{"_id":"59690f6d4f1c1bc95b8b477a","slug":"71500057453-kaithal-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रदेश में सदियों से चली आ रही कोथली की परंपरा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्रदेश में सदियों से चली आ रही कोथली की परंपरा
Updated Sat, 15 Jul 2017 12:15 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सदियों से चली आ रही कोथली की परंपरा
अमर उजाला ब्यूरो
राजौंद। प्रदेश में सदियों से कोथली की परंपरा चली आ रही है। सावन की महीना शुरू होते ही हर किसी महिला को सबसे ज्यादा इंतजार अपने पीहर से आने वाले कोथली का होता है। लंबे समय से चली आ रही मान्यता के अनुसार शादी के बाद लड़की का पहला सावन अपने मायके पक्ष में बिताना आवश्यक होता है। पहले सावन में लड़की की कोथली भी ससुराल पक्ष द्वारा भेजी जाती है। उसके बाद महिला चाहे कितनी भी आयु की क्यों न हो सावन के शुरू होते ही उसे अपने पीहर से आने वाली कोथली का बेसब्री से इंतजार रहता है।
सावन में चाहे बस हो या मैक्सी कैब हर वाहन में कोथली वालों का बोल-बाला होता है। सावन शुरू होते ही धीरे-धीरे शुरू हुई कोथली परम्परा, तीज उत्सव के समीप आते-आते पूरे यौवन पर पहुंच जाती है। वैसे तो यह सिलसिला पूरा सावन मास चलता रहता है। परंतु तीज उत्सव के बाद यह रस्म ज्यादातर वृद्ध महिलाओं की परिजनों द्वारा ही पूरी की जाती है। महिला कृष्णा व बीरमती ने बताया कि आज के युग में आधुनिकता के चलते प्राचीन परम्पराओं का दायरा सिमट कर रह गया है। जिसके चलते प्राचीन रीति-रिवाजों में जो श्रद्धा व भावना का मेल-मिलाप होता था। 87 वर्षीय सुखदेवी ने बताया कि पहले सावन में आने वाली कोथली के पकवानों को पूरे मोहल्ले में बांटा जाता था। जिससे खुद ही सब को पता चल जाता था, कि उस परिवार में किस महिला की कोथली आई है। परंतु आज कोथली भी अपने घर तक सिमट कर रह गई है। और घर पर पुरी निष्ठा व प्रेम से बनने वाले पकवानों की जगह बाजार में उपलब्ध घेवर, फिरनी, बिस्कुट व अन्य उत्पादों ने ले लिया है। जिसकी वजह से पारंपरिक कोथली की परंपरा में आधुनिकता की चमक दमक समाकर रह गई है।
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
राजौंद। प्रदेश में सदियों से कोथली की परंपरा चली आ रही है। सावन की महीना शुरू होते ही हर किसी महिला को सबसे ज्यादा इंतजार अपने पीहर से आने वाले कोथली का होता है। लंबे समय से चली आ रही मान्यता के अनुसार शादी के बाद लड़की का पहला सावन अपने मायके पक्ष में बिताना आवश्यक होता है। पहले सावन में लड़की की कोथली भी ससुराल पक्ष द्वारा भेजी जाती है। उसके बाद महिला चाहे कितनी भी आयु की क्यों न हो सावन के शुरू होते ही उसे अपने पीहर से आने वाली कोथली का बेसब्री से इंतजार रहता है।
सावन में चाहे बस हो या मैक्सी कैब हर वाहन में कोथली वालों का बोल-बाला होता है। सावन शुरू होते ही धीरे-धीरे शुरू हुई कोथली परम्परा, तीज उत्सव के समीप आते-आते पूरे यौवन पर पहुंच जाती है। वैसे तो यह सिलसिला पूरा सावन मास चलता रहता है। परंतु तीज उत्सव के बाद यह रस्म ज्यादातर वृद्ध महिलाओं की परिजनों द्वारा ही पूरी की जाती है। महिला कृष्णा व बीरमती ने बताया कि आज के युग में आधुनिकता के चलते प्राचीन परम्पराओं का दायरा सिमट कर रह गया है। जिसके चलते प्राचीन रीति-रिवाजों में जो श्रद्धा व भावना का मेल-मिलाप होता था। 87 वर्षीय सुखदेवी ने बताया कि पहले सावन में आने वाली कोथली के पकवानों को पूरे मोहल्ले में बांटा जाता था। जिससे खुद ही सब को पता चल जाता था, कि उस परिवार में किस महिला की कोथली आई है। परंतु आज कोथली भी अपने घर तक सिमट कर रह गई है। और घर पर पुरी निष्ठा व प्रेम से बनने वाले पकवानों की जगह बाजार में उपलब्ध घेवर, फिरनी, बिस्कुट व अन्य उत्पादों ने ले लिया है। जिसकी वजह से पारंपरिक कोथली की परंपरा में आधुनिकता की चमक दमक समाकर रह गई है।
विज्ञापन