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निजी कंपनी की लापरवाही से बासमती निर्यात पर मंडराया खतरा
Updated Thu, 09 Nov 2017 12:22 AM IST
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निजी कंपनी की लापरवाही से बासमती निर्यात पर मंडराया खतरा
नसीब सैनी
कैथल। पांच साल से निजी कंपनी की जा रही लापरवाही और धान को कीट से बचाने के लिए डाली जा रही दवा से चावल के प्रभावित होने का खामियाजा अब खुद किसान और चावल इंडस्ट्री को भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि जो हालात बन रहे हैं, उसके अनुसार यूरोपीय यूनियन अगले एक साल तक एक जनवरी के बाद से भारत से बासमती की 1401 किस्म(मूच्छल) के आयात पर बैन लगा सकती है। इस आशंका के कारण चावल निर्यातक इससे पहले तक अधिक से अधिक मात्रा में चावल अपने यहां से चावल भेजने में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि, 15 से 20 नवंबर तक ही जो चावल यहां से भेजा जाएगा, वही 1 जनवरी 2018 तक यूरोप पहुंच सकेगा। इसके बाद 1 जनवरी 2018 से 31 दिसंबर 2018 तक वहां इस किस्म के आयात पर प्रतिबंध लगा सकता है।
कंपनी ने अब दिया जवाब, जिसकी टेस्टिंग में लगेगा एक साल
यूरोप में 3.6 लाख टन चावल का निर्यात होता है। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, स्पेन सहित कई बड़े देशों में मूच्छल किस्म के चावल का भी निर्यात किया जाता है। बताया जा रहा है कि इसमें 0.03 से लेकर 0.04 प्रतिशत तक ट्राईसाइक्लाजोल नामक केमिकल मिला है। जबकि वहां इसे 0.01 प्रतिशत तक ही अनुमति है। इसके लिए दवा निर्माता कंपनी से यूरोपीय यूनियन ने जवाब मांगा था। अखिल भारतीय चावल निर्यातक एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया कि संभावना है कि 1 जनवरी 2018 से लेकर 31 दिसंबर 2018 तक चावल की इस किस्म का यूरोप में निर्यात प्रभावित होगा। क्योंकि ईयू के नियमों के अनुसार एक दवा कंपनी ने अपना जो जवाब दिया है, उस पर समीक्षा एवं उसकी टेस्टिंग में ईयू को करीब एक साल लगने वाला है, जो कम से कम अवधि है। ऐसे में ईयू के नियमों के चलते वहां चावल नहीं भेजा जा सकेगा। जिस कारण इन देशों में भेजे जाने वाले मूच्छल चावल के निर्यात का काम प्रभावित हो सकता है। शेष किस्मों का निर्यात जारी रह सकता है।
गर्दन तोड़ की बीमारी के इलाज में प्रयोग होती है दवा:-जिस दवा को लेकर विवाद है, उसका प्रयोग मूच्छल की फसल में गर्दन तोड़ बीमारी में किया जाता है। हालांकि किसानों को विशेषज्ञों की सलाह से इसका प्रयोग करना चाहिए। लेकिन किसान बीमारी आने के बाद जाने अनजाने में अपना ही नुकसान कर लेता है। अधिक दवा के चलते दवा के अंश चावल में भी रह जाते हैं।
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केंद्र सरकार को अवगत करवाया:-नए साल में बनने वाले संभावित हालात को देखते हुए अखिल भारतीय राइस मिलर्स एसोसिएशन ने केंद्र सरकार को अवगत करवा दिया है। सरकार ने भी फिलहाल निर्यातकों को अपना निर्यात करने के लिए कहा है। एसोसिएशन के अखिल भारतीय अध्यक्ष विजय सेतिया ने कहा कि सरकार की जानकारी में पूरी बात ला दी गई है। सरकार जो भी निर्णय लेगी, आगे उसी अनुसार निर्यात होगा।
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नसीब सैनी
कैथल। पांच साल से निजी कंपनी की जा रही लापरवाही और धान को कीट से बचाने के लिए डाली जा रही दवा से चावल के प्रभावित होने का खामियाजा अब खुद किसान और चावल इंडस्ट्री को भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि जो हालात बन रहे हैं, उसके अनुसार यूरोपीय यूनियन अगले एक साल तक एक जनवरी के बाद से भारत से बासमती की 1401 किस्म(मूच्छल) के आयात पर बैन लगा सकती है। इस आशंका के कारण चावल निर्यातक इससे पहले तक अधिक से अधिक मात्रा में चावल अपने यहां से चावल भेजने में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि, 15 से 20 नवंबर तक ही जो चावल यहां से भेजा जाएगा, वही 1 जनवरी 2018 तक यूरोप पहुंच सकेगा। इसके बाद 1 जनवरी 2018 से 31 दिसंबर 2018 तक वहां इस किस्म के आयात पर प्रतिबंध लगा सकता है।
कंपनी ने अब दिया जवाब, जिसकी टेस्टिंग में लगेगा एक साल
यूरोप में 3.6 लाख टन चावल का निर्यात होता है। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, स्पेन सहित कई बड़े देशों में मूच्छल किस्म के चावल का भी निर्यात किया जाता है। बताया जा रहा है कि इसमें 0.03 से लेकर 0.04 प्रतिशत तक ट्राईसाइक्लाजोल नामक केमिकल मिला है। जबकि वहां इसे 0.01 प्रतिशत तक ही अनुमति है। इसके लिए दवा निर्माता कंपनी से यूरोपीय यूनियन ने जवाब मांगा था। अखिल भारतीय चावल निर्यातक एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया कि संभावना है कि 1 जनवरी 2018 से लेकर 31 दिसंबर 2018 तक चावल की इस किस्म का यूरोप में निर्यात प्रभावित होगा। क्योंकि ईयू के नियमों के अनुसार एक दवा कंपनी ने अपना जो जवाब दिया है, उस पर समीक्षा एवं उसकी टेस्टिंग में ईयू को करीब एक साल लगने वाला है, जो कम से कम अवधि है। ऐसे में ईयू के नियमों के चलते वहां चावल नहीं भेजा जा सकेगा। जिस कारण इन देशों में भेजे जाने वाले मूच्छल चावल के निर्यात का काम प्रभावित हो सकता है। शेष किस्मों का निर्यात जारी रह सकता है।
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गर्दन तोड़ की बीमारी के इलाज में प्रयोग होती है दवा:-जिस दवा को लेकर विवाद है, उसका प्रयोग मूच्छल की फसल में गर्दन तोड़ बीमारी में किया जाता है। हालांकि किसानों को विशेषज्ञों की सलाह से इसका प्रयोग करना चाहिए। लेकिन किसान बीमारी आने के बाद जाने अनजाने में अपना ही नुकसान कर लेता है। अधिक दवा के चलते दवा के अंश चावल में भी रह जाते हैं।
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केंद्र सरकार को अवगत करवाया:-नए साल में बनने वाले संभावित हालात को देखते हुए अखिल भारतीय राइस मिलर्स एसोसिएशन ने केंद्र सरकार को अवगत करवा दिया है। सरकार ने भी फिलहाल निर्यातकों को अपना निर्यात करने के लिए कहा है। एसोसिएशन के अखिल भारतीय अध्यक्ष विजय सेतिया ने कहा कि सरकार की जानकारी में पूरी बात ला दी गई है। सरकार जो भी निर्णय लेगी, आगे उसी अनुसार निर्यात होगा।