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पंचतत्व में विलीन
Updated Wed, 20 Sep 2017 11:04 PM IST
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किसान नेता घासीराम पंचतत्व में विलीन
अमर उजाला ब्यूरो
नरवाना। भारतीय किसान यूनियन हरियाणा के पूर्व अध्यक्ष एवं किसान नेता घासीराम नैन का मंगलवार को निधन हो गया। बुधवार को दोपहर बाद उनका दाह संस्कार पैतृक गांव लोहचब में किया। उनके अंतिम संस्कार पर किसान नेताओं के साथ-साथ राजनीतिक लोगों ने भाग लिया। भाकियू के झंडे में लपेटकर दाह संस्कार किया। दाह संस्कार श्मशान की बजाय उनके खेतों में किया गया। मंगलवार को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें हिसार के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 83 वर्षीय घासीराम पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। नरवाना के गांव लोहचब निवासी घासीराम ने लंबे समय तक किसानों के हितों को लेकर संघर्ष किया। घासीराम के पुत्र जोगिंदर नैन ने बताया कि चिकित्सकों के अनुसार उनके पिता का निधन हार्ट अटैक आने से हुआ। इस मौके पर भाकियू के प्रांतीय प्रधान रतनमान करनाल, यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामफल कंडेला, वरिष्ठ उपप्रधान, प्रेम शाहपुर, सुरेंद्र सांगवान करनाल, रिसालसिंह, महताबसिंह कादयान, यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी इंद्रसिंह छत्तीसगढ़ शामिल हुए।
तीन भाईयों में सबसे छोटे से थे घासीराम नैन
घासीराम नैन तीन भाईयों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई छज्जूराम का निधन हो गया जबकि उनसे छोटे भाई का नाम हरिराम है। घासीराम नैन अपने पीछे 75 वर्षीय पत्नी राजदीप, तीन बेटे जयदीप, जगदीश नैन और सबसे छोटा जोगेंद्रसिंह नैन, चार पौत्र और चार पौत्रियां छोड़ गये हैं। उनके निधन पर कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी रणदीपसिंह सुरजेवाला, विधायक पिरथीसिंह नंबरदार, जगरूपसिंह सुरजेवाला, संजीव कल्याण, पूर्व मंत्री रामभज लोधर, भाजपा के जिला प्रधान अमरपाल राणा, मार्केट कमेटी के चेयरमैन इंद्रसिंह मोर, ईश्वर गोयल, रामफल लोट, पूर्व पार्षद रामपाल उझाना सहित अनेक लोगों ने शोक जताया।
किसानों के हितों को लेकर घासीराम नैन ने किया लंबा संघर्ष
सतबीर धीमान
नरवाना। गांव लोहचब निवासी घासीराम नैन ने पिछले चार दशकों में किसानों के हितों को लेकर अलग-अलग सरकारों के खिलाफ कई बड़े आंदोलन कि ये। और अनेक बार भूख हड़ताल पर बैठे। किसानों की मांगों को लेकर संघर्ष में वह 20 बार जेल गए। 2002 में कंडेला कांड के दौरान वह 19 माह जेल में रहे। उन्होंने करीब चार वर्ष राजद्रोह का गंभीर मामला भुगता। 2005 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आने पर राजद्रोह के मामले से छुटकारा मिला। लंबे समय तक किसानों के हितों को लेकर लंबा संघर्ष करने वाले घासीराम ने किसानों का खूब समर्थन मिला। वह नकली बीज और दवाईयां बेचने वाले दुकानदारों के बड़े खिलाफ थे। उन्होंने अनेक बार नकली सामान बेचने वाले लोगों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग की। 1975 में गेहूं का समर्थन मूल्य बढ़ाने को लेकर आंदोलन किया। 1980 में भारतीय किसान यूनियन हरियाणा का गठन किया गया उस समय मांगेराम मलिक अध्यक्ष बने। कुछ समय के बाद उन्हें यूनियन का प्रदेशाध्यक्ष बना दिया। घासीराम नैन ने किसानों द्वारा निसिंग, कंडेला और मंडियाली में चलाए किसान आंदोलनों का समर्थन किया और किसानों पर हो रही ज्यादती को लेकर अपनी आवाज बुलंद की। जब भी किसानों ने पुकारा वह किसानों के हक में खड़े हुए। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल ,बंसीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की सरकारों में घासीराम नैन ने जेल काटी।
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यूपी, पंजाब व राजस्थान में किया हक का झंडा बुलंद
उन्होंने हरियाणा के किसानों के साथ-साथ पंजाब, यूपी, दिल्ली और राजस्थान में जाकर किसानों के हितों को लेकर आंदोलन किए। जिसको लेकर कई बाद जेल गए। पहली बार 1982 में संगरूर में चल रहे किसानों के आंदोलन में शामिल हुए तो उन्हें संगरूर जेल जाना पड़ा। वह किसानों में प्रधान जी के नाम से जाने जाते थे। बेशक आज घासीराम नहीं रहे लेकिन वह किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते रहेंगे।
किसान नेता ने सभी सरकारों के खिलाफ लड़ी लड़ाई
लोहारू में 1982 में किसानों के हितों को लेकर आंदोलन किया गया। वहां एक किसान की मौत हो गई। आंदोलन उग्र होता देख सरकार ने घासीराम नैन की सभी शर्तों को मानना पड़ा। 1985 में बिजली के मुद्दे को लेकर किसानों ने सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। किसानों का यह आंदोलन लंबा चला। किसानों के आंदोलन को कमजोर करने के लिए सरकार ने घासीराम नैन को जेल में डाल दिया। घासीराम नैन 1987 में यूपी के किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के संपर्क में आए। मेरठ आंदोलन में उन्होंने मेरठ तक पैदल यात्रा की और 14 दिन पैदल चलकर मेरठ पहुंचे। 1993 में भजनलाल की कांग्रेस सरकार के दौरान बिजली के मुद्दे पर दो बार आंदोलन किये। कादमा के किसान आंदोलन में 22 अगस्त 1995 को चार किसानों की मौत हो गई। बंसीलाल की हविपा सरकार के दौरान महेंद्रगढ़ जिले के मंढियाली गांव में किसान आंदोलन में भी दो किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। तब घासीराम नैन किसानों के हक में आए और तत्कालीन मुख्यमंत्री से किसानों की लड़ाई लड़ी। मामला काफी तनाव में था उस समय उनके साथी गांव ढुंढवा निवासी जियालाल ने उन्हें पुलिस आने की सूचना दी। किसान आंदोलन 37 महीने चला। 2002 में प्रदेश के किसान कंडेला में एकत्रित हुए और तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को चुनाव से पूर्व किसानों से किए फ्री बिजली पानी देने का वायदा दिलाया लेकिन सरकार ने किसानों की नहीं सुनी। उस समय जींद जिले के 12 किसानों की मौत हो गई। जिस पर सरकार ने उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज करके उन्हें जेल में डाल दिया। वह उस समय 19 माह जेल में रहे। बाद में कांग्रेस की सरकार आने पर उन्हें मामले से फारिग किया। इस तरह घासीराम के नेतृत्व में हर बार किसानों की जीत हुई।
न कभी झूके और न कभी बिके : जियालाल
भाकियू के महासचिव जियालाल ढुंढवा ने कहा कि घासीराम ने ताउम्र किसानों की लड़ाई लड़ी। वह न कभी न कभी झूके और न कभी बिके। उन्होंने कहा कि किसानों के साथ खड़े होने से उन्हें कई बार काफी दिक्कत आई। कई सरकारों ने प्रताड़ित किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। चौटाला शासन में 19 माह जेल में रहे। राजद्रोह का मामला भुगता।
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अमर उजाला ब्यूरो
नरवाना। भारतीय किसान यूनियन हरियाणा के पूर्व अध्यक्ष एवं किसान नेता घासीराम नैन का मंगलवार को निधन हो गया। बुधवार को दोपहर बाद उनका दाह संस्कार पैतृक गांव लोहचब में किया। उनके अंतिम संस्कार पर किसान नेताओं के साथ-साथ राजनीतिक लोगों ने भाग लिया। भाकियू के झंडे में लपेटकर दाह संस्कार किया। दाह संस्कार श्मशान की बजाय उनके खेतों में किया गया। मंगलवार को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें हिसार के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 83 वर्षीय घासीराम पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। नरवाना के गांव लोहचब निवासी घासीराम ने लंबे समय तक किसानों के हितों को लेकर संघर्ष किया। घासीराम के पुत्र जोगिंदर नैन ने बताया कि चिकित्सकों के अनुसार उनके पिता का निधन हार्ट अटैक आने से हुआ। इस मौके पर भाकियू के प्रांतीय प्रधान रतनमान करनाल, यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामफल कंडेला, वरिष्ठ उपप्रधान, प्रेम शाहपुर, सुरेंद्र सांगवान करनाल, रिसालसिंह, महताबसिंह कादयान, यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी इंद्रसिंह छत्तीसगढ़ शामिल हुए।
तीन भाईयों में सबसे छोटे से थे घासीराम नैन
घासीराम नैन तीन भाईयों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई छज्जूराम का निधन हो गया जबकि उनसे छोटे भाई का नाम हरिराम है। घासीराम नैन अपने पीछे 75 वर्षीय पत्नी राजदीप, तीन बेटे जयदीप, जगदीश नैन और सबसे छोटा जोगेंद्रसिंह नैन, चार पौत्र और चार पौत्रियां छोड़ गये हैं। उनके निधन पर कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी रणदीपसिंह सुरजेवाला, विधायक पिरथीसिंह नंबरदार, जगरूपसिंह सुरजेवाला, संजीव कल्याण, पूर्व मंत्री रामभज लोधर, भाजपा के जिला प्रधान अमरपाल राणा, मार्केट कमेटी के चेयरमैन इंद्रसिंह मोर, ईश्वर गोयल, रामफल लोट, पूर्व पार्षद रामपाल उझाना सहित अनेक लोगों ने शोक जताया।
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किसानों के हितों को लेकर घासीराम नैन ने किया लंबा संघर्ष
सतबीर धीमान
नरवाना। गांव लोहचब निवासी घासीराम नैन ने पिछले चार दशकों में किसानों के हितों को लेकर अलग-अलग सरकारों के खिलाफ कई बड़े आंदोलन कि ये। और अनेक बार भूख हड़ताल पर बैठे। किसानों की मांगों को लेकर संघर्ष में वह 20 बार जेल गए। 2002 में कंडेला कांड के दौरान वह 19 माह जेल में रहे। उन्होंने करीब चार वर्ष राजद्रोह का गंभीर मामला भुगता। 2005 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आने पर राजद्रोह के मामले से छुटकारा मिला। लंबे समय तक किसानों के हितों को लेकर लंबा संघर्ष करने वाले घासीराम ने किसानों का खूब समर्थन मिला। वह नकली बीज और दवाईयां बेचने वाले दुकानदारों के बड़े खिलाफ थे। उन्होंने अनेक बार नकली सामान बेचने वाले लोगों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग की। 1975 में गेहूं का समर्थन मूल्य बढ़ाने को लेकर आंदोलन किया। 1980 में भारतीय किसान यूनियन हरियाणा का गठन किया गया उस समय मांगेराम मलिक अध्यक्ष बने। कुछ समय के बाद उन्हें यूनियन का प्रदेशाध्यक्ष बना दिया। घासीराम नैन ने किसानों द्वारा निसिंग, कंडेला और मंडियाली में चलाए किसान आंदोलनों का समर्थन किया और किसानों पर हो रही ज्यादती को लेकर अपनी आवाज बुलंद की। जब भी किसानों ने पुकारा वह किसानों के हक में खड़े हुए। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल ,बंसीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की सरकारों में घासीराम नैन ने जेल काटी।
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यूपी, पंजाब व राजस्थान में किया हक का झंडा बुलंद
उन्होंने हरियाणा के किसानों के साथ-साथ पंजाब, यूपी, दिल्ली और राजस्थान में जाकर किसानों के हितों को लेकर आंदोलन किए। जिसको लेकर कई बाद जेल गए। पहली बार 1982 में संगरूर में चल रहे किसानों के आंदोलन में शामिल हुए तो उन्हें संगरूर जेल जाना पड़ा। वह किसानों में प्रधान जी के नाम से जाने जाते थे। बेशक आज घासीराम नहीं रहे लेकिन वह किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते रहेंगे।
किसान नेता ने सभी सरकारों के खिलाफ लड़ी लड़ाई
लोहारू में 1982 में किसानों के हितों को लेकर आंदोलन किया गया। वहां एक किसान की मौत हो गई। आंदोलन उग्र होता देख सरकार ने घासीराम नैन की सभी शर्तों को मानना पड़ा। 1985 में बिजली के मुद्दे को लेकर किसानों ने सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। किसानों का यह आंदोलन लंबा चला। किसानों के आंदोलन को कमजोर करने के लिए सरकार ने घासीराम नैन को जेल में डाल दिया। घासीराम नैन 1987 में यूपी के किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के संपर्क में आए। मेरठ आंदोलन में उन्होंने मेरठ तक पैदल यात्रा की और 14 दिन पैदल चलकर मेरठ पहुंचे। 1993 में भजनलाल की कांग्रेस सरकार के दौरान बिजली के मुद्दे पर दो बार आंदोलन किये। कादमा के किसान आंदोलन में 22 अगस्त 1995 को चार किसानों की मौत हो गई। बंसीलाल की हविपा सरकार के दौरान महेंद्रगढ़ जिले के मंढियाली गांव में किसान आंदोलन में भी दो किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। तब घासीराम नैन किसानों के हक में आए और तत्कालीन मुख्यमंत्री से किसानों की लड़ाई लड़ी। मामला काफी तनाव में था उस समय उनके साथी गांव ढुंढवा निवासी जियालाल ने उन्हें पुलिस आने की सूचना दी। किसान आंदोलन 37 महीने चला। 2002 में प्रदेश के किसान कंडेला में एकत्रित हुए और तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को चुनाव से पूर्व किसानों से किए फ्री बिजली पानी देने का वायदा दिलाया लेकिन सरकार ने किसानों की नहीं सुनी। उस समय जींद जिले के 12 किसानों की मौत हो गई। जिस पर सरकार ने उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज करके उन्हें जेल में डाल दिया। वह उस समय 19 माह जेल में रहे। बाद में कांग्रेस की सरकार आने पर उन्हें मामले से फारिग किया। इस तरह घासीराम के नेतृत्व में हर बार किसानों की जीत हुई।
न कभी झूके और न कभी बिके : जियालाल
भाकियू के महासचिव जियालाल ढुंढवा ने कहा कि घासीराम ने ताउम्र किसानों की लड़ाई लड़ी। वह न कभी न कभी झूके और न कभी बिके। उन्होंने कहा कि किसानों के साथ खड़े होने से उन्हें कई बार काफी दिक्कत आई। कई सरकारों ने प्रताड़ित किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। चौटाला शासन में 19 माह जेल में रहे। राजद्रोह का मामला भुगता।