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Kaithal News: चार माह से 160 सफाईकर्मी घर बैठे 50 लाख का टेंडर... वर्क आर्डर फंसा
Sun, 22 Feb 2026 01:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sun, 22 Feb 2026 01:57 AM IST
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नरेंद्र पंडित
कैथल। स्वच्छता रैंकिंग में नगर परिषद सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है। अधिकारियों की ढुलमुल कार्यप्रणाली के कारण पिछले चार महीनों से 160 सफाई कर्मी घर बैठे हैं। ठेकेदार के माध्यम से कार्य करने वाले इन कर्मचारियों की बहाली टेंडर प्रक्रिया में अटकी हुई है। परिषद का दावा है कि करीब 50 लाख रुपये का टेंडर हो चुका है और अब केवल वर्क ऑर्डर जारी होना बाकी है।
दरअसल, जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, शहर की सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटती नजर नहीं आ रही। सफाई का काम नियमित कर्मचारियों के भरोसे है। शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से स्वच्छता के निर्धारित मानकों को देखें तो नगर परिषद पीछे है।
अनुमानित तौर पर शहर की समुचित सफाई के लिए कम से कम 700 सफाई कर्मियों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में परिषद के पास 400 कर्मचारी भी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्यों को हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
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वर्ष 2024 की स्वच्छता रैंकिंग में शहर 502वें स्थान पर खिसक गया था। मौजूदा हालात को देखते हुए आगामी रैंकिंग में सुधार की उम्मीद कमजोर नजर आ रही है। नगर परिषद के पास नियमित करीब 260 सफाई कर्मचारी हैं। शहर में 31 वार्ड हैं और इसके अलावा पूरे शहर की सफाई उनके कंधे पर हैं। संख्या कम होने के कारण पूरे शहर में नियमित सफाई नहीं हो पा रही है।
संसाधनों का टोटा, कचरे के अंबार
सिर्फ मानव संसाधन ही नहीं, बल्कि मशीनी संसाधनों की भी भारी कमी है। नियमानुसार प्रत्येक वार्ड में कम से कम दो टिपर (डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण वाहन) होने चाहिए, लेकिन कई वार्डों में एक ही टिपर से काम चलाया जा रहा है।
कचरा उठाने के लिए जहां 20 से 22 ट्रैक्टरों की आवश्यकता है, वहां मात्र 10 ट्रैक्टर ही सड़कों पर उपलब्ध हैं। लोडर की संख्या भी अपर्याप्त है। ऐसे में शहर के सभी हिस्सों से समय पर कचरा उठाना संभव नहीं हो पा रहा।
टेंडर प्रक्रिया में देरी के कारण सफाई व्यवस्था का पूरा ढांचा चरमरा गया है। एक ओर 160 सफाई कर्मी काम पर लौटने का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई वार्डों में नालियां चोक पड़ी हैं और सड़कों पर कचरे के ढेर लगे हुए हैं।
नगर परिषद कर्मचारी संघ के प्रधान महेंद्र का कहना है कि चार माह बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक कर्मचारियों को ड्यूटी पर नहीं बुलाया गया। टेंडर और वर्क ऑर्डर की प्रक्रिया में ही मामला अटका हुआ है। संवाद
इस बार शहर को बेहतर स्वच्छता रैंकिंग दिलाने के लिए टीमें दिन-रात कार्य कर रही हैं। 160 सफाई कर्मियों के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जल्द ही वर्क ऑर्डर जारी किया जाएगा। वर्क ऑर्डर जारी होते ही सभी कर्मचारी काम पर लौट आएंगे।
-कपिल शर्मा, जिला नगर आयुक्त
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चार माह बाद भी टेंडर प्रक्रिया पूरी कर कर्मचारियों को काम पर क्यों नहीं बुलाया गया?
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पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन न होने पर स्वच्छता सर्वेक्षण टीम को क्या दिखाया जाएगा?
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टेंडर प्रक्रिया में देरी से कहीं शहर की रैंकिंग और नीचे तो नहीं चली जाएगी?
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क्या इस बार भी स्वच्छता
अभियान केवल पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएगा?
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कैथल। स्वच्छता रैंकिंग में नगर परिषद सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है। अधिकारियों की ढुलमुल कार्यप्रणाली के कारण पिछले चार महीनों से 160 सफाई कर्मी घर बैठे हैं। ठेकेदार के माध्यम से कार्य करने वाले इन कर्मचारियों की बहाली टेंडर प्रक्रिया में अटकी हुई है। परिषद का दावा है कि करीब 50 लाख रुपये का टेंडर हो चुका है और अब केवल वर्क ऑर्डर जारी होना बाकी है।
दरअसल, जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, शहर की सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटती नजर नहीं आ रही। सफाई का काम नियमित कर्मचारियों के भरोसे है। शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से स्वच्छता के निर्धारित मानकों को देखें तो नगर परिषद पीछे है।
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अनुमानित तौर पर शहर की समुचित सफाई के लिए कम से कम 700 सफाई कर्मियों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में परिषद के पास 400 कर्मचारी भी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्यों को हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
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वर्ष 2024 की स्वच्छता रैंकिंग में शहर 502वें स्थान पर खिसक गया था। मौजूदा हालात को देखते हुए आगामी रैंकिंग में सुधार की उम्मीद कमजोर नजर आ रही है। नगर परिषद के पास नियमित करीब 260 सफाई कर्मचारी हैं। शहर में 31 वार्ड हैं और इसके अलावा पूरे शहर की सफाई उनके कंधे पर हैं। संख्या कम होने के कारण पूरे शहर में नियमित सफाई नहीं हो पा रही है।
संसाधनों का टोटा, कचरे के अंबार
सिर्फ मानव संसाधन ही नहीं, बल्कि मशीनी संसाधनों की भी भारी कमी है। नियमानुसार प्रत्येक वार्ड में कम से कम दो टिपर (डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण वाहन) होने चाहिए, लेकिन कई वार्डों में एक ही टिपर से काम चलाया जा रहा है।
कचरा उठाने के लिए जहां 20 से 22 ट्रैक्टरों की आवश्यकता है, वहां मात्र 10 ट्रैक्टर ही सड़कों पर उपलब्ध हैं। लोडर की संख्या भी अपर्याप्त है। ऐसे में शहर के सभी हिस्सों से समय पर कचरा उठाना संभव नहीं हो पा रहा।
टेंडर प्रक्रिया में देरी के कारण सफाई व्यवस्था का पूरा ढांचा चरमरा गया है। एक ओर 160 सफाई कर्मी काम पर लौटने का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई वार्डों में नालियां चोक पड़ी हैं और सड़कों पर कचरे के ढेर लगे हुए हैं।
नगर परिषद कर्मचारी संघ के प्रधान महेंद्र का कहना है कि चार माह बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक कर्मचारियों को ड्यूटी पर नहीं बुलाया गया। टेंडर और वर्क ऑर्डर की प्रक्रिया में ही मामला अटका हुआ है। संवाद
इस बार शहर को बेहतर स्वच्छता रैंकिंग दिलाने के लिए टीमें दिन-रात कार्य कर रही हैं। 160 सफाई कर्मियों के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जल्द ही वर्क ऑर्डर जारी किया जाएगा। वर्क ऑर्डर जारी होते ही सभी कर्मचारी काम पर लौट आएंगे।
-कपिल शर्मा, जिला नगर आयुक्त
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चार माह बाद भी टेंडर प्रक्रिया पूरी कर कर्मचारियों को काम पर क्यों नहीं बुलाया गया?
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पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन न होने पर स्वच्छता सर्वेक्षण टीम को क्या दिखाया जाएगा?
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टेंडर प्रक्रिया में देरी से कहीं शहर की रैंकिंग और नीचे तो नहीं चली जाएगी?
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क्या इस बार भी स्वच्छता
अभियान केवल पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएगा?