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महामारी के मृतकों को पहलवानों ने सिर मुंडवाकर दी श्रद्धांजलि

Wed, 19 May 2021 12:25 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Wed, 19 May 2021 12:25 AM IST
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Wrestlers pay tribute to the dead of pandemic
बहादुरगढ़। ओल्ड इंडस्ट्रियल क्षेत्र स्थित बुल्लड़ अखाड़े से जुड़े पहलवानों ने अपना सिर मुंडवाकर व सफेद वस्त्र पहनकर कोरोना के कारण गांव मांडोठी सहित क्षेत्र में हुई अकाल मौतों पर शोक प्रकट करते हुए दो मिनट का मौन धारण कर मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। अखाड़ा संचालक वीरेंद्र उर्फ बुल्लड़ पहलवान ने कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए निजी अस्पतालों द्वारा मनमानी करने का आरोप लगाते हुए रोष जताया।
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अखाड़ा संचालक वीरेंद्र उर्फ बुल्लड़ पहलवान ने बताया कि उनके अपने पैतृक गांव मांडोठी में कोरोना के कारण लगभग 60 लोगों की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि हजारों करोड़ रुपये विभिन्न चुनावों में, प्रधानमंत्री के लिए हजारों करोड़ का निवास बनाने और दूसरे देशों को दान देने के बजाय सरकार अपने देश में अस्पताल बनाने, दवाइयां और आक्सीजन आदि सुविधाएं जुटाती तो आज कोरोना संकट से निपटा जा सकता था। लोगों की इस तरह अकाल मृत्यु न होती। सरकार धरातल के बजाय बयानबाजी से ही इलाज से संबंधित सभी कमी को पूरा कर रही है। जबकि हकीकत यह है कि संक्रमित ऑक्सीजन, दवाएं, रेमडेसिविर इंजेक्शन, बेड, वेंटिलेटर का भारी अभाव झेल रहे हैं।
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बुल्लड़ ने कहा कि कोरोना महामारी में शहर के निजी अस्पताल वालों ने मानवता को तार-तार करते हुए अपना असली रूप जनता को दिखाया है। लोग अस्पतालों के बाहर इलाज की गुहार लगाते रहे मगर अस्पतालों ने किसी की नहीं सुनी। काफी लोगों की इलाज के अभाव में मौत हो गई। उन्होंने कहा शहर के निजी अस्पतालों द्वारा भर्ती नहीं करने की कई शिकायत उन्हें भी मिली। इस बारे में उन्होंने प्रशासन को अवगत कराया तो सरकार ने अस्पतालों की शिकायत के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी कर पल्ला झाड़ लिया। अस्पतालों के बाहर रेट लिस्ट के बोर्ड लगाकर कर्तव्य से इतिश्री कर ली। लेकिन निजी अस्पतालों का रवैया अब भी खराब है। मरीजों से पूरे पैसे पहले जमा करवाने को कहते हैं। अन्यथा इलाज नहीं।
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बुल्लड़ पहलवान ने कहा कि समर्थ लोग भी जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे नहीं आ रहे। बिरादरी और राजनीति के ठेकेदार संकट के समय लोगों को सहयोग करने के बजाय दुबके हैं। महीनेभर से ज्यादा होने को हैं। शहर और देहात का कोई श्मशान घाट ऐसा नहीं है जो लगातार धधकने से बचा हुआ हो। ऐसे में हर किसी को खास तौर पर समर्थ लोगों को ऊंचनीच गोतनात, जातपात, धर्म आदि का भेदभाव भुलाकर एक -दूसरे की मदद करने की जरूरत है, तभी हम सभी बच पाएंगे।
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