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यूक्रेन से निकलने के लिए छात्रों को देने पड़ रहे पैसे
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जींद। यूक्रेन से भारतीय छात्रों को अपने देश लौटने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। भारत सरकार पर मदद के लिए दबाव बनाने के लिए यूक्रेन के सैनिक भारतीय छात्रों को परेशान कर रहे हैं। छात्राओं के साथ अभद्रता भी की जा रही है। भारतीय बच्चों के पास पैसे भी खत्म हो रहे हैं। इस कारण उनको वहां पर अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है। यह बात यूक्रेन से जींद पहुंचे मयंक अग्रवाल ने बताई। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की सिफारिश या पैसे पहुंच जाते हैं, उनको ही यूक्रेन से निकाला जाता है। मयंक अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने 1700 बच्चों का एक ग्रुप बनाया हुआ है, जिसे सोशल मीडिया से डिलीट करवा दिया गया।
23 फरवरी की रात को यूक्रेन से लौटे मयंक अग्रवाल ने कहा कि जब यूक्रेन व रूस के बीच हालात खराब थे तो उसके माता-पिता ने दबाव देकर उसको अपने वतन बुला लिया, लेकिन वह अपने अन्य साथियों के साथ रहना चाहते थे। मयंक अग्रवाल ने कहा कि वह कीव में रहते थे और उन्होंने 1700 बच्चों का टर्नोपिल डायरी के नाम से ग्रुप बनाया हुआ था। उनके ग्रुप के बच्चे दूसरे बच्चों को निकालने के लिए अब भी यूक्रेन में अन्य बच्चों की मदद कर रहे हैं। वह लोग एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। मयंक अग्रवाल ने कहा कि बच्चों से 15-15 हजार डॉलर लेकर उनको बॉर्डर पार करवाया जा रहा था। वहां बच्चे अब बताते हैं कि वहां पर हालात बहुत खराब हैं। वहां पर बच्चों को बेल्ट से पीटा जा रहा है और छात्राओं के साथ बदसलूकी की जा रही है। हजारों की संख्या में छात्र अब भी पोलैंड, रोमानिया की सीमाओं पर खड़े हैं लेकिन उनको निकालने वाला कोई नहीं है। मयंक अग्रवाल बताते हैं कि वह तीन दिन से सोये नहीं हैं, बल्कि अपने साथियों को निकालने के लिए ग्रुप के माध्यम से लगातार प्रयास कर रहे हैं। भारतीय फ्लाइट बच्चों को लेने जाती है तो बच्चों को नाम से बुलाया जाता है। जिन बच्चों की सिफारिश पहुंच जाती है, उनको भीड़ से निकाला जा रहा है।
अब बच्चे भी हो रहे गायब
अपने आपको टर्नोपिल डायरी नामक संगठन के प्रधान बताने वाले मयंक अग्रवाल ने कहा कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि यूक्रेन में बच्चे गायब हो रहे हैं। बच्चों की संख्या कम दिखाने के लिए बच्चों को गायब किया जा रहा है। मयंक अग्रवाल ने कहा कि भारत सरकार भी कोई खास मदद नहीं कर रही है। अग्रवाल ने कहा कि वह पांच साल से यूक्रेन में था और उसका एमबीबीएस का पांचवां वर्ष था, लेकिन हालात ऐसे हो गए कि उसे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वापस आना पड़ा।
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23 फरवरी की रात को यूक्रेन से लौटे मयंक अग्रवाल ने कहा कि जब यूक्रेन व रूस के बीच हालात खराब थे तो उसके माता-पिता ने दबाव देकर उसको अपने वतन बुला लिया, लेकिन वह अपने अन्य साथियों के साथ रहना चाहते थे। मयंक अग्रवाल ने कहा कि वह कीव में रहते थे और उन्होंने 1700 बच्चों का टर्नोपिल डायरी के नाम से ग्रुप बनाया हुआ था। उनके ग्रुप के बच्चे दूसरे बच्चों को निकालने के लिए अब भी यूक्रेन में अन्य बच्चों की मदद कर रहे हैं। वह लोग एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। मयंक अग्रवाल ने कहा कि बच्चों से 15-15 हजार डॉलर लेकर उनको बॉर्डर पार करवाया जा रहा था। वहां बच्चे अब बताते हैं कि वहां पर हालात बहुत खराब हैं। वहां पर बच्चों को बेल्ट से पीटा जा रहा है और छात्राओं के साथ बदसलूकी की जा रही है। हजारों की संख्या में छात्र अब भी पोलैंड, रोमानिया की सीमाओं पर खड़े हैं लेकिन उनको निकालने वाला कोई नहीं है। मयंक अग्रवाल बताते हैं कि वह तीन दिन से सोये नहीं हैं, बल्कि अपने साथियों को निकालने के लिए ग्रुप के माध्यम से लगातार प्रयास कर रहे हैं। भारतीय फ्लाइट बच्चों को लेने जाती है तो बच्चों को नाम से बुलाया जाता है। जिन बच्चों की सिफारिश पहुंच जाती है, उनको भीड़ से निकाला जा रहा है।
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अब बच्चे भी हो रहे गायब
अपने आपको टर्नोपिल डायरी नामक संगठन के प्रधान बताने वाले मयंक अग्रवाल ने कहा कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि यूक्रेन में बच्चे गायब हो रहे हैं। बच्चों की संख्या कम दिखाने के लिए बच्चों को गायब किया जा रहा है। मयंक अग्रवाल ने कहा कि भारत सरकार भी कोई खास मदद नहीं कर रही है। अग्रवाल ने कहा कि वह पांच साल से यूक्रेन में था और उसका एमबीबीएस का पांचवां वर्ष था, लेकिन हालात ऐसे हो गए कि उसे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वापस आना पड़ा।
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