{"_id":"6983a561cc3561ab1b006a32","slug":"farmers-will-snatch-the-chair-of-those-who-sell-the-country-to-foreign-countries-ratan-mann-kaithal-news-c-18-1-knl1004-839392-2026-02-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"विदेशों के हाथों देश को बेचने वालों की कुर्सी छीन लेंगे किसान : रतन मान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विदेशों के हाथों देश को बेचने वालों की कुर्सी छीन लेंगे किसान : रतन मान
Thu, 05 Feb 2026 01:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Thu, 05 Feb 2026 01:30 AM IST
विज्ञापन
कलायत (कैथल)। भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष रतन मान ने अमेरिका के साथ किए जा रहे कथित कृषि उत्पाद समझौते को भारतीय किसानों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह डील देश के अन्नदाताओं को बर्बाद करने और खेती को कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने की साजिश है। रतन मान गांव खरक पांडवा में किसानों को संबोधित कर रहे थे।
रतन मान ने कहा कि केंद्र सरकार विदेशी दबाव में आकर देश के किसानों की रोजी-रोटी बेचने पर आमादा है। अमेरिका जैसे देशों में किसानों को भारी सब्सिडी, आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर उत्पादन की सुविधाएं मिलती हैं। यदि ऐसे देशों के सस्ते कृषि उत्पाद भारत में खुले बाजार में आने लगे, तो भारतीय किसान अपनी फसल की लागत तक नहीं निकाल पाएंगे।
उन्होंने कहा कि यह कोई समझौता नहीं, बल्कि भारतीय किसानों पर सीधा आर्थिक हमला है। इससे देश की मंडियां तबाह होंगी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था कमजोर पड़ेगी और खेती पूरी तरह निजी कंपनियों के कब्जे में चली जाएगी। संवाद
विज्ञापन
आरोप लगाया कि सरकार ने इस अहम मुद्दे पर न तो किसान संगठनों से कोई चर्चा की और न ही संसद में पारदर्शी बहस करवाई। उन्होंने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। संवाद
विज्ञापन
रतन मान ने कहा कि केंद्र सरकार विदेशी दबाव में आकर देश के किसानों की रोजी-रोटी बेचने पर आमादा है। अमेरिका जैसे देशों में किसानों को भारी सब्सिडी, आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर उत्पादन की सुविधाएं मिलती हैं। यदि ऐसे देशों के सस्ते कृषि उत्पाद भारत में खुले बाजार में आने लगे, तो भारतीय किसान अपनी फसल की लागत तक नहीं निकाल पाएंगे।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि यह कोई समझौता नहीं, बल्कि भारतीय किसानों पर सीधा आर्थिक हमला है। इससे देश की मंडियां तबाह होंगी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था कमजोर पड़ेगी और खेती पूरी तरह निजी कंपनियों के कब्जे में चली जाएगी। संवाद
विज्ञापन
आरोप लगाया कि सरकार ने इस अहम मुद्दे पर न तो किसान संगठनों से कोई चर्चा की और न ही संसद में पारदर्शी बहस करवाई। उन्होंने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। संवाद