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Kaithal News: राजपूत काल की निकली प्राचीन मूर्ति
Sun, 17 Aug 2025 01:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sun, 17 Aug 2025 01:57 AM IST
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20 पूंडरी। फरल में प्राचीन मूर्ति के साथ छात्र। स्वयं
संवाद न्यूज एजेंसी
पूंडरी। ऐतिहासिक महत्व रखने वाले गांव फरल से हाल ही में मिली एक प्राचीन मूर्ति अब राजपूत काल की निकली है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान, ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश) के छात्र जसबीर सिंह, राजदीप और रवि सिरोही ने अन्वेषण के दौरान इस मूर्ति को खोजा। शुरुआत में इसे गुर्जर प्रतिहार काल का माना जा रहा था, लेकिन बाद में गांव से मिले इसके अन्य हिस्सों के आधार पर यह राजपूत काल की सिद्ध हुई।
जानकारी के अनुसार यह टूटी हुई चूना पत्थर की मूर्ति वर्षों से गांव के प्राचीन शिव मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे पड़ी थी और लोग इसे शिवलिंग मानकर दूध, जल चढ़ाते थे। सफाई के बाद स्पष्ट हुआ कि यह किसी देवी-देवता, संभवतः नरसिंह भगवान या शिव की मूर्ति हो सकती है, जिसकी अभी तक सटीक पहचान नहीं हो सकी है।
छात्रों ने बताया कि फरल गांव में पहले भी कुषाण कालीन तांबे के सिक्के, मिट्टी के बर्तन और गुप्त व राजपूत काल की वस्तुएं मिल चुकी हैं। यहां से मिली छोटी-छोटी मूर्तियों से यह संकेत मिलता है कि उस समय इस क्षेत्र में मंदिर अवश्य रहा होगा। छात्र राजीव और जसबीर ने बताया कि मूर्ति अधूरी होने के कारण पहले इसे प्रतिहार काल का माना गया था लेकिन हाल में मिली अन्य मूर्तियों की बनावट और संरचना राजपूत काल से मेल खाती है।
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उनका कहना है कि यह मूर्ति राजपूतों की कुल देवी या नरसिंह भगवान की हो सकती है, क्योंकि इस क्षेत्र पर राजपूतों का वर्चस्व रहा है। राजपूत काल 7वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक रहा। यह काल हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद शुरू हुआ और दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक माना जाता है।
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पूंडरी। ऐतिहासिक महत्व रखने वाले गांव फरल से हाल ही में मिली एक प्राचीन मूर्ति अब राजपूत काल की निकली है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान, ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश) के छात्र जसबीर सिंह, राजदीप और रवि सिरोही ने अन्वेषण के दौरान इस मूर्ति को खोजा। शुरुआत में इसे गुर्जर प्रतिहार काल का माना जा रहा था, लेकिन बाद में गांव से मिले इसके अन्य हिस्सों के आधार पर यह राजपूत काल की सिद्ध हुई।
जानकारी के अनुसार यह टूटी हुई चूना पत्थर की मूर्ति वर्षों से गांव के प्राचीन शिव मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे पड़ी थी और लोग इसे शिवलिंग मानकर दूध, जल चढ़ाते थे। सफाई के बाद स्पष्ट हुआ कि यह किसी देवी-देवता, संभवतः नरसिंह भगवान या शिव की मूर्ति हो सकती है, जिसकी अभी तक सटीक पहचान नहीं हो सकी है।
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छात्रों ने बताया कि फरल गांव में पहले भी कुषाण कालीन तांबे के सिक्के, मिट्टी के बर्तन और गुप्त व राजपूत काल की वस्तुएं मिल चुकी हैं। यहां से मिली छोटी-छोटी मूर्तियों से यह संकेत मिलता है कि उस समय इस क्षेत्र में मंदिर अवश्य रहा होगा। छात्र राजीव और जसबीर ने बताया कि मूर्ति अधूरी होने के कारण पहले इसे प्रतिहार काल का माना गया था लेकिन हाल में मिली अन्य मूर्तियों की बनावट और संरचना राजपूत काल से मेल खाती है।
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उनका कहना है कि यह मूर्ति राजपूतों की कुल देवी या नरसिंह भगवान की हो सकती है, क्योंकि इस क्षेत्र पर राजपूतों का वर्चस्व रहा है। राजपूत काल 7वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक रहा। यह काल हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद शुरू हुआ और दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक माना जाता है।

20 पूंडरी। फरल में प्राचीन मूर्ति के साथ छात्र। स्वयं