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नियमों में बंधना पसंद नहीं करते लोग : कुलदेवी भारती
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कैथल। आरकेएसडी कॉलेज के सामने स्थित प्रोफेसर कॉलोनी में रविवार को दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के आश्रम में साप्ताहिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी कुलदेवी भारती ने सत्संग किया। उन्होंने कहा कि आज की इस आधुनिक जीवन शैली में लोग नियमों में बंधना पसंद नहीं करते हैं। ये नियम उनके फ्रीडम जोन में दखल पैदा करते हैं पर वास्तविकता में नियमबद्ध जीवन ही सफलता की कुंजी होता है।
उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध लेखक व युवा लीडरशिप कोच इसाईल मोरे आईवोर ने अपनी पुस्तक शॉपिंग द ड्रीम्स में लिखा हैं कि किसी भी खेल को खेलने के लिए उससे संबंधित नियम तय होते हैं। उसी प्रकार जीवन भी एक खेल है, जिसके कुछ विशेष नियम हैं। उन नियमों को निभाने पर ही जीवन रूपी खेल में विजयश्री का वरण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक सुदृढ़ समाज का निर्माण भी नियमों के पालन से ही पूरा होता है। अगर समाज में कोई नियम ही ना हो और प्रत्येक व्यक्ति को मनचाहा कर्म करने की स्वतंत्रता हो तो उस समाज में केवल अव्यवस्था, अन्याय, अत्याचार,अनुचित व अर्थहीन व्यवहार की ही झलक दिखेगी। जब कोई नियम के विरुद्ध जाता है,तब वह स्वार्थी होकर स्वयं को ही नहीं, बल्कि समूचे समाज को नुकसान पहुंचता है। इसलिए कह सकते हैं के नियम ही सुव्यवस्थित समाज की नींव होते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि हम बात करें गुरु शिष्य के सर्वोत्तम संबंध की, तो यहां भी नियमों का विशिष्ट स्थान है। गुरुदेव की आज्ञा में शिष्य के लिए नियम समान होती है। हालांकि यह आजा रूपी नियम कठोर आवश्यक लगते हैं, कभी-कभी तो निजी-आजादी के अवरोधक भी।पर यह सर्वविदित है कि जो नदी स्वयं को बांध के समक्ष समर्पित कर देती है।
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वहीं, संयमित होकर विद्युत उत्पन्न करने में भी सक्षम हो पाती है।लाखों करोड़ों लोगों के जीवन को रोशन करने का एक सशक्त माध्यम बन जाती है। ठीक उसी प्रकार जब एक शिष्य गुरु आज्ञा के बांध में बंध जाता है, उसका शिष्यत्व तो उत्कृष्टता को प्राप्त होता ही है। वह अपने श्रेष्ठ आचरण और व्यक्तित्व से विश्व -पटल पर ऐसी अनूठी शाप छोड़ता है जो आने वाली अनेक पीढि़यों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है। कार्यक्रम के अंत में साध्वी प्रीति भारती ने भजनों की प्रस्तुति दी।
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उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध लेखक व युवा लीडरशिप कोच इसाईल मोरे आईवोर ने अपनी पुस्तक शॉपिंग द ड्रीम्स में लिखा हैं कि किसी भी खेल को खेलने के लिए उससे संबंधित नियम तय होते हैं। उसी प्रकार जीवन भी एक खेल है, जिसके कुछ विशेष नियम हैं। उन नियमों को निभाने पर ही जीवन रूपी खेल में विजयश्री का वरण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक सुदृढ़ समाज का निर्माण भी नियमों के पालन से ही पूरा होता है। अगर समाज में कोई नियम ही ना हो और प्रत्येक व्यक्ति को मनचाहा कर्म करने की स्वतंत्रता हो तो उस समाज में केवल अव्यवस्था, अन्याय, अत्याचार,अनुचित व अर्थहीन व्यवहार की ही झलक दिखेगी। जब कोई नियम के विरुद्ध जाता है,तब वह स्वार्थी होकर स्वयं को ही नहीं, बल्कि समूचे समाज को नुकसान पहुंचता है। इसलिए कह सकते हैं के नियम ही सुव्यवस्थित समाज की नींव होते हैं।
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उन्होंने कहा कि यदि हम बात करें गुरु शिष्य के सर्वोत्तम संबंध की, तो यहां भी नियमों का विशिष्ट स्थान है। गुरुदेव की आज्ञा में शिष्य के लिए नियम समान होती है। हालांकि यह आजा रूपी नियम कठोर आवश्यक लगते हैं, कभी-कभी तो निजी-आजादी के अवरोधक भी।पर यह सर्वविदित है कि जो नदी स्वयं को बांध के समक्ष समर्पित कर देती है।
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वहीं, संयमित होकर विद्युत उत्पन्न करने में भी सक्षम हो पाती है।लाखों करोड़ों लोगों के जीवन को रोशन करने का एक सशक्त माध्यम बन जाती है। ठीक उसी प्रकार जब एक शिष्य गुरु आज्ञा के बांध में बंध जाता है, उसका शिष्यत्व तो उत्कृष्टता को प्राप्त होता ही है। वह अपने श्रेष्ठ आचरण और व्यक्तित्व से विश्व -पटल पर ऐसी अनूठी शाप छोड़ता है जो आने वाली अनेक पीढि़यों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है। कार्यक्रम के अंत में साध्वी प्रीति भारती ने भजनों की प्रस्तुति दी।