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Kaithal News: हवा हो गई काउंटर मैग्नेट सिटी की कल्पना, पत्थर पर रह गया टू रूम

Tue, 14 May 2024 03:38 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 14 May 2024 03:38 AM IST
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The idea of counter magnet city vanished, two rooms remained in stone
वैभव शर्मा
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अंबाला। वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव, भाजपा के दिवंगत रतन लाल कटारिया मंच पर जिला निर्वाचन अधिकारी से अपनी जीत का प्रमाण पत्र ले रहे थे। इस दौरान उन्होंने साक्षात्कार में अंबाला को काउंटर मैग्नेट सिटी बनाने का विजन बताया। तब दावा किया था कि यहां इंडस्ट्री आएंगी, रोजगार पैदा होगा और अंबाला को एक अलग पहचान मिलेगी।
आज रतन लाल कटारिया दुनिया में नहीं हैं। उनकी पत्नी लोकसभा चुनाव में भाजपा से उम्मीदवार हैं। ऐसे में यही यक्ष प्रश्न है कि क्या काउंटर मैग्नेट सिटी बनने का अंबाला का सपना पूरा हुआ। इससे पहले भी कांग्रेस से सांसद रही कुमारी सैलजा के समय में भी इंडस्ट्रीज के लिए टू रूम कॉन्सेप्ट लाया गया था, मगर यह योजना भी पत्थर पर ही सिमट गई। बड़ी मशीनें आईं न ही इंडस्ट्रीज को बढ़ावा मिला।
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यह आरोप अंबाला के साइंस और कपड़ा उद्योग से जुड़े उद्योगपतियों का है। अगर अंबाला में उद्योग संचालकों से बात करें तो उनके अनुसार मिक्सी उद्योग अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ रहा है तो साइंस उद्याेग भी उतनी तरक्की नहीं कर सका, जितनी अन्य राज्यों ने तेजी से इस क्षेत्र के उत्पाद बनाकर कर दी। वहीं आईएमटी से जुड़ा सपना भी वर्षों से लोगों के जहन में चल रहा है मगर यह भी धरातल पर कहीं दिखाई नहीं दिया है। अंबाला के उद्योगपति और बेरोजगार युवा अभी भी विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों की तरफ इस आस से देख रहे हैं।
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हर बार मिली मायूसी : असीमा

अंबाला साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन (असीमा) के महासचिव गौरव सोनी बताते हैं कि अंबाला को काउंटर मैग्नेट सिटी बनाने और इंडस्ट्री लाने के दावे पहले बहुत किए गए मगर हकीकत में जो उद्याेग अभी हैं उन्हें सही से चलाना भी काफी मुश्किल हो रहा है। साइंस उद्योग में ऐसे ऐसे 10 से 15 उद्याेग संचालकों के बारे में बता सकता हूं, जिन्होंने कोविड के बाद साइंस का काम बंद कर अपनी दुकानें शुरू कर दीं। बाढ़ आई तो कोई मुआवजा शायद ही अभी तक असीमा के सदस्यों को मिला हो। इससे पहले कुमारी सैलजा के रहते हुए टू रूम कान्सेप्ट लाया गया था जो पत्थर लगने तक ही सीमित रह गया। इस योजना में बड़ी मशीनों को लगाकर इंडस्ट्री बड़ी करनी थी। मगर इस योजना का पत्थर आज भी साहा इंडस्ट्रियल एरिया में लगा मिल सकता है। वहीं अब हमारी मांग थी कि इंडस्ट्रियल एरिया में एमएसएमई उद्याेगों को छोटे प्लॉट दिए जाएं जिसमें उद्योगों की छत पर भी निर्माण करने कर दूसरे को देने का कान्सेप्ट हो। मगर अभी तक इस पर भी विचार नहीं किया गया। हम किसानों की तरफ रास्ता तो नहीं रोक सकते हैं हम तो सरकार के विभिन्न मंचों पर मांग उठा सकते हैं वह हमने किया है स्थानीय नेता तो हमारी मांग को गंभीरता से लेते हैं मगर जब सरकार ही न सुने तो क्या करेंगे।


अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा मिक्सी उद्योग

मिक्सी उद्योग एसोसिएशन से प्रधान अजय अग्रवाल बताते हैं कि मिक्सी उद्योग अंबाला में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। यूनिटें लगातार कम होती जा रही हैं। अब चंद यूनिटें ही बची हैं जो उत्पादन कर रही हैं। इनको बढ़ावा देने के लिए भी कुछ नहीं किया। वहीं, किसी प्रकार की सरकारी योजनाओं का भी लाभ उद्योग को जितना मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। वहीं विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों के एजेंडे में भी इन उद्योगों की बढ़ोतरी हिस्सा नहीं है।
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