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40 प्रतिशत रह गई हमारी मिट्टी की उपजाऊ शक्ति
Updated Mon, 04 Dec 2017 11:46 PM IST
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40 प्रतिशत रह गई हमारी मिट्टी की उपजाऊ शक्ति
अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। जिले में खादों व दवाओं के अंधाधुंध प्रयोग से हमारी मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घटकर 40 प्रतिशत रह गई है। दवाओं के सहारे से किसान उत्पादन करने में जुटे हैं। धान व गेहूं के फसल चक्र के कारण मिट्टी का स्वास्थ्य लगातार बढ़ रहा है। जिले में इस साल अभी तक 83 हजार 77 मिट्टी के सैंपल लेकर जांच किए गए। जिसमें पता चला है कि पूरे जिले में यदि मिट्टी के पोषक तत्वों को बचाना है तो धान व गेहूं का फसल चक्र छोड़कर दालों का उत्पादन बढ़ाना होगा। साथ ही खेतों को हरी खाद की तुरंत आवश्यकता है।
नाइट्रोजन व फास्फोरस की भारी कमी : मिट्टी की सेहत के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार नाइट्रोजन, पोटाश व फासफोरस का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। लेकिन जिले में यह बिगड़ कर 0.4:-10:1 पहुंच गया है। जिससे आने वाले समय में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
कैथल में मिट्टी पानी जांच लैब में कार्यरत सूरजभान ने बताया कि जिले में नाइट्रोजन व फासफोरस की कमी तो है ही। साथ में सूक्ष्म पोषक तत्वों में जिंक, मैग्नीज, आयन, कॉपर, बोरोन सहित कई अन्य तत्वों की कमी आ गई है। किसानों को सोयल हेल्थ कार्ड बनाकर दिए जा रहे हैं। इसके बावजूद अधिकतर किसान अपने मिट्टी-पानी जांच के लिए बनाए गए सोयल हेल्थ कार्ड के अनुसार खाद व दवाओं का प्रयोग नहीं करता। जिले में मिट्टी की औसतन उपजाऊ क्षमता 40 प्रतिशत रह गई है।
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गेहूं व धान की फसल में डाले जाते हैं ज्यादा कीटनाशक, खरपतवार नाशक व खादें : जिले में लगभग 1 लाख 90 हजार हेक्टेयर में उत्पादित फसलों में अधिकतर इलाका धान व गेहूं का है। जिसमें अधिकतर किसान बिना किसी वैज्ञानिक सलाह के ही खाद व दवाएं डाल देते हैं। अनावश्यक खाद व दवाओं से जहां कृषि उत्पादों में जहर की मात्रा बढ़ रही है। वहीं वे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को कम कर रहे हैं।
हरी खाद डालें व दालों का उत्पादन करें : जिला कृषि उपनिदेशक डा. महावीर सिंह के अनुसार किसानों को हरी खाद का प्रयोग करना चाहिए। खेतों में ढेंचा या मूंग व दूसरी दालें उगाएं। दालों की जड़ों में कई तरह के सूक्ष्म तत्व होते है। जिससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ेगी। साथ ही ढेेंचे व मूंग की पत्तियों से भी खाद बन जाती है। किसान गेहूं व धान के फसल चक्र के अलावा दूसरी फसलें भी उगाएं। ताकि संतुलन बना रह सके। कृषि वैज्ञानिक डा. जसबीर ने बताया कि केंद्र में हुई मिट्टी पानी जांच में 41 प्रतिशत सैंपलों में ऑर्गेनिक कार्बन 0.4 प्रतिशत से भी कम हैं। जबकि ये 0.4 से 0.8 तक होने चाहिए। जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।
फोटो संख्या-29 व 30
विश्व मृदा दिवस पर विशेष:-
अंधाधुंध दवाओं व खादों के प्रयोग से मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ा
नाइट्रोजन व फास्फोरस सहित सूक्ष्म तत्वों की भारी कमी
इस साल लिए गए हैं 80 हजार 77 मिट्टी के सैंपलों की जांच में पता चला
अब जवाब देने लगी है हमारी मिट्टी
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अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। जिले में खादों व दवाओं के अंधाधुंध प्रयोग से हमारी मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घटकर 40 प्रतिशत रह गई है। दवाओं के सहारे से किसान उत्पादन करने में जुटे हैं। धान व गेहूं के फसल चक्र के कारण मिट्टी का स्वास्थ्य लगातार बढ़ रहा है। जिले में इस साल अभी तक 83 हजार 77 मिट्टी के सैंपल लेकर जांच किए गए। जिसमें पता चला है कि पूरे जिले में यदि मिट्टी के पोषक तत्वों को बचाना है तो धान व गेहूं का फसल चक्र छोड़कर दालों का उत्पादन बढ़ाना होगा। साथ ही खेतों को हरी खाद की तुरंत आवश्यकता है।
नाइट्रोजन व फास्फोरस की भारी कमी : मिट्टी की सेहत के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार नाइट्रोजन, पोटाश व फासफोरस का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। लेकिन जिले में यह बिगड़ कर 0.4:-10:1 पहुंच गया है। जिससे आने वाले समय में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
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कैथल में मिट्टी पानी जांच लैब में कार्यरत सूरजभान ने बताया कि जिले में नाइट्रोजन व फासफोरस की कमी तो है ही। साथ में सूक्ष्म पोषक तत्वों में जिंक, मैग्नीज, आयन, कॉपर, बोरोन सहित कई अन्य तत्वों की कमी आ गई है। किसानों को सोयल हेल्थ कार्ड बनाकर दिए जा रहे हैं। इसके बावजूद अधिकतर किसान अपने मिट्टी-पानी जांच के लिए बनाए गए सोयल हेल्थ कार्ड के अनुसार खाद व दवाओं का प्रयोग नहीं करता। जिले में मिट्टी की औसतन उपजाऊ क्षमता 40 प्रतिशत रह गई है।
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गेहूं व धान की फसल में डाले जाते हैं ज्यादा कीटनाशक, खरपतवार नाशक व खादें : जिले में लगभग 1 लाख 90 हजार हेक्टेयर में उत्पादित फसलों में अधिकतर इलाका धान व गेहूं का है। जिसमें अधिकतर किसान बिना किसी वैज्ञानिक सलाह के ही खाद व दवाएं डाल देते हैं। अनावश्यक खाद व दवाओं से जहां कृषि उत्पादों में जहर की मात्रा बढ़ रही है। वहीं वे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को कम कर रहे हैं।
हरी खाद डालें व दालों का उत्पादन करें : जिला कृषि उपनिदेशक डा. महावीर सिंह के अनुसार किसानों को हरी खाद का प्रयोग करना चाहिए। खेतों में ढेंचा या मूंग व दूसरी दालें उगाएं। दालों की जड़ों में कई तरह के सूक्ष्म तत्व होते है। जिससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ेगी। साथ ही ढेेंचे व मूंग की पत्तियों से भी खाद बन जाती है। किसान गेहूं व धान के फसल चक्र के अलावा दूसरी फसलें भी उगाएं। ताकि संतुलन बना रह सके। कृषि वैज्ञानिक डा. जसबीर ने बताया कि केंद्र में हुई मिट्टी पानी जांच में 41 प्रतिशत सैंपलों में ऑर्गेनिक कार्बन 0.4 प्रतिशत से भी कम हैं। जबकि ये 0.4 से 0.8 तक होने चाहिए। जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।
फोटो संख्या-29 व 30
विश्व मृदा दिवस पर विशेष:-
अंधाधुंध दवाओं व खादों के प्रयोग से मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ा
नाइट्रोजन व फास्फोरस सहित सूक्ष्म तत्वों की भारी कमी
इस साल लिए गए हैं 80 हजार 77 मिट्टी के सैंपलों की जांच में पता चला
अब जवाब देने लगी है हमारी मिट्टी