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कारण पर निर्भर सुख, दुख का दूसरा रूप : साध्वी कंचन भारती
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से प्रोफेसर कॉलोनी में साप्ताहिक सत्संग आयोजित
संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आरकेएसडी कॉलेज के पास स्थित प्रोफेसर कॉलोनी में साप्ताहिक सत्संग किया गया। जिसमें आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी कंचन भारती ने कहा कि अधिकांश लोग कहते हैं कि मैं सुखी हूं, क्योंकि मेरे पास परिवार है। आनंद के अपने इस आंतरिक स्रोत से संपर्क खोकर जो सुख आप बाह्य परिस्थितियों में महसूस करते हैं वह सदाभ्रमात्तमक होता है। हमारी चेतना की ही उच्च अवस्था है, जो इसको पूर्ण गुरु से प्राप्त किया जाता है।
उन्होंने कहा कि वेदांत कहता है कि इस प्रकार का कारण पर निर्भर रहने वाला सुख, दुख का ही दूसरा रूप है। क्योंकि यह भौतिक कारण तो कभी भी हमसे छीने जा सकते हैं। अतः बिना कारण सुखी रहना हमारी आकांक्षा है। दरअसल, आनंद चेतन ही हमारे साथ सदा रहने वाली अवस्था है, लेकिन यह अक्सर सभी प्रकार के चित विक्षेपों की ओर से आव्रत रहती है। जिस प्रकार सूर्योदय का सुंदर दृश्य बादलों से छिपा लिया जाता है, उसी प्रकार हमारा आंतरिक सुख भी हमारे दैनिक चिंताओं से ढक लिया जाता है।
सामाजिक बंधन तथा संकीर्ण बोध हमारे हृदय की गहराइयों में छुपे हुए इस स्वर्ग के साम्राज्य की झलक पाने से हमें वंचित रखते हैं। यह स्वर्ग का साम्राज्य विश्व में दूर दराज स्थित कोई स्थान नहीं है।हमारी चेतना की ही उच्च अवस्था है। इसको पूर्ण गुरु के द्वारा प्राप्त किया जाता है। अंत में साध्वी प्रीति भारती ने भजन गाए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आरकेएसडी कॉलेज के पास स्थित प्रोफेसर कॉलोनी में साप्ताहिक सत्संग किया गया। जिसमें आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी कंचन भारती ने कहा कि अधिकांश लोग कहते हैं कि मैं सुखी हूं, क्योंकि मेरे पास परिवार है। आनंद के अपने इस आंतरिक स्रोत से संपर्क खोकर जो सुख आप बाह्य परिस्थितियों में महसूस करते हैं वह सदाभ्रमात्तमक होता है। हमारी चेतना की ही उच्च अवस्था है, जो इसको पूर्ण गुरु से प्राप्त किया जाता है।
उन्होंने कहा कि वेदांत कहता है कि इस प्रकार का कारण पर निर्भर रहने वाला सुख, दुख का ही दूसरा रूप है। क्योंकि यह भौतिक कारण तो कभी भी हमसे छीने जा सकते हैं। अतः बिना कारण सुखी रहना हमारी आकांक्षा है। दरअसल, आनंद चेतन ही हमारे साथ सदा रहने वाली अवस्था है, लेकिन यह अक्सर सभी प्रकार के चित विक्षेपों की ओर से आव्रत रहती है। जिस प्रकार सूर्योदय का सुंदर दृश्य बादलों से छिपा लिया जाता है, उसी प्रकार हमारा आंतरिक सुख भी हमारे दैनिक चिंताओं से ढक लिया जाता है।
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सामाजिक बंधन तथा संकीर्ण बोध हमारे हृदय की गहराइयों में छुपे हुए इस स्वर्ग के साम्राज्य की झलक पाने से हमें वंचित रखते हैं। यह स्वर्ग का साम्राज्य विश्व में दूर दराज स्थित कोई स्थान नहीं है।हमारी चेतना की ही उच्च अवस्था है। इसको पूर्ण गुरु के द्वारा प्राप्त किया जाता है। अंत में साध्वी प्रीति भारती ने भजन गाए।
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