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मन, कर्म, वचन और विचारों से जितना पवित्र रहोगे, भगवान के उतना ही करीब रहोगे : सुखदेव महाराज
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जींद। महान शक्ति संगठन कला धाम के तत्वावधान में रोहतक रोड पर चौड़ी गली स्थित बंसल भवन में विश्व कल्याण और सर्व सुख-शांति के लिए चल रहा 11 दिवसीय महा अखंड जाप आठवें दिन भी जारी रहा। ऋषि सुखदेव महाराज ने कहा कि मन, कर्म, वचन और विचारों से जितना पवित्र रहोगे, भगवान के उतना करीब रहोगे।
पवित्रता में ही भगवान का वास होता है। जो इंसान सच्चे मन और शुद्ध अंतकरण से एक पग परमपिता प्रभु की ओर बढ़ाता है तो प्रभु भगवान भी अपनी अपार कृपा बरसाकर इंसान को सच्चे, प्रेम और वास्तविक आनंद की प्राप्ति कराते हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु की कृपा तो दिन रात बरसती है, जरूरत है तो अपने पात्र को सीधा, स्वच्छ और शुद्ध पवित्र करने की। परमपिता भगवान की अपार कृपा, सच्चे प्रेम और वास्तविक आनंद को प्राप्त करने के लिए इंसान के पास पूर्ण समर्पण, सत्य ज्ञान व शुद्ध पवित्र विचारों का होना अति आवश्यक है। इंसान का परिचय भले ही चेहरे से होता हो, लेकिन इंसान की संपूर्ण पहचान तो उसकी वाणी, व्यवहार और शुद्ध पवित्र विचारों से ही होती है। भगवान की कृपा पाने के लिए सबसे पहले इंसान को गलत संग, बुरे विचारों और स्वार्थ का त्याग करना जरूरी है। गलत संगत और बुरे विचारों से जहां जगत में अज्ञान और बुराइयां फैलती है, वहीं इंसान के अंदर भी जहर की भांति फैल जाती है। इससे इंसान के अंतकरण में अंधेरा ही अंधेरा हो जाता है और उसे सत्य भी नहीं दिखाई देता है।
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पवित्रता में ही भगवान का वास होता है। जो इंसान सच्चे मन और शुद्ध अंतकरण से एक पग परमपिता प्रभु की ओर बढ़ाता है तो प्रभु भगवान भी अपनी अपार कृपा बरसाकर इंसान को सच्चे, प्रेम और वास्तविक आनंद की प्राप्ति कराते हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु की कृपा तो दिन रात बरसती है, जरूरत है तो अपने पात्र को सीधा, स्वच्छ और शुद्ध पवित्र करने की। परमपिता भगवान की अपार कृपा, सच्चे प्रेम और वास्तविक आनंद को प्राप्त करने के लिए इंसान के पास पूर्ण समर्पण, सत्य ज्ञान व शुद्ध पवित्र विचारों का होना अति आवश्यक है। इंसान का परिचय भले ही चेहरे से होता हो, लेकिन इंसान की संपूर्ण पहचान तो उसकी वाणी, व्यवहार और शुद्ध पवित्र विचारों से ही होती है। भगवान की कृपा पाने के लिए सबसे पहले इंसान को गलत संग, बुरे विचारों और स्वार्थ का त्याग करना जरूरी है। गलत संगत और बुरे विचारों से जहां जगत में अज्ञान और बुराइयां फैलती है, वहीं इंसान के अंदर भी जहर की भांति फैल जाती है। इससे इंसान के अंतकरण में अंधेरा ही अंधेरा हो जाता है और उसे सत्य भी नहीं दिखाई देता है।
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