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पलायन का मंजर...याद कर आज भी सिहर जाते हैं मजदूर
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जितेंद्र पांचाल
कैथल। एक साल पहले लगे लॉकडाउन में जिले से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को पलायन करना पड़ा। बिना संसाधन और सुविधाओं के काफी मजदूरों को पैदल ही मीलों का सफर करने को मजबूर होना पड़ा। हालांकि सरकार और संस्थाओं ने इनकी मदद के लिए शिविर भी लगाए। फिर भी डरे सहमे मजदूरों को अपने घर पहुंचने के अलावा महामारी से बचने का कोई दूसरा विकल्प दिखाई नहीं दे रहा था। अमर उजाला से बातचीत में वापस अपने कार्यों पर लौटे प्रवासी मजदूरों ने उस समय की अपनी व्यथा सुनाई। मजदूरों ने कहा कि जेब में एक भी पैसा नहीं बचा था। परिवार भूख से मरने के कगार पर था। ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि वे अपने घरों को लौट जाएं। यह सोचकर वे अपने प्रदेशों की ओर निकल पड़े। उस माहौल को याद कर आज भी डर लगता है।
मुरादाबाद यूपी निवासी प्रवासी मजदूर प्रमोद, हरसिंह, अमनेश, किरण, प्रवीन, उर्मिला, राहुल, अंशु, गिरीजा, कलावती व गुड्डी ने बताया कि उनके करीब 90 परिवार शहर में अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं। लॉकडाउन के दौरान जब खाने-पीने के भी लाले पड़ गए तो आधे से ज्यादा परिवारों ने अपने प्रदेश लौटना ही बेहतर समझा। करीब 200 व्यक्ति कैथल से यूपी के लिए चल पड़े।
शुरू में तो सरकार की ओर से बस व अन्य वाहन की सुविधा भी नहीं थी। इस कारण मीलों पैदल चलना पड़ा। बाद में जब करीब आधे व्यक्ति पैदल निकल चुके थे तो सरकार द्वारा बस सुविधा दी गई। वे ये सोचकर वापस गए थे कि अब अपने घरों में रहकर ही कोई काम शुरू करेंगे, लेकिन वहां भी हालात खराब हो गए तो फिर से उनके काफी परिवार कैथल आए हैं। -संवाद
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पंतनगर में रह रही यूपी निवासी किरण ने बताया कि एक समय ऐसा आ गया था, जब उनके पास खाने के सामान तक की दिक्कतें हो गई थी। काम बंद हो गए थे। लोगों को घरों से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं थी। ऐसे में कुछ सामाजिक संस्थाओं द्वारा तो कुछ प्रशासन की ओर से सहायता मिली। एक साथ सभी प्रदेश भी नहीं जा सकते थे, क्योंकि यहां मजदूरी का काम करते थे तो वो प्रभावित होता। अब भी पहले की तरह काम पटरी पर नहीं लौट पाया है।
उर्मिला देवी ने बताया कि जब मजदूर कैथल से अपने घरों को जा रहे थे तो उनके पास जरूरत की वस्तुएं तक नहीं थी। जैसे-तैसे घर पहुंच तो गए, लेकिन दिक्कतें वहां भी ऐसे ही थी। खाने का सामान तो था, लेकिन सोने के लिए कंबल तक नहीं था। जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो वापस यहां आए। अब स्थिति में थोड़ा सुधार होने लगा है।
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कैथल। एक साल पहले लगे लॉकडाउन में जिले से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को पलायन करना पड़ा। बिना संसाधन और सुविधाओं के काफी मजदूरों को पैदल ही मीलों का सफर करने को मजबूर होना पड़ा। हालांकि सरकार और संस्थाओं ने इनकी मदद के लिए शिविर भी लगाए। फिर भी डरे सहमे मजदूरों को अपने घर पहुंचने के अलावा महामारी से बचने का कोई दूसरा विकल्प दिखाई नहीं दे रहा था। अमर उजाला से बातचीत में वापस अपने कार्यों पर लौटे प्रवासी मजदूरों ने उस समय की अपनी व्यथा सुनाई। मजदूरों ने कहा कि जेब में एक भी पैसा नहीं बचा था। परिवार भूख से मरने के कगार पर था। ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि वे अपने घरों को लौट जाएं। यह सोचकर वे अपने प्रदेशों की ओर निकल पड़े। उस माहौल को याद कर आज भी डर लगता है।
मुरादाबाद यूपी निवासी प्रवासी मजदूर प्रमोद, हरसिंह, अमनेश, किरण, प्रवीन, उर्मिला, राहुल, अंशु, गिरीजा, कलावती व गुड्डी ने बताया कि उनके करीब 90 परिवार शहर में अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं। लॉकडाउन के दौरान जब खाने-पीने के भी लाले पड़ गए तो आधे से ज्यादा परिवारों ने अपने प्रदेश लौटना ही बेहतर समझा। करीब 200 व्यक्ति कैथल से यूपी के लिए चल पड़े।
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शुरू में तो सरकार की ओर से बस व अन्य वाहन की सुविधा भी नहीं थी। इस कारण मीलों पैदल चलना पड़ा। बाद में जब करीब आधे व्यक्ति पैदल निकल चुके थे तो सरकार द्वारा बस सुविधा दी गई। वे ये सोचकर वापस गए थे कि अब अपने घरों में रहकर ही कोई काम शुरू करेंगे, लेकिन वहां भी हालात खराब हो गए तो फिर से उनके काफी परिवार कैथल आए हैं। -संवाद
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पंतनगर में रह रही यूपी निवासी किरण ने बताया कि एक समय ऐसा आ गया था, जब उनके पास खाने के सामान तक की दिक्कतें हो गई थी। काम बंद हो गए थे। लोगों को घरों से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं थी। ऐसे में कुछ सामाजिक संस्थाओं द्वारा तो कुछ प्रशासन की ओर से सहायता मिली। एक साथ सभी प्रदेश भी नहीं जा सकते थे, क्योंकि यहां मजदूरी का काम करते थे तो वो प्रभावित होता। अब भी पहले की तरह काम पटरी पर नहीं लौट पाया है।
उर्मिला देवी ने बताया कि जब मजदूर कैथल से अपने घरों को जा रहे थे तो उनके पास जरूरत की वस्तुएं तक नहीं थी। जैसे-तैसे घर पहुंच तो गए, लेकिन दिक्कतें वहां भी ऐसे ही थी। खाने का सामान तो था, लेकिन सोने के लिए कंबल तक नहीं था। जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो वापस यहां आए। अब स्थिति में थोड़ा सुधार होने लगा है।