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राम वनवास पर भाव विभोर हो उठे श्रद्धालु
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Devotees got emotional on Ram's exile
- फोटो : Kaithal
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चंदाना गेट स्थित श्री ग्यारह रुद्री मंदिर प्रांगण में श्री गणेश ड्रामिटिक क्लब की ओर से आयोजित रामलीला मंचन के तीसरे दिन भगवान श्रीराम के वन गमन का मंचन किया गया। शनिवार रात्रि को सबसे पहले मंच के कलाकारों ने प्रार्थना की।
इसके बाद रामलीला का मंचन शुरू हुआ। मंचन में कैकई मंथरा व दशरथ कैकेयी संवाद में राम वनवास मांगना दिखाया जाता है। इस दौरान सबसे पहले महाराजा दशरथ श्रीराम के राजतिलक की मुनादी पूरे अयोध्या में करवा देते हैं। जिस पर इसकी सूचना मंथरा को पता चलती तो वह कैकेयी के पास जाती है। वे रानी को बहकावे में लेकर श्री राम को वनवास और भरत का राजतिलक राजा दशरथ से वचन मांगने का आग्रह करती है। इस पर कैकेयी राजा दशरथ को अपना वचन याद दिलाती है।
उनसे श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास और भरत को राजतिलक का वचन ले लेती है। इसके बाद श्री राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी वनों में जाने के लिए तैयार होते हैं। अंतिम दृश्य में अयोध्या के वासी श्री राम, लक्ष्मण व सीता को विदाई देते हैं। श्री राम वनवास जाने लगते हैं, तब अयोध्यावासी भी उनके पीछे पीछे चलते हुए नदी तक आ पहुंचते हैं। तब राम अयोध्या वासियों को समझाने का प्रयास करते हैं कि वह पिता के दिए हुए वचन को निभाने के लिए जा रहे हैं। अयोध्यावासी वापस जाने को राजी हो जाते हैं। पहले केवट राम को यमुना पार करवाने के लिए मना करता है, लेकिन भगवान के प्रार्थना करने पर वह राजी हो जाता है। वहां पहुंचकर राम की वाल्मीकि आश्रम पहुंचते हैं और वाल्मीकि से मंत्रणा करने के अनुसार राम, सीता व लक्ष्मण चित्रकूट पर्वत पर रहने लगते हैं। दूसरे दृश्य में अयोध्या में पुत्र के वियोग में दशरथ का स्वर्गवास हो जाता है।
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भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल से वापस आने पर वह अपनी माता कैकेयी को उसकी चाल के कारण उनकी निंदा करते हैं। भरत अयोध्या के राज्य को अस्वीकार कर देते हैं और राम को मनाने के लिए समस्त स्नेही जनों के साथ चित्रकूट पर्वत पर चले जाते हैं।
कैकेयी को भी महाराज दशरथ की मृत्यु के बाद पश्चाताप होता है। सीता के माता पिता सुनैयना व जनक भी चित्रकूट पर्वत पर पहुंचते है। राम अयोध्या चलकर राज्य करने से मना कर दिया और रघुवंश की रीत निभाने के लिए भरत के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। भरत श्री राम की चरण पादुका लेकर लौट आए और उन्हें सिंहासन पर विराजमान कर दिया।
श्री गणेश ड्रामिटिक क्लब के सदस्य एडवोकेट गौरव शर्मा ने बताया कि तीसरे दिन भगवान श्री राम वनवास का मंचन हुआ। उन्होंने कहा कि मंचन के माध्यम से पवित्र ग्रंथ रामायण से भगवान की सेवा करने का मौका मिलता है। इसके साथ हमारे जीवन जीने की शैली में बदलाव भी आता है।
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इसके बाद रामलीला का मंचन शुरू हुआ। मंचन में कैकई मंथरा व दशरथ कैकेयी संवाद में राम वनवास मांगना दिखाया जाता है। इस दौरान सबसे पहले महाराजा दशरथ श्रीराम के राजतिलक की मुनादी पूरे अयोध्या में करवा देते हैं। जिस पर इसकी सूचना मंथरा को पता चलती तो वह कैकेयी के पास जाती है। वे रानी को बहकावे में लेकर श्री राम को वनवास और भरत का राजतिलक राजा दशरथ से वचन मांगने का आग्रह करती है। इस पर कैकेयी राजा दशरथ को अपना वचन याद दिलाती है।
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उनसे श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास और भरत को राजतिलक का वचन ले लेती है। इसके बाद श्री राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी वनों में जाने के लिए तैयार होते हैं। अंतिम दृश्य में अयोध्या के वासी श्री राम, लक्ष्मण व सीता को विदाई देते हैं। श्री राम वनवास जाने लगते हैं, तब अयोध्यावासी भी उनके पीछे पीछे चलते हुए नदी तक आ पहुंचते हैं। तब राम अयोध्या वासियों को समझाने का प्रयास करते हैं कि वह पिता के दिए हुए वचन को निभाने के लिए जा रहे हैं। अयोध्यावासी वापस जाने को राजी हो जाते हैं। पहले केवट राम को यमुना पार करवाने के लिए मना करता है, लेकिन भगवान के प्रार्थना करने पर वह राजी हो जाता है। वहां पहुंचकर राम की वाल्मीकि आश्रम पहुंचते हैं और वाल्मीकि से मंत्रणा करने के अनुसार राम, सीता व लक्ष्मण चित्रकूट पर्वत पर रहने लगते हैं। दूसरे दृश्य में अयोध्या में पुत्र के वियोग में दशरथ का स्वर्गवास हो जाता है।
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भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल से वापस आने पर वह अपनी माता कैकेयी को उसकी चाल के कारण उनकी निंदा करते हैं। भरत अयोध्या के राज्य को अस्वीकार कर देते हैं और राम को मनाने के लिए समस्त स्नेही जनों के साथ चित्रकूट पर्वत पर चले जाते हैं।
कैकेयी को भी महाराज दशरथ की मृत्यु के बाद पश्चाताप होता है। सीता के माता पिता सुनैयना व जनक भी चित्रकूट पर्वत पर पहुंचते है। राम अयोध्या चलकर राज्य करने से मना कर दिया और रघुवंश की रीत निभाने के लिए भरत के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। भरत श्री राम की चरण पादुका लेकर लौट आए और उन्हें सिंहासन पर विराजमान कर दिया।
श्री गणेश ड्रामिटिक क्लब के सदस्य एडवोकेट गौरव शर्मा ने बताया कि तीसरे दिन भगवान श्री राम वनवास का मंचन हुआ। उन्होंने कहा कि मंचन के माध्यम से पवित्र ग्रंथ रामायण से भगवान की सेवा करने का मौका मिलता है। इसके साथ हमारे जीवन जीने की शैली में बदलाव भी आता है।