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Sawan 2025:पाताल से प्रकट हुआ था स्वयंभू शिवलिंग, कैथल के श्री अंबकेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारत काल से पुराना
Sat, 12 Jul 2025 08:58 AM IST
नवीन दलाल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल (हरियाणा)
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल (हरियाणा)
Published by: नवीन दलाल
Updated Sat, 12 Jul 2025 08:58 AM IST
सार
मंदिर की एक अन्य खासियत है कि यहां शीशे के रंग-बिरंगे टुकड़ों से तैयार की गई विशिष्ट कलाकृतियां। मंदिर की दीवारों और छतों पर देवी-देवताओं की आकृतियाँ बेहद कलात्मक ढंग से उकेरी गई हैं।
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प्रताप गेट स्थित प्राचीन श्री अंबकेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग।
- फोटो : संवाद
विस्तार
कैथल के प्रताप गेट स्थित प्राचीन श्री अंबकेश्वर महादेव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व रखता है। इस मंदिर का इतिहास लगभग तीन हजार वर्ष पुराना माना जाता है। मान्यता है कि यहां स्थापित मुख्य शिवलिंग स्वयंभू है, जो हजारों वर्ष पूर्व पाताल से स्वयं प्रकट हुआ था।
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महाभारत काल से भी प्राचीन माने जाने वाले इस शिवलिंग की विशेषता यह है कि इसे स्थापित नहीं किया गया, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से धरती से प्रकट हुआ था। प्रारंभिक काल में श्रद्धालु केवल इस शिवलिंग की पूजा करते थे। मुगलकाल के दौरान यहां मंदिर का निर्माण करवाया गया, और तब से लेकर अब तक यहां पूजा-अर्चना निरंतर जारी है।
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आज भी देशभर से श्रद्धालु यहां भगवान शिव और माता काली के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। शनिवार के दिन विशेष पूजा होती है और सावन माह में यहां मेले जैसा माहौल बना रहता है।
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रक्तधारा बहने की कथा से जुड़ी है शिवलिंग की पौराणिक मान्यता
मंदिर के महंत देवेंद्र पुरी और प्रेमानंद पुरी ने बताया कि मुगल शासकों अकबर और औरंगजेब के काल में कुछ लोगों ने इस शिवलिंग को नष्ट करने का प्रयास किया। पहले इसे हाथियों की मदद से उखाड़ने की कोशिश की गई, लेकिन असफल रहे।
इसके बाद एक व्यक्ति ने शिवलिंग पर तेजधार हथियार से प्रहार कर दिया। जैसे ही प्रहार हुआ, शिवलिंग से रक्तधारा बहने लगी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद सभी लोग भयभीत होकर भाग खड़े हुए। इस घटना के बाद मंदिर की श्रद्धा और मान्यता और अधिक बढ़ गई।
शीशे की कलाकृतियों से सजा है यह अद्वितीय मंदिर
मंदिर की एक अन्य खासियत है कि यहां शीशे के रंग-बिरंगे टुकड़ों से तैयार की गई विशिष्ट कलाकृतियां। मंदिर की दीवारों और छतों पर देवी-देवताओं की आकृतियाँ बेहद कलात्मक ढंग से उकेरी गई हैं। हर शनिवार को माता काली की विशेष पूजा होती है। नवरात्रों और सावन माह में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। महंत देवेंद्र पुरी ने बताया कि शिवरात्रि पर्व पर श्रद्धालु कांवड़ लेकर मंदिर में आते हैं। वे पिछले करीब 20 वर्षों से मंदिर की सेवा और देखरेख कर रहे हैं।