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राजकीय महाविद्यालय बिरोहड़ में आयोजित जयंती पर याद किए गए कनाई लाल दत
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साल्हावास। आजादी का अमृत महोत्सव शृंखला के तहत राजकीय महाविद्यालय बिरोहड़ के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग एवं हरियाणा इतिहास कांग्रेस के संयुक्त तत्वावधान में महाविद्यालय प्राचार्या डॉ अनीता फोगाट की अध्यक्षता में महान क्रांतिकारी कनाई लाल दत्त की 134 वीं जयंती के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के संयोजक एवं मुख्य वक्ता डॉ अमरदीप ने कहा कि कनाई लाल ने बंगाल विभाजन का विरोध किया और चंदननगर से आंदोलन का मोर्चा निकाला। 30 अगस्त 1888 को बंगाल में हुगली जिले के चंदन नगर में जन्मे कनाई लाल पर प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। 1908 में कलकत्ता में क्रांतिकारी संगठन ‘जुगांतर’ से जुड़ने के बाद वह बरीन्द्र कुमार घोष के घर में रहे। इसी बीच 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम और उनके साथी प्रफ्फुलचंद्र चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर बम फेंका। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार की नींदें उड़ा दी। क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हो गई। मई 1908 में पुलिस ने कनाई लाल के ठिकाने पर भी छापा मारा। घर में एक बम फैक्ट्री मिली। यहां से काफी मात्रा में पुलिस को क्रांतिकारियों के हथियार मिले। इसके बाद अंग्रेजों ने अरविन्द घोष, बरिन्द्र घोष, सत्येन्द्र नाथ व कनाई लाल समेत 35 आजादी के सिपाहियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार होने वाले लोगों में, नरेंद्र नाथ गोस्वामी नाम का सहयोगी भी था। नरेंद्र गोस्वामी ने ब्रिटिश सरकार के डर से और जेल से छूटने के लालच में अपने साथियों के नाम बताना शुरू कर दिया। कनाई लाल ने अपने सहयोगी सत्येन बोस के साथ उसकी हत्या की योजना बनाई। योजना के तहत बीमार होने का नाटक करके जेल के अस्पताल में पहुंच गये और जैसे ही वहा नरेंद्र गोस्वामी अस्पताल में सत्येन और कनाई लाल के सामने आए। उन्होंने अपने कपड़ों में छिपाई रिवाल्वर निकालकर, उन पर गोलियां बरसा दीं और मौके पर ही नरेंद्र की मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया कि कैसे दो क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने उनके गवाह की हत्या कर दी। 21 अक्टूबर 1908 को कनाई लाल और सत्येन को फांसी की सजा सुनाई गई। डॉ अनीता फोगाट ने कहा कि 10 नवंबर 1908 को कनाई लाल दत्त को मात्र 20 बरस की आयु में फांसी हुई। खुदीराम बोस के बाद फांसी के फंदे पर झूलने वाले वह दूसरे क्रांतिकारी थी। फांसी के बाद, जब उनके शव को उनके परिजनों को दिया गया तो आजादी के इस परवाने को देखने के लिए हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ी। कोलकाता का कालीघाट लोगों से भर गया था और इस घटना ने क्रांतिकारी आंदोलन को बहुत बढ़ावा दिया।
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कार्यक्रम के संयोजक एवं मुख्य वक्ता डॉ अमरदीप ने कहा कि कनाई लाल ने बंगाल विभाजन का विरोध किया और चंदननगर से आंदोलन का मोर्चा निकाला। 30 अगस्त 1888 को बंगाल में हुगली जिले के चंदन नगर में जन्मे कनाई लाल पर प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। 1908 में कलकत्ता में क्रांतिकारी संगठन ‘जुगांतर’ से जुड़ने के बाद वह बरीन्द्र कुमार घोष के घर में रहे। इसी बीच 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम और उनके साथी प्रफ्फुलचंद्र चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर बम फेंका। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार की नींदें उड़ा दी। क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हो गई। मई 1908 में पुलिस ने कनाई लाल के ठिकाने पर भी छापा मारा। घर में एक बम फैक्ट्री मिली। यहां से काफी मात्रा में पुलिस को क्रांतिकारियों के हथियार मिले। इसके बाद अंग्रेजों ने अरविन्द घोष, बरिन्द्र घोष, सत्येन्द्र नाथ व कनाई लाल समेत 35 आजादी के सिपाहियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार होने वाले लोगों में, नरेंद्र नाथ गोस्वामी नाम का सहयोगी भी था। नरेंद्र गोस्वामी ने ब्रिटिश सरकार के डर से और जेल से छूटने के लालच में अपने साथियों के नाम बताना शुरू कर दिया। कनाई लाल ने अपने सहयोगी सत्येन बोस के साथ उसकी हत्या की योजना बनाई। योजना के तहत बीमार होने का नाटक करके जेल के अस्पताल में पहुंच गये और जैसे ही वहा नरेंद्र गोस्वामी अस्पताल में सत्येन और कनाई लाल के सामने आए। उन्होंने अपने कपड़ों में छिपाई रिवाल्वर निकालकर, उन पर गोलियां बरसा दीं और मौके पर ही नरेंद्र की मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया कि कैसे दो क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने उनके गवाह की हत्या कर दी। 21 अक्टूबर 1908 को कनाई लाल और सत्येन को फांसी की सजा सुनाई गई। डॉ अनीता फोगाट ने कहा कि 10 नवंबर 1908 को कनाई लाल दत्त को मात्र 20 बरस की आयु में फांसी हुई। खुदीराम बोस के बाद फांसी के फंदे पर झूलने वाले वह दूसरे क्रांतिकारी थी। फांसी के बाद, जब उनके शव को उनके परिजनों को दिया गया तो आजादी के इस परवाने को देखने के लिए हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ी। कोलकाता का कालीघाट लोगों से भर गया था और इस घटना ने क्रांतिकारी आंदोलन को बहुत बढ़ावा दिया।
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