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नोटबंदी : दूध को बनाया कैश का विकल्प
ब्यूरो कैथल
Updated Sat, 03 Dec 2016 12:19 AM IST
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दूध की कीमत में कैश के बदले वस्तु से शुरू की लेनदेन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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नोटबंदी के बाद अब लोग वैकल्पिक माध्यमों को अपनाने लगे हैं। जहां सरकार कैशलेस लेन-देन की दिशा में प्रयास कर रही है वहीं लोग अपने ही तरीके से लेन-देन कर रहे हैं। वह भी बिना नकदी लिए-दिए। इसे देखकर यह कहना मुनासिब होगा कि एक तरह से वस्तु विनियम का जमाना दोबारा आ गया है। यही कारण है कि यहां एक दूध उत्पादक किसान ने नकदी रहित लेन-देन शुरू कर दी है।
गांव शेरगढ़ निवासी सत्यवान ने बताया कि उसके पास कुल 35 भैंसें है। उसकी आमदनी दूध से होती है और उसका प्रतिदिन का 5 से 15 हजार रुपये तक का कारोबार है। लेकिन नोटबंदी के बाद से ही उसे यह भय होने लगा कि अब वह भैंसों का खर्चा कैसे उठाएगा। उसने बताया कि जब बैंकों में रोजाना लाइनों में लगने के बावजूद भी रुपये नहीं मिलते थे तो उसे काफी परेशानी आई। तब उसने बैंक जाना ही छोड़ दिया और लोगों से रुपये के बदले वस्तुएं लेने की पहल की। उसने बताया कि जिस दुधियों को वह दूध देता है वह भी उसे बड़े नोट दे देेते थे। लेकिन अब उसने उनसे खल की बोरी लेनी शुरू कर दी। दूध वाले दूध की कीमत की बजाए उसे खल मुहैया करवा रहे हैं। दूध बिक्री से जो आय होती है, उसमें से खल की कीमत काट लेते हैं।
इसी प्रकार से उसके पास एक मजदूर है। जो दूध खरीदता है। उसने दूध देने के बदले उसकी भैंसों की देखरेख का काम शुरू कर दिया। इस तरह के लेन-देन से उसकी भैंसों के लिए खल की जरूरतें पूरी हो गईं। साथ ही उसकी भैंसों की देखरेख में उसे सहायता मिल गई। वहीं गांव में एक अन्य व्यक्ति को गेहूं के बदले दूध दिया तो दूसरे को बाजरे के बदले। अब वह प्रयास कर रहा है कि घर की अन्य जरूरतों के लिए भी दूध के माध्यम से लेन-देन किया जाए।
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गांव शेरगढ़ निवासी सत्यवान ने बताया कि उसके पास कुल 35 भैंसें है। उसकी आमदनी दूध से होती है और उसका प्रतिदिन का 5 से 15 हजार रुपये तक का कारोबार है। लेकिन नोटबंदी के बाद से ही उसे यह भय होने लगा कि अब वह भैंसों का खर्चा कैसे उठाएगा। उसने बताया कि जब बैंकों में रोजाना लाइनों में लगने के बावजूद भी रुपये नहीं मिलते थे तो उसे काफी परेशानी आई। तब उसने बैंक जाना ही छोड़ दिया और लोगों से रुपये के बदले वस्तुएं लेने की पहल की। उसने बताया कि जिस दुधियों को वह दूध देता है वह भी उसे बड़े नोट दे देेते थे। लेकिन अब उसने उनसे खल की बोरी लेनी शुरू कर दी। दूध वाले दूध की कीमत की बजाए उसे खल मुहैया करवा रहे हैं। दूध बिक्री से जो आय होती है, उसमें से खल की कीमत काट लेते हैं।
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इसी प्रकार से उसके पास एक मजदूर है। जो दूध खरीदता है। उसने दूध देने के बदले उसकी भैंसों की देखरेख का काम शुरू कर दिया। इस तरह के लेन-देन से उसकी भैंसों के लिए खल की जरूरतें पूरी हो गईं। साथ ही उसकी भैंसों की देखरेख में उसे सहायता मिल गई। वहीं गांव में एक अन्य व्यक्ति को गेहूं के बदले दूध दिया तो दूसरे को बाजरे के बदले। अब वह प्रयास कर रहा है कि घर की अन्य जरूरतों के लिए भी दूध के माध्यम से लेन-देन किया जाए।
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