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सुविधाएं व संसाधन नहीं, तो कैसे पैदा होंगी गीता-बबीता

Thu, 05 Jan 2017 01:04 AM IST
अमर उाला ब्यूरो/बहादुरगढ
अमर उाला ब्यूरो/बहादुरगढ Updated Thu, 05 Jan 2017 01:04 AM IST
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हिंदी फिल्म दंगल की सफलता के बाद लाइमलाइट में आई महिला कुश्ती आज भी पुराने ढर्रे पर है। फिल्म देखने उमड़ी भीड़ के चलते उसकी कमाई 300 करोड़ का आंकड़ा छूने जा रही है तो दूसरी तरफ अपनी किस्मत का सितारा चमकाने के प्रयास में जी जान से जुटी महिला पहलवान जरूरी सुविधाओं को तरस रही हैं। यह हकीकत है यहां के एक महिला कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र की।
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जिले के एकमात्र महिला कुश्ती प्ररिक्षण केंद्र की यही कड़वी सच्चाई है। इस अखाड़े में गीता व बबीता फोगाट सरीखी पहलवान बनने की क्षमता रखने वाली मेहनती महिला पहलवानों की कोई कमी नहीं है, समस्या सुविधाओं के प्रति सरकार की बेरुखी की है। इन केंद्रों में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के लिए महिला कोच तक उपलब्ध नहीं है। अन्य कमियों की बता तो छोड़िए खेल के दौरान लगने वाली चोटों से राहत के लिए चिकित्सा सुविधा भी सरकार की तरफ से नहीं दी जा रही। जबकि इस केंद्रों में क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली महिला पहलवान अभ्यास करती हैं। इस अखाड़े में 3 वर्षीय अवनी, 6 वर्षीय रिद्धिमा व तीसरी कक्षा की छात्रा रक्षिता सहित 20 वर्षीय प्रीति समेत 16 बालिका व किशोरी पहलवान कुश्ती के मैदान में अपना सुनहरा भविष्य तलाशने में जुटी हैं। देश का नाम रोशन करने को आतुर मैट पर पसीना बहाती इन महिला पहलवानों को प्रोत्साहन के साथ बस जरूरी संसाधनों
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व सुविधाओं की दरकार है।

सरकार की बेरुखी से निराशा
सरकार की बेरुखी से जहां महिला पहलवान निराश हैं तो कोच व अखाड़ा संचालक वीरेंद्र बुल्लड़ भी बेहद नाराज हैं। उनके अनुसार, यह सरकार का दोगला रवैया है। एक तरफ सरकार मत्रियों को दंगल फिल्म देखने को प्रेरित कर रही है जबकि महिला कुश्ती के लिए सुविधाएं नहीं दी जा रही।
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बेटियां करेंगी सपना साकार
गांव मांडोठी की सुमन पत्नी संदीप बागड़ी बुधवार को अखाड़े में अपनी बेटी को पहलवानी के गुर सिखाने छोड़ने पहुंची थी। उन्होंने बताया कि उनके पिता पहलवान थे और उसे पहलवान बनाना चाहते थे मगर उनकी मां के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया। अब वह उस सपने को अपनी दो बेटियों के साथ हकीकत होते देखना चाहती हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सुमन के पति संदीप श्रमिक हैं और सुमन खुद निजी अस्पताल में हाउसकीपिंग करती हैं। आर्थिक मजबूरियों के बावजूद वह इस सपने को पूरा करने की कोशिश में जुटी हैं।


चोट लगे तो कोन कराए उपचार
अखाड़ा की प्रशिक्षु पहलवान एवं राजस्थान केसरी पहलवान प्रीति हाल में अभ्यास के दौरान घुटने में लगी चोट से परेशान हैं। बीए अंतिम वर्ष की छात्रा प्रीति यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता के अलावा ओपन वर्ग में जूनियर व सीनियर वर्ग का राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेल चुकी है। वह कुश्ती में भविष्य की उम्मीद हैं। पहलवान वीरेंद्र बुल्लड़ का कहना है कि प्रीति की चोट के उपचार पर 70 हजार रुपये खर्च आने का अनुमान है। बिना चिकित्सा सुविधा अभ्यास मुमकिन नहीं है। कई बार खिलाड़ी उपचार नहीं करा पाने की आर्थिक मजबूरी के कारण खेल को अलविदा कर जाते हैं।
 
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