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एक टीचर के सहारे चल रहा जरदकपुर का प्राइमरी स्कूल
अमर उजाला ब्यूरो/झज्जर/बहादुरगढ़
Updated Mon, 25 Apr 2016 11:58 PM IST
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जरदकपुर
- फोटो : ब्यूरो
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गांव जरदकपुर में शिक्षा की हालात काफी पतली है। गांव का एकमात्र प्राइमरी स्कूल सिर्फ एक अध्यापक के सहारे चल रहा है। स्कूल के माहौल को देखकर छात्र भी स्कूल नहीं जा रहे हैं। गांव में कोई निजी स्कूल भी नहीं है जिसके चलते बच्चों का भविष्य अंधकार में है। स्कूल में शिक्षण व अन्य जरूरी सुविधाएं न होने से ग्रामीणों में सरकार व प्रशासन के प्रति गहरा रोष बना हुुआ है।
दिल्ली सीमा से सटे जरदकपुर गांव में वर्षों पुराना सरकारी स्कूल है। स्कूल में पांचवीं कक्षा तक बच्चे पढ़ने तो जाते हैं मगर अध्यापकों की कमी स्कूल में साफ झलक रही है। स्कूल की हालत देखकर हर कोई हैरान रह जाता है और हर ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में हो रही गांव की उपेक्षा से चिंतित है। छात्र मटके में भरा दूषित पानी पीने को मजबूर हैं तो बिजली और पंखे नाम की कोई सुविधा नहीं मिल रही। स्कूल के प्रांगण में कुछ निजी गाड़ियां, ट्रैक्टर और खेती बाड़ी का सामान पड़ा है।
सिर्फ एक बच्चों को पढ़ाए या शांत कराए
स्कूल में एक अध्यापक है। स्कूल के सफाई कर्मचारी का भी कोई समय नहीं है। सोमवार को अमर उजाला टीम ने स्कूल का दौरा किया तो ग्रामीण उदय से भारत उदय अभियान दूर-दूर तक नजर नहीं आया। स्कूल कमरों पर ताले लटके मिले। कुछ छात्र स्कूल पहुंचे थ जो कमरे के बाहर ही आपस में खेलते दिखे।
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ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति रोष
पत्रकार को देखकर कुछ ग्रामीण भी स्कूल पहुंच गए और उन्होंने स्कूल की दुर्दशा दिखाते हुए बताया कि स्कूल पूरी तरह से उपेक्षा का शिकार है। ग्रामीण राय सिंह, जयनरायण, जयभगवान और धर्मबीर ने बताया कि छात्रों को सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा है। वहीं स्कूल के एकमात्र अध्यापक अजीत सिंह का कहना है कि स्कूल में करीब 40 बच्चे हैं। कभी कभार जब सरकारी बैठक होती है या फिर उन्हें किसी घरेलू काम से छुट्टी करनी होती है तो स्कूल की भी छुट्टी हो जाती है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों से कई बार अध्यापकों की संख्या बढ़ाने की मांग की गई है, मगर कोई समाधान नहीं निकाला जा रहा है।
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दिल्ली सीमा से सटे जरदकपुर गांव में वर्षों पुराना सरकारी स्कूल है। स्कूल में पांचवीं कक्षा तक बच्चे पढ़ने तो जाते हैं मगर अध्यापकों की कमी स्कूल में साफ झलक रही है। स्कूल की हालत देखकर हर कोई हैरान रह जाता है और हर ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में हो रही गांव की उपेक्षा से चिंतित है। छात्र मटके में भरा दूषित पानी पीने को मजबूर हैं तो बिजली और पंखे नाम की कोई सुविधा नहीं मिल रही। स्कूल के प्रांगण में कुछ निजी गाड़ियां, ट्रैक्टर और खेती बाड़ी का सामान पड़ा है।
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सिर्फ एक बच्चों को पढ़ाए या शांत कराए
स्कूल में एक अध्यापक है। स्कूल के सफाई कर्मचारी का भी कोई समय नहीं है। सोमवार को अमर उजाला टीम ने स्कूल का दौरा किया तो ग्रामीण उदय से भारत उदय अभियान दूर-दूर तक नजर नहीं आया। स्कूल कमरों पर ताले लटके मिले। कुछ छात्र स्कूल पहुंचे थ जो कमरे के बाहर ही आपस में खेलते दिखे।
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ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति रोष
पत्रकार को देखकर कुछ ग्रामीण भी स्कूल पहुंच गए और उन्होंने स्कूल की दुर्दशा दिखाते हुए बताया कि स्कूल पूरी तरह से उपेक्षा का शिकार है। ग्रामीण राय सिंह, जयनरायण, जयभगवान और धर्मबीर ने बताया कि छात्रों को सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा है। वहीं स्कूल के एकमात्र अध्यापक अजीत सिंह का कहना है कि स्कूल में करीब 40 बच्चे हैं। कभी कभार जब सरकारी बैठक होती है या फिर उन्हें किसी घरेलू काम से छुट्टी करनी होती है तो स्कूल की भी छुट्टी हो जाती है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों से कई बार अध्यापकों की संख्या बढ़ाने की मांग की गई है, मगर कोई समाधान नहीं निकाला जा रहा है।
स्कूल में लटके तालों और समय पर अध्यापकों की कमी पर जब जिला शिक्षा अधिकारी दौलतराम से बात की गई तो उन्होंने कहा कि स्कूल का निरीक्षण कर समस्याओं का समाधान कराया जाएगा। इसके अतिरिक्त कर्मचारियों की लेटलतीफी बर्दाश्त नहीं होगी और जल्द ही उचित की जाएगी।