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सत चित आनंद ही है परमात्मा का साक्षात स्वरूप : आचार्य संतोष
Updated Thu, 11 Jan 2018 12:02 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
कलायत। कलायत के श्री कपिल मुनि धाम में भागवताचार्य संतोष कृष्ण जी के परम सान्निध्य में श्रीमद्भागवत कथा का आरंभ हुआ। कथा के आरंभ से पहले श्रीमद्भागवत महापुराण की नगरफेरी तथा कलश यात्रा निकाली गई जिसमें सैंकड़ों महिलाओं ने हिस्सा लिया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत श्री कपिल मुनि मंदिर के मुख्य पुजारी वेद प्रकाश गौतम ने की। उपस्थित श्रोताओं को श्रीमद्भागवत ज्ञान सागर में ज्ञान की डुबकी लगवाते हुए कथा व्यास आचार्य संतोष ने कहा कि श्रीमद्ेागवत महापुराण की रचना कलियुग के जीवों के उद्धार के लिए ही की गई है। इस कथा के सुनने मात्र से कलियुग में जीव के समस्त दोष दूर हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि शास्त्र कहता है कि कलियुग में भगवान को पाने के लिए वन जाने की आवश्यकता नहीं। श्रीमद्भागवत के सुनने या फिर करने से भागवत व्यवहार व परमार्थ का समन्वय होता है तथा पात्र को वही आनंद घर में मिल जाता है जो योगीजन वनों में तपस्या के द्वारा प्राप्त करते हैं। गृहस्थ आश्रम में भी योगी समाधि जैसा आनंद मिले इसी लिए तो भगवान ने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की है। उन्होंने कहा कि वैसे तो परमात्मा विराट है पर श्रीमद्भागवत में प्रभु के तीन रूप माने जाते हैं। सत प्रकट रूप से सर्वत्र है, चित मौन तथा आनंद स्वरूप अप्रकट रूप में जाना जाता है। इन तीनों को मिला कर ही सच्चिदानंद यानी भगवान के साक्षात दर्शन होते हैं।
त चित आनंद ही है परमात्मा का साक्षात स्वरूप : आचार्य संतोष
पिंडदान का अर्थ है स्वयं को प्रभु को समर्पित करना
कपिल मुनि मंदिर परिसर में बही श्रीमद्भागवत ज्ञान गंगा
फोटो नंबर- 33 व 34
कलायत। कलायत के श्री कपिल मुनि धाम में भागवताचार्य संतोष कृष्ण जी के परम सान्निध्य में श्रीमद्भागवत कथा का आरंभ हुआ। कथा के आरंभ से पहले श्रीमद्भागवत महापुराण की नगरफेरी तथा कलश यात्रा निकाली गई जिसमें सैंकड़ों महिलाओं ने हिस्सा लिया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत श्री कपिल मुनि मंदिर के मुख्य पुजारी वेद प्रकाश गौतम ने की। उपस्थित श्रोताओं को श्रीमद्भागवत ज्ञान सागर में ज्ञान की डुबकी लगवाते हुए कथा व्यास आचार्य संतोष ने कहा कि श्रीमद्ेागवत महापुराण की रचना कलियुग के जीवों के उद्धार के लिए ही की गई है। इस कथा के सुनने मात्र से कलियुग में जीव के समस्त दोष दूर हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि शास्त्र कहता है कि कलियुग में भगवान को पाने के लिए वन जाने की आवश्यकता नहीं। श्रीमद्भागवत के सुनने या फिर करने से भागवत व्यवहार व परमार्थ का समन्वय होता है तथा पात्र को वही आनंद घर में मिल जाता है जो योगीजन वनों में तपस्या के द्वारा प्राप्त करते हैं। गृहस्थ आश्रम में भी योगी समाधि जैसा आनंद मिले इसी लिए तो भगवान ने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की है। उन्होंने कहा कि वैसे तो परमात्मा विराट है पर श्रीमद्भागवत में प्रभु के तीन रूप माने जाते हैं। सत प्रकट रूप से सर्वत्र है, चित मौन तथा आनंद स्वरूप अप्रकट रूप में जाना जाता है। इन तीनों को मिला कर ही सच्चिदानंद यानी भगवान के साक्षात दर्शन होते हैं।
त चित आनंद ही है परमात्मा का साक्षात स्वरूप : आचार्य संतोष
पिंडदान का अर्थ है स्वयं को प्रभु को समर्पित करना
कपिल मुनि मंदिर परिसर में बही श्रीमद्भागवत ज्ञान गंगा
फोटो नंबर- 33 व 34