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जीरो बजट की खेती को बढ़ावा व किसानों की आय दौगुनी करने के प्रति गंभीरता से आगे बढ़ रहे है- राज्यपाल आचार्य देवव्रत
Updated Tue, 23 Jan 2018 12:29 AM IST
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‘जीरो बजट खेती से किसान को होती है ज्यादा आय’
अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने व किसानों की आय को दोगुना करने के प्रति गंभीरता से आगे बढ़ रहे हैं। किसान जहर मुक्त खेती से जीरो बजट खेती अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण को शुद्ध व स्वयं को स्वस्थ रख सकते हैं। आचार्य देवव्रत स्थानीय लोक निर्माण विश्राम गृह में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के तहत प्रेस प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा देशभर में जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए गंभीरता से प्रयास किए जा रहे हैं ताकि किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सके और देश वासियों को शुद्ध खाद्यान्न प्राप्त हो सके। उन्होंने कहा कि जीरो बजट खेती और जैविक खेती में अंतर स्पष्ट है। एक तरफ जहां जीरो बजट खेती में किसान को न तो अपनी फसल के लिए कोई उत्पाद बाजार से खरीदना होता है और इस पद्धति में किसान को पहले वर्ष से ही पूरा उत्पादन मिलना शुरू हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ जैविक खेती में किसानों को महंगे दामों पर रासायनिक उत्पाद खरीदने होते हैं तथा जैविक खेती में प्रथम तीन वर्ष तक फसलों का उत्पादन भी कम प्राप्त होता है। ऐसे में जैविक खेती से किसानों को ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता, जबकि जीरो बजट खेती से किसान को ज्यादा आय होती है।
राज्यपाल ने कहा कि कुरुक्षेत्र गुरुकुल में जीरो बजट खेती को अपनाकर बंजर भूमि से भी प्रथम वर्ष पूरा उत्पादन लिया है। जीरो बजट खेती का शोध महाराष्ट्र के पद्मश्री सुभाष पालेकर ने खुद के फार्म पर किया था। कुरुक्षेत्र गुरुकुल द्वारा 19 से 24 मार्च तक जीरो बजट खेती पर 6 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें जीरो बजट खेती के शोधकर्ता सुभाष पालेकर भी भाग लेंगे।
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उन्होंने कहा कि जीरो बजट खेती के तहत जीवामृत एवं घनजीवामृत पद्धतियां हैं। जीवामृत पद्धति में एक एकड़ के लिए 10 किलोग्राम गाय का गोबर, 5 से 10 लीटर देशी गाय का मूत्र, एक से दो किलोग्राम गुड़, एक से दो किलोग्राम बेसन, एक किलोग्राम पेड़ के नीचे की मिट्टी तथा 200 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इन सभी सामग्रियों को प्लास्टिक के ड्रम में घोलना है। लकड़ी के एक डंडे से इस घोल को 2 से 3 दिन तक सड़ने के लिए छाया में रखना है। प्रतिदिन 2 बार सुबह शाम घड़ी की सुई की दिशा में लकड़ी के डंडे से दो मिनट तक घुमाकर ढक देना है। यह घोल एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि देशी गाय के एक ग्राम गोबर में 300 से 500 करोड़ उपयोगी भोजन निर्माण करने वाले जीवाणु होते हैं। एक गाय के साथ 25 से 30 एकड़ भूमि में खेती की जा सकती है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान से प्रेरित होकर उन्होंने अंबाला की चमन वाटिका में आधुनिक कन्या गुरुकुल शुरू किया है तथा नीलोखेड़ी में भी एक आधुनिक गुरुकुल शुरू किया गया है, जहां पर 4 फरवरी को 500 बच्चों के प्रथम विंग का उद्घाटन किया जाएगा। इस अवसर पर राज्यपाल के एडीसी मेजर रोहन मुंशी, मीडिया सचिव जयंत शर्मा, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. वजीर सिंह मौजूद रहे।
फोटो नंबर- 01
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अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने व किसानों की आय को दोगुना करने के प्रति गंभीरता से आगे बढ़ रहे हैं। किसान जहर मुक्त खेती से जीरो बजट खेती अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण को शुद्ध व स्वयं को स्वस्थ रख सकते हैं। आचार्य देवव्रत स्थानीय लोक निर्माण विश्राम गृह में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के तहत प्रेस प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा देशभर में जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए गंभीरता से प्रयास किए जा रहे हैं ताकि किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सके और देश वासियों को शुद्ध खाद्यान्न प्राप्त हो सके। उन्होंने कहा कि जीरो बजट खेती और जैविक खेती में अंतर स्पष्ट है। एक तरफ जहां जीरो बजट खेती में किसान को न तो अपनी फसल के लिए कोई उत्पाद बाजार से खरीदना होता है और इस पद्धति में किसान को पहले वर्ष से ही पूरा उत्पादन मिलना शुरू हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ जैविक खेती में किसानों को महंगे दामों पर रासायनिक उत्पाद खरीदने होते हैं तथा जैविक खेती में प्रथम तीन वर्ष तक फसलों का उत्पादन भी कम प्राप्त होता है। ऐसे में जैविक खेती से किसानों को ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता, जबकि जीरो बजट खेती से किसान को ज्यादा आय होती है।
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राज्यपाल ने कहा कि कुरुक्षेत्र गुरुकुल में जीरो बजट खेती को अपनाकर बंजर भूमि से भी प्रथम वर्ष पूरा उत्पादन लिया है। जीरो बजट खेती का शोध महाराष्ट्र के पद्मश्री सुभाष पालेकर ने खुद के फार्म पर किया था। कुरुक्षेत्र गुरुकुल द्वारा 19 से 24 मार्च तक जीरो बजट खेती पर 6 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें जीरो बजट खेती के शोधकर्ता सुभाष पालेकर भी भाग लेंगे।
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उन्होंने कहा कि जीरो बजट खेती के तहत जीवामृत एवं घनजीवामृत पद्धतियां हैं। जीवामृत पद्धति में एक एकड़ के लिए 10 किलोग्राम गाय का गोबर, 5 से 10 लीटर देशी गाय का मूत्र, एक से दो किलोग्राम गुड़, एक से दो किलोग्राम बेसन, एक किलोग्राम पेड़ के नीचे की मिट्टी तथा 200 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इन सभी सामग्रियों को प्लास्टिक के ड्रम में घोलना है। लकड़ी के एक डंडे से इस घोल को 2 से 3 दिन तक सड़ने के लिए छाया में रखना है। प्रतिदिन 2 बार सुबह शाम घड़ी की सुई की दिशा में लकड़ी के डंडे से दो मिनट तक घुमाकर ढक देना है। यह घोल एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि देशी गाय के एक ग्राम गोबर में 300 से 500 करोड़ उपयोगी भोजन निर्माण करने वाले जीवाणु होते हैं। एक गाय के साथ 25 से 30 एकड़ भूमि में खेती की जा सकती है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान से प्रेरित होकर उन्होंने अंबाला की चमन वाटिका में आधुनिक कन्या गुरुकुल शुरू किया है तथा नीलोखेड़ी में भी एक आधुनिक गुरुकुल शुरू किया गया है, जहां पर 4 फरवरी को 500 बच्चों के प्रथम विंग का उद्घाटन किया जाएगा। इस अवसर पर राज्यपाल के एडीसी मेजर रोहन मुंशी, मीडिया सचिव जयंत शर्मा, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. वजीर सिंह मौजूद रहे।
फोटो नंबर- 01