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रावण का वध अहंकार पर धर्म की विजय का प्रतीक : मधुरेश
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06जेएनडी21: सामूहिक संगीतमय श्रीरामायण पाठ महोत्सव में मौजूद श्रद्धालु। स्रोत: आयोजक
जींद। गुरुद्वारा गली स्थित श्री शिव शक्ति कृपा मंदिर में वेदाचार्य दंडी स्वामी डॉ. निगमबोध तीर्थ महाराज के सानिध्य में चल रहे सामूहिक संगीतमय श्रीरामायण पाठ महोत्सव में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। अयोध्या से पहुंचे व्यास मधुरेश दास महाराज ने कथा के दौरान भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। रावण वध और भगवान श्रीराम की चित्रकूट वापसी का प्रसंग सुनाते समय मंदिर परिसर जय श्रीराम के जयघोष से गूंज उठा।
मधुरेश दास महाराज ने कहा कि रामायण केवल पूजा-पाठ तक सीमित धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है। भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, मर्यादा, त्याग, संयम और कर्तव्य के प्रति समर्पण का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि रावण विद्वान होने के साथ शक्तिशाली भी था लेकिन अहंकार और अधर्म ने उसके विवेक को कमजोर कर दिया। इसी कारण उसका अंत हुआ।
उन्होंने कहा कि रावण वध का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह केवल एक दुष्ट के अंत की कथा नहीं, बल्कि अहंकार पर धर्म, असत्य पर सत्य और अधर्म पर मर्यादा की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीराम ने अपनी शक्ति का उपयोग लोककल्याण और धर्म की रक्षा के लिए किया, जबकि रावण ने ज्ञान और सामर्थ्य का गलत मार्ग में प्रयोग किया।
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कथा में उन्होंने श्रीराम-रावण युद्ध और माता सीता की मुक्ति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं से रामायण के आदर्शों को जीवन में अपनाने तथा परिवार और समाज में प्रेम, सम्मान, सेवा और सद्भाव बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
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मधुरेश दास महाराज ने कहा कि रामायण केवल पूजा-पाठ तक सीमित धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है। भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, मर्यादा, त्याग, संयम और कर्तव्य के प्रति समर्पण का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि रावण विद्वान होने के साथ शक्तिशाली भी था लेकिन अहंकार और अधर्म ने उसके विवेक को कमजोर कर दिया। इसी कारण उसका अंत हुआ।
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उन्होंने कहा कि रावण वध का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह केवल एक दुष्ट के अंत की कथा नहीं, बल्कि अहंकार पर धर्म, असत्य पर सत्य और अधर्म पर मर्यादा की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीराम ने अपनी शक्ति का उपयोग लोककल्याण और धर्म की रक्षा के लिए किया, जबकि रावण ने ज्ञान और सामर्थ्य का गलत मार्ग में प्रयोग किया।
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कथा में उन्होंने श्रीराम-रावण युद्ध और माता सीता की मुक्ति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं से रामायण के आदर्शों को जीवन में अपनाने तथा परिवार और समाज में प्रेम, सम्मान, सेवा और सद्भाव बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।