॉ. महावीर सिंह ने बताया कि पिछले साल जिले में लगभग 5 हजार एकड़ से अधिक एरिया धान का कम किया गया था। जिसके लिए मेरा पानी मेरी विरासत नामक योजना लागू की गई थी। जिसमें सात हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से उन किसानों को दिए गए, जिन्होंने धान का रकबा छोड़कर उस खेत में कोई अन्य कम पानी की लागत पर तैयार होने वाली फसल उगाने का निर्णय लिया था। इस बार भी यह योजना लागू है। जो किसान अपने खेत को खाली छोड़ना चाहता है, या फिर पिछली बार भी उसने धान का रकबा छोड़ा था और इस बार भी वह धान का उत्पादन उस खेत में नहीं करता है तो उसे निश्चित तौ पर 7000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।