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प्रदेश के हितों से नहीं होगा समझौता : माजरा
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कैथल। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के प्रदेशाध्यक्ष रामपाल माजरा ने हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए यमुना जल समझौते का विरोध करते हुए भाजपा सरकार पर हरियाणा के जल अधिकारों से समझौता करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इनेलो राज्य के वैधानिक जल अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा संघर्ष करती रही है और यमुना के हिस्से में किसी भी प्रकार की कटौती स्वीकार नहीं करेगी।
सेक्टर-20 स्थित अपने आवास पर माजरा ने कहा कि यदि राजस्थान को यमुना का पानी दिया गया तो यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, पलवल और फरीदाबाद जैसे जिलों में गंभीर जल संकट खड़ा हो जाएगा। इससे सिंचाई प्रभावित होगी और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के तीन फैसलों के बावजूद एसवाईएल नहर आज तक पूरी नहीं हो सकी। वहीं यमुना जल उपलब्धता बढ़ाने के लिए प्रस्तावित रेणुका, किशाऊ और लखवार-व्यासी बांध भी तीन दशक बाद तक नहीं बन पाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारें नहरें तो बना देती हैं लेकिन उनमें पानी नहीं पहुंचा पातीं। एसवाईएल और हांसी-बुटाना नहर इसका उदाहरण हैं।
केंद्र सरकार के नए जल समझौते के तहत ताजेवाला हेड से राजस्थान तक पानी पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इसके लिए बड़ी लागत से भूमिगत पाइपलाइन बिछाने और भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव है। भाजपा सरकार ने हरियाणा के हितों की अनदेखी करते हुए यह निर्णय स्वीकार किया है जिसका इनेलो पुरजोर विरोध करेगी।
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उन्होंने कहा कि 12 मार्च 1954 के समझौते में पश्चिमी यमुना के जल में हरियाणा को 67 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश को 33 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली थी। वर्ष 1994 में हुए नए समझौते के बाद हरियाणा का हिस्सा घटाकर 5.730 बीसीएम कर दिया गया जबकि राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश को भी स्थायी आवंटन दिया गया। इससे हरियाणा की हिस्सेदारी लगभग 67 प्रतिशत से घटकर 46 प्रतिशत रह गई।
रामपाल माजरा ने कहा कि 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में यमुना जल समझौते के विरोध में इनेलो के सभी विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इसे हरियाणा के जल अधिकारों की रक्षा के लिए दिया गया ऐतिहासिक बलिदान बताया।
हिसार-घग्गर ड्रेन का 90 प्रतिशत कार्य पूरा होने के बावजूद राजस्थान के हनुमानगढ़ में किसान विरोध कर रहे हैं जिससे हरियाणा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। माजरा ने कहा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही हरियाणा के जल अधिकारों की प्रभावी रक्षा करने में विफल हैं। इनेलो लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपना संघर्ष जारी रखेगी। शीघ्र ही चौधरी अभय सिंह चौटाला के नेतृत्व में पार्टी की बैठक होगी जिसमें आगामी आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी।
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सेक्टर-20 स्थित अपने आवास पर माजरा ने कहा कि यदि राजस्थान को यमुना का पानी दिया गया तो यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, पलवल और फरीदाबाद जैसे जिलों में गंभीर जल संकट खड़ा हो जाएगा। इससे सिंचाई प्रभावित होगी और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के तीन फैसलों के बावजूद एसवाईएल नहर आज तक पूरी नहीं हो सकी। वहीं यमुना जल उपलब्धता बढ़ाने के लिए प्रस्तावित रेणुका, किशाऊ और लखवार-व्यासी बांध भी तीन दशक बाद तक नहीं बन पाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारें नहरें तो बना देती हैं लेकिन उनमें पानी नहीं पहुंचा पातीं। एसवाईएल और हांसी-बुटाना नहर इसका उदाहरण हैं।
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केंद्र सरकार के नए जल समझौते के तहत ताजेवाला हेड से राजस्थान तक पानी पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इसके लिए बड़ी लागत से भूमिगत पाइपलाइन बिछाने और भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव है। भाजपा सरकार ने हरियाणा के हितों की अनदेखी करते हुए यह निर्णय स्वीकार किया है जिसका इनेलो पुरजोर विरोध करेगी।
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उन्होंने कहा कि 12 मार्च 1954 के समझौते में पश्चिमी यमुना के जल में हरियाणा को 67 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश को 33 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली थी। वर्ष 1994 में हुए नए समझौते के बाद हरियाणा का हिस्सा घटाकर 5.730 बीसीएम कर दिया गया जबकि राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश को भी स्थायी आवंटन दिया गया। इससे हरियाणा की हिस्सेदारी लगभग 67 प्रतिशत से घटकर 46 प्रतिशत रह गई।
रामपाल माजरा ने कहा कि 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में यमुना जल समझौते के विरोध में इनेलो के सभी विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इसे हरियाणा के जल अधिकारों की रक्षा के लिए दिया गया ऐतिहासिक बलिदान बताया।
हिसार-घग्गर ड्रेन का 90 प्रतिशत कार्य पूरा होने के बावजूद राजस्थान के हनुमानगढ़ में किसान विरोध कर रहे हैं जिससे हरियाणा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। माजरा ने कहा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही हरियाणा के जल अधिकारों की प्रभावी रक्षा करने में विफल हैं। इनेलो लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपना संघर्ष जारी रखेगी। शीघ्र ही चौधरी अभय सिंह चौटाला के नेतृत्व में पार्टी की बैठक होगी जिसमें आगामी आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी।