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मृदा परीक्षण से बढ़ेगी पैदावार : डॉ. धीरज
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09जेएनडी14: मालवी गांव में किसानों को जागरूक करते हुए डॉ. धीरज पंघाल। स्रोत : ग्रामीण
- फोटो : दुर्गेश चाहर
जींद। कृषि विज्ञान केंद्र, पांडू पिंडारा और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के संयुक्त तत्वावधान में गांव मालवी में खेत बचाओ अभियान के तहत जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और टिकाऊ खेती के उपायों की जानकारी दी गई।
कृषि विज्ञान केंद्र के जिला विस्तार विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. धीरज पंघाल नेकहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता लगातार प्रभावित हो रही है। किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। इससे फसलों को आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते हैं, उत्पादन लागत घटती है और पैदावार में वृद्धि होती है।
डॉ. पंघाल ने गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और अन्य जैविक स्रोतों के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि जैविक पदार्थ मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाते हैं। इससे जल धारण क्षमता बढ़ती है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है, जिससे मृदा स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता दोनों में सुधार होता है।
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उन्होंने हरी खाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ढैंचा जैसी फसलों को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।
इस दौरान कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के बीटीएम हेमंत ने किसानों को मेरी फसल मेरा ब्यौरा मेरा पानी मेरी विरासत तथा धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) जैसी योजनाओं की जानकारी दी।
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कृषि विज्ञान केंद्र के जिला विस्तार विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. धीरज पंघाल नेकहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता लगातार प्रभावित हो रही है। किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। इससे फसलों को आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते हैं, उत्पादन लागत घटती है और पैदावार में वृद्धि होती है।
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डॉ. पंघाल ने गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और अन्य जैविक स्रोतों के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि जैविक पदार्थ मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाते हैं। इससे जल धारण क्षमता बढ़ती है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है, जिससे मृदा स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता दोनों में सुधार होता है।
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उन्होंने हरी खाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ढैंचा जैसी फसलों को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।
इस दौरान कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के बीटीएम हेमंत ने किसानों को मेरी फसल मेरा ब्यौरा मेरा पानी मेरी विरासत तथा धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) जैसी योजनाओं की जानकारी दी।